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जिंदगी का एक रंग ये भी ……..

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मेरी माँ इंटरकॉलेज में वाईस प्रिंसिपल पद पर कार्यरत थी। सर्विस की वजह से माँ और पापा अलग शहरों में रहते थे । मैं माँ के साथ नानी के पास और पापा दिल्ली में desu में सर्विस करते थे। माँ बहुत बीमार रहती थी और एक दिन मुझे अकेला छोड़कर भगवान को प्यारी हो गयी ।जब मेरी उम्र सिर्फ 8.5 साल थी । माँ का काफी पैसा बैंक में था ,जब उस पैसे को निकालने की बारी आई तो कोर्ट ने आदेश दे दिया कि पत्नी के पैसों पर पति का पहला अधिकार है बच्ची का बाद में ।

नानी ने पापा को खबर की थी माँ के मरने की लेकिन वो उनका अंतिम संस्कार करने भी नहीं आये लेकिन जब पैसों की बात आई तो दौड़ लगाकर चले आये । आखिर सन 80 में 70 हजार रुपये की बहुत वैल्यू थी लेकिन उस जमाने मे बेटी की वैल्यू कुछ नहीं थी । एक बार भी नहीं सोचा कि माँ के बिना कैसे रहेगी ? हाँ तो कोर्ट ने सम्मन जारी किये और पैसों के लिए वो तुरन्त दौड़ कर आये ।मेरे मामा और मौसी कोर्ट में मेरे साथ जाते थे ।

मेरी मौसी भी इंटरकॉलेज में प्रिंसिपल थीऔर माँ ने अपने पैसों का वारिस मेरे बालिग होने तक मौसी को बना दिया था इसलिए हर बार उन्हें भी आना पड़ता था। मामा इंटरकॉलेज में लेक्चरार थे । मैं जब भी कोर्ट में जाती थी मेरे वकील मुझे कुछ लिखी हुई बातें समझाते थे कि जब पापा आये तब तुम्हें किस तरह बात करनी है क्योंकि मुझे पापा के साथ जाने में डर था ,कारण माँ के मरने के बाद 6 महीने के अंदर ही उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी ।

बचपन में इतनी मूवी देखी थी कि सौतेली माँ के प्रति एक डर बैठ चुका था । मेरे पापा 6 भाई थे लेकिन माँ के जाने के बाद कोई कभी नहीं आया मुझे पूछने कि मैं कैसे रह रही हूँ ।
जब पापा ,बाबा ,चाचा सभी कोर्ट में आये तब उनके वकील ने मुझसे क्रॉस question करने शुरू कर दिए क्या तुम इनको जानती हो लेकिन मन मे एक डर था कि यदि मैंने इनको पहचान लिया तो ये मुझे अपने साथ ले जाएंगे और मैं तो वहाँ किसी को ठीक से जानती भी नहीं ।

हमारे वकील का कहना था कि ये तुम्हें ठीक से नहीं रख पाएँगे क्योंकि उनकी दूसरी शादी हो चुकी थी । एक 8 .5 साल के बच्चे को आप जो समझाएंगे वही समझेगा । नानी मामा का प्यार और पापा के डर ने मुझे कमजोर बना दिया और किसी की भी शक्ल देखे बिना मैंने पहचानने से मना कर दिया । केस करीब तीन साल चला जब मैं 9th में आई तब judge के कहे अनुसार केस की बहस हुई । एक 12 साल की लड़की को वकीलों ने 4.5 घण्टे खड़ा रखा और बहस चलती रही ,आखिर में जज ने सारी बातों को सुनने के बाद मेरे पक्ष में 10 पेज का फैसला लिखा और माँ के सारे रुपयों पर मेरा अधिकार माना गया ।

क्या मेरे साथ वो जो हुआ सही था ?क्या एक पिता का अपनी बेटी के लिए कोई फर्ज नहीं था । क्या बेटी पर प्यार तभी उमड़कर आया जब बीबी के रुपये का पता लगा । जिस इंसान को अपनी पत्नी का दाह संस्कार करने का मन नही था न वक़्त था क्यों उसे पैसे तुरंत खींच लाए । प्रेम तो था ही नहीं न मुझसे , न माँ से सिर्फ पैसों से प्रेम था वरना आज भी मैं पिता के प्रेम के लिए न तरसती ।

वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़ ((लेखिका/कहानीकार/कवियत्री)

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