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माँ मोक्षेश्वरी के दर्शनों से मिलता है भक्तों को मोक्ष

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भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाली आदि शक्ति माँ मोक्षेश्वरी का इतिहास भी द्वापर कालीन बताया जाता है मुस्लिम शासक औरंगजेब ने माँ की महत्ता परखनी चाही और उसने मूर्ति को खंडित करने का दु:साहस कर डाला था परन्तु जब माँ का कहर शुरू हुआ तो मुग़ल शासक को माँ के मंदिर में मत्था ही नही टेकना पड़ा वरन पुन:मूर्ति को स्थापित करवाना पड़ा आज भी मूर्ति के गले में कटे का स्थान देखा जा सकता है मान्यता है कि नवरात्रि में माँ मोक्षेश्वरी के दर्शन से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है|

विकास खण्ड सिंहपुर के उसरहा गाँव में देवी माँ मोक्षेश्वरी का मनोरम व भव्य मंदिर स्थित है,मंदिर में स्थापित मूर्ति पूरी तरह प्राकृतिक है कालांतर में यह स्थान राजा विराट की नगरी का हिस्सा हुआ करता था। जुए में अपना राज-पाट हारने के बाद अज्ञातवास भोगने के दौरान पांडु पुत्रों ने पत्नी द्रोपदी व माता कुंती के साथ माँ की पूजा अर्चना की थी माँ मोक्षेश्वरी का मंदिर परिसर भी कम रहस्यमयी नही है मंदिर के नीचे बने तहखाने को देखकर माना जा सकता है कि जमीन के भीतर भी यहाँ बहुत बड़ा महल रहा होगा जिसका खँडहर आज भी देखा जा सकता है|ग्रामीण बतातें है कि पन्हौना रियासत के तालुकेदार कन्हैया बक्श सिंह तथा उदय प्रताप सिंह के परिवारों के मांगलिक कार्य यहीं पर संपन्न होते थे,उसरहा के पूर्व प्रधान श्रीकृष्ण मिश्र बतातें हैं कि माँ मोक्षेश्वरी मंदिर और अहोरवा देवी मंदिर तक एक सुरंग भी थी जिसके अवशेष मंदिर के नीचे आज भी देखे जा सकते हैं|आधिवक्ता संजीव बाजपेयी बताते हैं कि माँ अहोरवा भवानी बड़ा फाटक हैं तो मोक्षेश्वरी उसमे खिड़की की तरह हैं|

जरुर पहुंचती है परिक्रमा

मां अहोरावा भवानी और माँ मोक्षेश्वरी का मंदिर गांडीव क्षेत्र में आता है अज्ञातवास के समय जब धनुर्धारी कुंती पुत्र अर्जुन यहाँ आये थे तो उनके धनुष से निकली टंकार जहाँ तक पहुची वह क्षेत्र गांडीव कहलाया ऐसी मान्यता है इस क्षेत्र के क्षत्रिय भी गांडीव बैश कहे जाते हैं जिसका अपभ्रंश गड़ेउ तालुक हो गया।  जगत प्रसिद्ध माँ अहोरवा भवानी मंदिर से लगभग पांच किमी.पश्चिम दिशा में माँ मोक्षेश्वरी का मंदिर निर्जन स्थान पर स्थित है क्षेत्र में यज्ञ अनुष्ठान या मंदिर स्थापना जैसे धार्मिक कार्यों की परिक्रमा यहाँ जरुर पहुँचती है|

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