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EMERGENCY : आपातकाल और युवा पीढ़ी

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PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK 

25 जून, 1975। वह काला दिन जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की गर्दन मरोड़कर देश में आपातकाल थोप दिया था। श्रीमती गांधी ने सिर्फ संविधान की धज्जियां ही नहीं उड़ायी बल्कि जनतांत्रिक मूल्यों को भी नजरअंदाज कर मानवीय मूल्यों को निर्ममता से रौंद डाला। देश कराह उठा और संविधान को बर्फखाने में डाल दिया गया। जब भी 25 जून का दिन आता है आपातकाल की टीसें उभरने लगती है। उसी टीस का नतीजा है कि आपातकाल के पांच दशक बाद भी इस पर विमर्श जारी है। इन पांच दशकों में देश में युवाओं की ऐसी पीढ़ी आयी है जो न सिर्फ लोकतंत्र की समर्थक है बल्कि उन सभी विचारों का विरोधी है जो मानवीय गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

फिलहाल कहना मुश्किल है कि देश की युवा पीढ़ी श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल से खुद को कितना जोड़ पायी है या इसे लेकर उनका सोचने का तरीका क्या है? ऐसा इसलिए कि आपातकाल के बारे में न तो नई पीढ़ी को संपूर्ण जानकारी है और न ही उन्हें पता है कि आपातकाल क्या होता है? एक जिम्मेदार जनतांत्रिक राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को देश का इतिहास, संस्कृति, धर्म-दर्शन, राजनीति और जनतांत्रिक मूल्यों से सुपरिचित कराए। साथ ही उन अलोकतांत्रिक और जनविरोधी तानाशाही विचारों को भी उद्घाटित करे जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवीय मूल्यों और जनतांत्रिक गरिमा के खिलाफ है। यह तभी संभव होगा जब राष्ट्र के प्रत्येक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंगों को ईमानदारीपूर्वक शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ा जाएगा।

आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जो बेहद आवश्यक होते हुए भी इतिहास का हिस्सा नहीं बन सके हैं। इसका मूल कारण इतिहास लेखन में पारदर्शिता और निष्पक्षता का अभाव रहा है। सच कहें तो पूर्वाग्रहवश सही तथ्यों को छिपाया गया अथवा जानबुझकर तोड़-मरोड़कर परोसा गया है। यह स्थिति एक जीवंत राष्ट्र के नागरिकों और विशेषकर युवा पीढ़ी के साथ छल है। शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा न बनने वाले अनगिनत ऐतिहासिक प्रसंगों में एक आपातकाल भी है जिससे देश के युवा पीढ़ी का सुपरिचित होना आवश्यक है। आपातकाल के पांच दशक गुजर चुके हैं लेकिन देश की नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक घटना से पूरी तरह वाकिफ नहीं है।

अगर आपातकाल के तत्काल बाद ही इस घटना को शिक्षा के पाठ्यक्रमों में जोड़ दिया गया होता तो देश की युवा पीढ़ी लोकतांत्रिक और तानाशाही विचारों के फर्क को बेहतर ढंग से समझती। इससे लोकतंत्र मजबूत होता। नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों को लेकर जागरुकता बढ़ती और इस विषय पर नजरिया स्पष्ट होता। यह अच्छी बात है कि अब आपातकाल के काले अध्याय को शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की मांग तेजी से मुखर हो रही है। अगर आपातकाल के प्रसंग को इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जाता है तो युवा पीढ़ी को जानने-समझने का मौका मिलेगा कि किस तरह एक जनता द्वारा निर्वाचित सरकार अपने हठीले रवैए से लोकतंत्र को तबाह कर जनतांत्रिक मूल्यों को रौंद डाला था।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। एक स्वस्थ संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा में धरना-प्रदर्शन, सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी जनतंत्र के बुनियादी सिद्धांत और आधार होते हैं। कोई भी निर्वाचित सरकार इन लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती है। अगर दशकों पहले इस प्रसंग को शिक्षा पाठ्यक्रम से जोड़ दिया गया होता तो उसके गुण-दोष से आज की युवा पीढ़ी सुपरिचित होती। आपातकाल को शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ा जाना इसलिए भी आवश्यक है कि आपातकाल लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के विपरित एक ऐसी तानाशाही विचारधारा है जिसे भारत ही नहीं दुनिया का हर सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देशों द्वारा खारिज किया जाता है।

