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रामकृष्ण मठ में मनाई गई स्वामी अद्वैतानन्द की जयंती

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SPL REPORTER – AMIT CHAWLA 

LUCKNOW NEWS।

बुधवार को रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में स्वामी अद्वैतानन्द जयंती भव्य रूप से मनाया गयी। सुबह शंखनाद व मंगल आरती के उपरांत वैदिक मंत्रोच्चारण, ’नारायण शुक्तम’ का पाठ और ’जय जय रामकृष्ण भुवन मंगल’ का समूह में गायन स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज के नेतृत्व में हुई तत्पश्चात स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज द्वारा (ऑन लाइन) सत्प्रसंग हुआ।

शाम मुख्य मंदिर में संध्यारति के उपरांत रामकृष्ण मठ, लखनऊ के स्वामी पारगानन्द के नेतृत्व में स्वामी सारदानन्दजी द्वारा रचित ’सपर्षद-श्री रामकृष्ण स्तोत्रम’ का पाठ हुआ । स्वामी अद्वैतानंद जी की जन्म जयंती के अवसर पर संध्या कालीन प्रवचन में रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने बताया कि स्वामी अद्धैतानंद जी भगवान श्री रामकृष्ण के अंतरंग संन्यासी पार्षद के भीतर स्वामी अद्वैतानंद जी एक विशिष्ट आसन अधिकार करके विराजमान हैं।

इनकी उम्र श्री रामकृष्ण से भी ज्यादा थी एवं अति साधारण अवस्था से संसार के एक दुर्दैव के समय वह भगवान श्री रामकृष्ण के आश्रय में आये थे। स्वामी जी ने कहा कि श्री रामकृष्ण के उपदेश पालन करते हुए अति साधारण अवस्था से असाधारण अवस्था में अपने को उन्नीत करने में समर्थ हुए थे। 1828 ई. में कोई एक समय पर पश्चिम बंगाल के जगद्दल (राजपुर) में उनका आविर्भाव हुआ था।

वह कोलकाता में एक हार्डवेयर दुकान के कर्मचारी रूप से साधारण जीविका निर्वाह करते थे। उस समय उनका अचानक पत्नी वियोग होने से दुःख को निरसन् करने के लिए दक्षिणश्वर में श्री रामकृष्ण के पास पहुँचे थे एवं श्री रामकृष्ण के भगवत् प्रेम में आकृष्ट होकर अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया था।

भगवान श्री रामकृष्ण के जितने भक्त थे उनमें मानो एक आदर्श रूप से उनका जीवन माना जाता है। वह बहुत ही आदर्शवादी थे एवं अपना कर्म स्वयं करते थे तथा बहुत ही परिश्रम करते थे। प्रत्येक कार्य सुचारु रुप से करने का उनका एक आश्चर्य शैली था। जैसे श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है-’योगः कर्मसु कौशलम’ अर्थात कर्म में कुशलता ही योग है, इसका रूपांतरण हम आपके जीवन में देखते हैं।

अगर उनके कोई सहकारी उनका मनोरुप कार्य करने में असमर्थ रहते थे, वो पहले उनको बहुत डाँटते थे। उन्होंने कहा कि उसके बाद उनको एक आश्चर्य दर्शन हुआ। उन्होंने देखा कि भगवान ही विभिन्न रूप से उनके चारों ओर विराजमान है। भगवान का यह अखंड रूप दर्शन करने के उपरांत और वह किसी को दोष दर्शन करने में असमर्थ हो गए और सबको प्यार से वार्तालाप करते थे।

सत्य के प्रति उनकी असाधारण निष्ठा थी कारण श्री रामकृष्ण सत्य स्वरूप थे। उन्होंने बहुत ही कठोरता से एक संन्यासी का जीवनयापन किया। उनको रामकृष्ण मठ का ट्रस्टी चुना गया था। 1909 में एक सुदीर्घ आदर्श जीवनयापन करते हुए श्री रामकृष्ण चरण में विलीन हो गए थे। अन्त में प्रवचन के उपरान्त उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

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