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INTERNATIONAL WIDOWS DAY : विधवाओं को हक और सम्मान दीजिए

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PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK 

आज अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस है। यह दिन दुनिया भर में लाखों विधवाओं और उनके आश्रितों द्वारा सामना की जाने वाली गरीबी और अन्याय को संबोधित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही का दिन है। यह दिन विधवाओं के लिए पूर्ण अधिकार और मान्यता प्राप्त करने के लिए कार्यवाही का अवसर का भी दिन है। यह दिन विधवाओं की उनकी विरासत, भूमि, उत्पादक संसाधनों, सामाजिक सुरक्षा, समान वेतन और पेंशन के उचित हिस्से तक पहुंच के संदर्भ में जनमत जुटाने का भी दिन है। उल्लेखनीय है कि 21 दिसंबर, 2010 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा  औपचारिक रुप से 23 जून को अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस के रुप में अपनाया गया।

बहुचर्चित किताब ‘इनविजिबल फाॅरगाॅटन सफरर्सः द प्लाइट आफॅ विडो अराउंड द वल्र्ड’ की मानें तो दुनिया भर में तकरीबन 250 मिलियन विधवाएं हैं जिनमें से 115 मिलियन विधवाएं गरीबी में जीवन-बसर करती हैं। वे अपने हक और सम्मान दोनों से वंचित हैं। भारत में भी लाखों विधवाएं हैं जो गरीबी समेत कई किस्म की गंभीर समस्याओं से अभिशप्त हैं। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय ने वृंदावन सहित देश के अन्य शहरों में रह रही विधवाओं के मसले पर सुनवाई करते हुए गंभीर टिप्पणी की थी। उसने कम उम्र की विधवाओं के आश्रमों में रहने पर चिंता जताते हुए सरकार से जानना चाहा था कि विधवा विवाह को कल्याणकारी योजनाओं का हिस्सा क्यों नहीं होना चाहिए। तब न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर व न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा था कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है लेकिन उनके विवाह के बारे में कोई बात नहीं करता।

सर्वोच्च अदालत ने दो टूक कहा था कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर विधवाओं के पुनर्वास से पहले उनके विवाह को प्रोत्साहन देने की जरुरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के साॅलिसिटर जनरल के इस आश्वासन पर कि विधवाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना है और विधवा गृहों में रहने वाली महिलाओं के लिए वोकेशनल टेªनिंग की योजना है पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि आपकी योजनाएं सिर्फ कागजों पर दिखती हैं। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। तब न्यायालय ने सुझाव दिया कि विधवा गृहों में रह रही महिलाओं को पास के बाल सुधार गृह और वृद्धा आश्रमों में मौका दिया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि देश में सर्वाधिक विधवाएं राधा-कृष्ण की नगरी वंृदावन में रहती हैं। उन्हें अपनी जीविकोपार्जन के लिए मंदिरों में भजन-कीर्तन करने के अलावा अन्य कई कार्य करने पड़ते हैं।

ध्यान दें तो भजन-कीर्तन के एवज में उन्हें महज पांच रुपए से पचास रुपए तक मिलते हैं और वे इन पैसों से बमुश्किल अपनी जरुरतें पूरी कर पाती हैं। कई स्वयंसेवी संगठनों ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि विधवाऐं अपनी भूख मिटाने के लिए न सिर्फ भीख मांगती हैं बल्कि कुछ विधवाएं तो अपनी जरुरत पूरा करने के लिए कई घरों में चैका-बर्तन भी करती हैं। भरपेट भोजन न मिलने से वे एक जिंदा लाश के रुप में तब्दील होती जा रही हैं। इसी का कुपरिणाम है कि उन्हें कई तरह की गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। गत वर्ष पहले फोग्सी फेडरेशन आॅफ ओब्स्टेट्रिक एंड गायनकोलाॅजिकल सोसायटी आॅफ इंडिया द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में पाया गया कि वृंदावन में वास कर रही विधवा माताओं में तकरीबन 25 प्रतिशत महिलाओं में कैल्सियम की भारी कमी है और उनकी हड्डियां खोखली हैं। 10 प्रतिशत विधवाएं डायबिटिज और 60 प्रतिशत एनेमिक की शिकार हैं। 98 प्रतिशत विधवाएं रक्तचाप से पीड़ित हैं और 60 प्रतिशत विधवाएं पेट संबंधी गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं।