युवाओं को जानना होगा कि आपातकाल का मूल कारण 12 जून, 1975 का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह फैसला था जिसमें न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने श्रीमती इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को यह कहकर रद्द कर दिया था कि चुनाव भ्रष्ट तरीके से जीता गया। इसे ध्यान में रखते हुए न्यायमूर्ति ने श्रीमती इंदिरा गांधी पर छः साल चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी इस फैसले का सम्मान करने के बजाए सत्ता बचाने के खेल में जुट गयी। उनके पास बचाव के सिर्फ दो ही उपाय थे। या तो वह न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हुए अपने पद से इस्तीफा देती या संविधान का गला घोंटती। उन्होंने दूसरे रास्ते को चुना और संविधान को निलंबित कर दिया।

आंतरिक सुरक्षा को मुद्दा बनाकर बगैर कैबिनेट की मंजूरी लिए ही देश पर आपातकाल थोप दिया। यही नहीं उन्होंने संवैधानिक नियमों को ताक पर रख उच्चतम न्यायालय के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी कर चैथे नंबर के न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर स्थगनादेश जारी किए जाने के बाद श्रीमती गांधी और उग्र हो उठी। उन्होंने संविधानेत्तर सरकार चला रहे अपने पुत्र संजय गांधी की मदद से उन सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मटियामेट करना शुरु कर दिया जो लोकतंत्र की संवाहक थी। श्रीमती गांधी की सरकार अत्याचार की सभी सीमाएं लांघ गई। श्रीमती गांधी ने जयप्रकाश नारायण समेत उन सभी आंदोलनकारियों को मीसा और डीआइआर कानूनों के तहत जेल भेज दिया जो आपातकाल का विरोध कर रहे थे।

सरकार ने प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया। यहां तक कि समाचार पत्रों को अपने संपादकीय का स्थान रिक्त छोड़ने की भी अनुमति नहीं दी। दरअसल वे संपादकीय को रिक्त छोड़ा जाना अपनी सरकार के खिलाफ समझती थी। उन्होंने निष्पक्ष पत्रकारों और संपादकों पर भी डंडा चलाना शुरु कर दिया। मोरार जी देसाई के शासन काल में गठित शाह आयोग की रिपोर्ट में सरकार की निरंकुशता का दिलदहला देने वाले सच उजागर हुआ। इस रिपोर्ट में कहा गया कि आपातकाल के दौरान गांधी जी के विचारों के साथ-साथ गीता से भी उद्धरण देने पर पाबंदी थी। श्रीमती गांधी के समर्थकों ने आंदोलन की धार कुंद करने के लिए यह प्रचारित करना शुरु कर दिया कि जयप्रकाश नारायण का आंदोलन फासिस्टवादी है।

सरकार के अत्याचार की पराकाष्ठा का परिणाम रहा कि बिना अभियोग चलाए ही लाखों आंदोलनकारियों को हिरासत में ठूंस दिया गया। सरकारी संस्थाएं सरकार से डर गयी और उसके सुर में सुर मिलाने लगी। लेकिन कहते हैं न कि लोकतंत्र में तानाशाही की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती और अंततः लोकतंत्र ही जीतता है। कुछ ऐसा ही हश्र श्रीमती गांधी की तानाशाह सरकार के साथ भी हुआ। लोकतंत्र जीत गया। वर्ष 1977 के आम चुनाव में जनता ने श्रीमती गांधी की सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंका और आपातकाल की रीढ़ तोड़ दी। विश्व इतिहास गवाह है कि जन आंदोलनों के आगे दुनिया की हर तानाशाह सरकार झुकती रही है। रुस की जारशाही और फ्रांस की राजशाही भी जन आंदोलनों को डिगा नहीं पायी। आज सर्वाधिक चिंता इस बात की है कि देश में आपातकाल थोपे जाने के पांच दशक बाद भी उसे रोकने का अभी तक कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं बनाया गया है।

उचित होगा कि संविधान में कुछ इस तरह का प्रावधान किया जाए कि दोबारा आपातकाल थोपे जाने की न तो गुंजाइश बचे और न ही कोई निर्वाचित सरकार ऐसा दुस्साहस दिखाए। स्वाभाविक है कि जब इस तरह का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं होगा तो आपातकाल की आशंका बनी रहेगी। बहरहाल अच्छी बात है कि जिस दौर में आपातकाल थोपा गया उसके बाद हमारा लोकतंत्र कमजोर होने के बजाए और ताकतवर व परिपक्व हुआ है। नागरिक अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सतर्कता बढ़ी है। न्यायपालिका दबावमुक्त, स्वतंत्र और सक्रिय हुई है। मीडिया आजादी की कुलांचे भर रही है। इन सबके बीच अगर आपातकाल की घटना को शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ दिया जाए तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी को और अधिक मजबूती मिलेगी। साथ ही इस संबंध में युवाओं के विचार भी खुलकर सामने आएंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है लेख में उनके अपने विचार हैं)

 

 

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