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GANGA DUSSEHRA SPECIAL : गंग सकल मुद मंगल मूला

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PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK 

आज गंगा दशहरा है। आज ही के दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई। स्कंद पुराण व वाल्मीकी रामायण में गंगा अवतरण का विशद उल्लेख है। रामचरित मानस के अयोध्या कांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने जीवनदायिनी मां गंगा का मनुहारी वर्णन करते हुए कहा है कि ‘गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुख करनि हरनि सब सूला।’ अर्थात गंगा जी समस्त आनंद-मंगलों की मूल हैं। वे सब सुखों को करने वाली और सब पीड़ाओं का हरने वाली हैं। पुराणों में कहा गया है कि राजा भगीरथ वर्षों की तपस्या के उपरांत ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल हुए। भारतीय शास्त्र, पुराण एवं उपनिषद इत्यादि सभी ग्रंथों में गंगा की महिमा और महत्ता का बखान किया गया है।

गंगा भारतीय संस्कृति की प्रतीक एवं हजारों साल की आस्था की पूंजी है। शास्त्रों में कहा गया है कि गंगा का पानी अमृत व मोक्षदायिनी है। गौर करें तो गंगा का जितना धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व है उतना ही आर्थिक भी। भारत गांवों और नदियों का देश है। गांव और नदियों का संबंध सदियों पुराना है। गंगा का पानी कृषि व उद्योगधंधों के लिए प्राणवायु है। लेकिन यह विडंबना है कि गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। इससे सिर्फ उसका निर्मल पानी ही प्रदूषित नहीं हो रहा है बल्कि उसका अस्तित्व भी संकट में आन पड़ा है। याद होगा अभी गत वर्ष ही कोरोना महामारी में लाखों लोग काल का ग्रास बने। उस समय गंगा नदी के तट पर सैकड़ों शव उतराते देखे गए।

गौर करें तो देश में हर दिन अनगिनत शव गंगा में बहाए जाते हैं। शवों को बहाने से न सिर्फ गंगा की निर्मलता प्रभावित होती है बल्कि उसका सीधा असर गंगा में रहने वाले जलीय जीवों के सेहत पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो गंगा में बहाए जाने वाले शवों को विशेष प्रकार की मछलियां और कछुए खाते हैं। अगर ये शव कोरोना से संक्रमित हुए तो फिर मछलियों समेत अन्य जलीय जीवों का संक्रमित होना स्वाभाविक है। चूंकि मछलियां लोगों के खाद्य सामग्री के रुप में इस्तेमाल होती हैं ऐसे में इसका सेवन करने वाले लोगों तक संक्रमण और बीमारी पहुंचने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। शवों को बहाने से न सिर्फ गंगा का जल संक्रमित होता है बल्कि इससे गंगाजल का सेहत करने वाले लोगों की भी सेहत बुरी तरह बिगड़ती है।

विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि इसका असर नमामि गंगे जैसे प्रोजेक्ट के लिए भी चुनौती बन सकता है। उल्लेखनीय है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के जरिए गंगा की निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने का प्रयास हो रहा है। इस प्रोजेक्ट पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन जिस तरह गंगा में आस्था के नाम पर शवों को बहाया जा रहा है उससे गंगा की निर्मलता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। हां, यह सच्चाई है कि शवों को बहाने की अपेक्षा जलाने पर ज्यादा खर्च आता है। ऐसे में आर्थिक रुप से विपन्न परिवार शवों को जलाने के बजाए उन्हें गंगा में बहा देते हैं। एक सच यह भी है कि आस्था के नाम पर भी शवों को गंगा में बहाने की परंपरा विद्यमान है। वह परंपरा आज तक जारी है। गौर करें तो आस्था के नाम पर अकेले गंगा में ही हर वर्ष लाखों शव बहाए जाते हैं।

उसके तटों पर लाखों शव जलाए जाते हैं। दूर स्थानों से जलाकर लायी गयी अस्थियां भी गंगा में विसर्जित कर दी जाती हैं। भला ऐसी आस्था और परंपरा से गंगा की निर्मलता और पवित्रता कैसे सुरक्षित रह सकती है। हद तो यह है कि गंगा एवं अन्य नदियों की सफाई अभियान से जुड़ी एजेंसियां और स्वयंसेवी संस्थाएं भी गंगा और अन्य नदियों से निकाली गयी अधजली हड्डियां एवं राखों को पुनः उसी में उड़ेल देती हैं। क्या इस तरह की सफाई अभियान से गंगा साफ-सुथरी हो सकेंगी? समझना होगा कि जब तक आस्था के उमड़ते सैलाब पर रोक नहीं लगेगा तब तक गंगा समेत अन्य नदियां मैली होती रहेंगी। भारत नदियों का देश है।