वृंदावन धार्मिक नगरी है और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। वृंदावन का शाब्दिक अर्थ है तुलसी का वन। लेकिन आज इस नगरी की पहचान विधवाओं की नगरी के रुप में हो रही है। यहां आश्रमों में हजारों की तादाद में विधवाएं रहती हैं। यहां के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर का इलाका हो अथवा इस्काॅन मंदिर का इलाका, माथे पर तिलक और गले में कंठी धारण किए कम उम्र व उम्रदराज विधवाएं देखी जा सकती हैं। आमतौर पर माना जाता है कि यहां रह रही विधवाएं कृष्ण भक्त हैं और मोक्ष के लिए आयी हैं। लेकिन एक सच यह भी है कि इनमें से कई विधवाएं ऐसी भी हैं जो स्वयं से यहां नहीं आयी हैं। अधिकांश परित्यक्ताएं हैं जो या तो अकेले होने के कारण या घरवालों के खराब व्यवहार के कारण परेशान होकर यहां आकर बस गयी हैं।

ज्यादतर विधवाओं के परिवार में या तो कोई सदस्य नहीं बचा है या उनके परिवार वाले उनकी देखभाल को तैयार नहीं हैं। समाज के रिश्ते-नातों और दुनिया के रंगों से अलग कर दी गयी ये विधवाएं बदलते वक्त के साथ समाज की मुख्य धारा में लौटना चाहती हैं। इन विधवाओं में कई के मन में विवाह बंधन में बंधने की लालसा भी है। लेकिन समाज की दकियानुसी बेड़ियों के कैद से मुक्त हो पाना इनके लिए पहाड़ लांघने जैसा है। हालांकि वेदों में कहा गया है कि वह एक विधवा को सभी अधिकार देने एवं दूसरा विवाह करने का अधिकार प्रदान करता है। वेदों में उल्लेख है कि-‘‘उदीष्र्व नार्यभि जीवलोकम गतासुमेपमुप शेष एहि, हस्त ग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सम्बभूथ।’’ अर्थात पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा उसकी स्मृति में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दे ऐसा कोई धर्म नहीं कहता।

उस स्त्री को पूरा अधिकार है कि वह आगे बढ़कर किसी अन्य पुरुष से विवाह करके अपना जीवन सफल बनाए। ऐसा नहीं है कि विधवाओं के जीवन को सुधारने और सम्मान योग्य बनाने की पहल नहीं हुई। 1856 में ब्रिटिश सरकार ने विधवाओं पर होने वाले अत्याचार को रोकने और उनका मानवीय अधिकार वापस दिलाने के लिए हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 पारित किया। यह अधिनियम विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत देता है। इस अधिनियम में स्पष्ट कहा गया है कि यदि दूसरे विवाह के समय किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो चुकी है तो ऐसा विवाह वैध है। इस अधिनियम के मुताबिक ऐसे विवाह से उत्पन सभी संतानें भी वैध मानी जाएगी। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि भारतीय समाज विधवाओं को उचित सम्मान व आदर दे तथा सरकार भी ऐसे विधवाओं को पुनर्विवाह के लिए प्रेरित करे। विशेषकर वे जो कम आयु की हैं।

अच्छी बात यह है कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में सराहनीय पहल कर रही हैं। इसके बावजूद भी विधवाओं को लेकर समाज का नजरिया दकियानुसी बना हुआ है। आज भी विधवाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मसलन वे क्या करती हैं, कहां जाती हैं और उनके यहां कौन आता-जाता है ऐसे ढ़ेरों सवालों का सामना करना पड़ता है। उनकी गरिमा पर भी सवाल दागा जाता है। यही नहीं सामाजिक-धार्मिक कार्यक्रमों में भी उन्हें शिरकत करने से रोकने की कोशिश होती है। गौर करें तो उनके लिए केवल पति की मृत्यु का शोक ही त्रासदी नहीं होता। बल्कि उन्हें कट्टर रीति रिवाजों के अनुसार जीवन भी गुजारना पड़ता है। यह उचित नहीं है। यह सोच और प्रवृत्ति अमानवीय और मानवता के खिलाफ है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में 5 करोड़ से भी अधिक विधवाएं हैं। उन्हें परंपरा और रीति-रिवाज की आड़ लेकर अधिकारों से वंचित और बेदखल कर दिया गया है।

कुछ साल पहले एक स्वयं सेवी संस्था ने उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर विधवाओं की दयनीय हालत सुधारने और उन्हें आवास उपलब्ध कराने की मांग की। सर्वोच्च अदालत ने इस पर गौर फरमाते हुए सरकार को निर्देशित किया कि वह विधवाओं को आवास उपलब्ध कराए और उनके जीवन निर्वाह के लिए निश्चित धनराशि मुकर्रर करे। सर्वोच्च अदालत के इस निर्देश के बाद सरकार ने वृंदावन में एक हजार विधवाओं के रहने के लिए आवास बनवाने का भरोसा दिया और बजट आवंटित किया। यह स्वागतयोग्य पहल है। आज जरुरत इस बात की है कि सरकार के साथ-साथ समाज भी विधवाओं के प्रति मानवीय और उदार बने। विधवाओं के जीवन को सुगम बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार के कंधे पर ठेलकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं, लेख में उनके अपने विचार हैं)

 

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