देश के आर्थिक-सांस्कृतिक विकास में नदियों का अहम योगदान है। नदियां भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पर्याय हैं। नदी घाटियों में ही आर्य सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई। देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे स्थित हैं। देश के अधिकांश धार्मिक स्थल किसी न किसी रुप में नदियों से संबंद्ध हैं। नदियां देश की बड़ी आबादी को अपने जल से उर्जावान करती हंै। लिहाजा नदियों को निर्मल बनाए रखने के लिए जितना सख्त कानून की जरुरत है उससे कहीं अधिक पर्यावरण पे्रमियों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और संत समाज की सार्थक भागीदारी निभाने की जरुरत है। याद होगा गत वर्ष पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने प्लास्टर आॅफ पेरिस (पीओपी), प्लास्टिक और थर्मोकाॅल जैसी हानिकारक चीजों से बनी देव प्रतिमाओं के जल विसर्जन पर रोक लगायी।

बोर्ड ने यह कदम देश में मूर्ति विसर्जन को पर्यावरण हितैषी तरीके से पूरा करने के उद्देश्य से उठाया। बोर्ड के नए नियमों के मुताबिक अब हानिकारक तत्वों से बनी मूर्तियों का जल विसर्जन नहीं हो सकेगा। यानी अब जलविसर्जन उन्हीं देव मूर्तियों का होगा जिनके निर्माण में केवल सूखे फलों के अंशों और पेड़ों की प्राकृतिक गोंद का इस्तेमाल हुआ है। दो राय नहीं कि बोर्ड के इस पहल से नदियां प्रदूषित होने से बचेंगी और सिंथेटिक पेंट एवं रसायनों के बजाए प्राकृतिक रंगों से रंगी मूर्तियों के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। भारत उत्सवों एवं त्यौहारों का देश है। देश में गणेश, विश्वकर्मा, दुर्गा, लक्ष्मी, काली और सरस्वती पूजा बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है। इन त्यौहारों और उत्सवों पर हर वर्ष नदियों और जलाशयों में लाखों की संख्या में देव मूर्तियों को विसर्जन होता है।

एक अनुमान के मुताबिक अकेले मुंबई में ही डेढ़ लाख से अधिक गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। इसी तरह कोलकाता की हुबली नदी में पंद्रह से बीस हजार देव प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। देश के अन्य नदियों के साथ भी ऐसा ही होता है। बिडंबना यह कि विसर्जित होने वाली मूर्तियों में कमी के बजाए हर वर्ष उनमें इजाफा हो रहा है। इन मूर्तियों के निर्माण में जहरीले अकार्बनिक रसायनों का इस्तेमाल होता है। रंग बिरंगे आयल पेंटों में नुकसान करने वाले घातक रसायन होते हैं। जब मूर्तियों का विसर्जन होता है तो कुछ सामग्री तो नष्ट हो जाती है लेकिन प्लास्टर आॅफ पेरिस और पेंट के घातक रसायन पानी में मिल जाते हैं। इससे पानी जहरीला बन जाता है। उसका सीधा असर जलीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं एवं मनुष्यों की सेहत पर पड़ता है।

यह सच्चाई है कि नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए किस्म-किस्म के कानून गढ़े गए हैं। लेकिन नदियां अभी भी प्रदूषण से कराह रही है। गत वर्ष पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदी को जीवित व्यक्ति सरीखा दर्जा दिए जाने का अभूतपूर्व फैसला दिया। देखें तो गंगा एवं अन्य नदियों की दुगर्ति के लिए सिर्फ उसमें बहाए जाने वाले शव या मूर्तियां ही जिम्मेदार नहीं हैं। सीवर और औद्योगिक कचरा भी उतना ही जिम्मेदार है। किसी से छिपा नहीं है कि इसे बिना शोधित किए बहाया जा रहा है। उचित होगा कि नदियों के तट पर बसे औद्योगिक शहरों के कल-कारखानों के कचरे को इनमें गिरने से रोका जाए और ऐसा न करने पर कल-कारखानों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। अच्छी बात यह है कि देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इस दिशा में ठोस पहल कर रहा है।

वैज्ञानिकों की मानें तो प्रदूषण के कारण नदियों में आक्सीजन की मात्रा लगातार कम हो रही है। उनका पानी पीना तो दूर नहाने लायक तक नहीं रह गया है। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरे को बहाने से क्रोमियम एवं मरकरी जैसे घातक रसायनों की मात्रा बढ़ी है जो जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। उचित होगा कि जीवनदायिनी गंगा एवं अन्य नदियों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार छोड़ आस्था एवं परंपरा का निर्वहन मानवता के लिए किया जाए।

 

 

 

 

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