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Article _____ सदन में मर्यादाओं का ध्यान रखना ज़रूरी

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डॉ. कन्हैया त्रिपाठी 

भारत की लोकतांत्रिक विरासत का जब ऐतिहासिक अवलोकन होगा तो भारतीय संसद की भी पड़ताल की जाएगी. इस क्रम में राज्य सभा और लोक सभा, सदनों का अध्ययन होगा. दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं. स्वतंत्र भारत के गौरवशाली 75 वर्ष बीत चुके हैं और अब तक इन दोनों सदनों में भारत के कोने-कोने से अद्भुत हस्तियाँ सदन की गरिमा को बढ़ायी हैं. ऐसे अनेक नाम व प्रतिष्ठित सांसद हैं जिन्होंने सदन में यश कमाया है, उनका नाम बहुत ही आदर से भारत के लोग लेते हैं. वस्तुतः किसी भी सदन की गरिमा सांसदों के व्यवहृत आचरण से बढ़ती और घटती है. यह सांसदों को तय करना होता है कि हमें अपनी छवि किस प्रकार की सबके समक्ष ले जानी है.

देश की सर्वोच्च पंचायत के लिए जानी जानी वाली भारतीय संसदीय प्रणाली में लोकसभा और राज्यसभा की ओर भारत और पूरी दुनिया की दृष्टि होती है. भारत की आमजनता भले ही सब कुछ से अवगत न हो. वह अपने जीवन के बहुतेरे पल लोक सभा और राज्य सभा की शोर व निर्णय से बिना प्रभावित किए काट लिया हो लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में इन दोनों सदनों की बहसों, परिचर्चाओं, प्रस्तावों और अनुमादानों का फ़र्क देश के हर व्यक्ति पर पड़ता है. ऐसे में, हमारे संसद की भूमिका बहुत अहम् है. दोनों सदनों में चुने और नामित सदस्यों के कार्यव्यवहार, प्रस्ताव, प्रश्न, आचरण, परिचर्चा, बहस और अनुमोदन, पक्ष-प्रतिपक्ष में सुझाये गए तर्क और सरकार के साथ, सरकार के लिए, सरकार के बाद देशहित के लिए रखे गए विचारों का आंकलन कभी न कभी होता है. आप किस पार्टी में थे, किस विचारधारा से थे. आप किस संस्कृति और भाषा के साथ थे, यह मूल्यवान आपके समय में होता है. लेकिन जब समय आगे निकल जाता है तो लोग इसे आंकलित करने की अपेक्षा इस चीज का आंकलन करते हैं कि आपके लिए देश कितना महत्वपूर्ण था. आप देशहित में कितने थे. आपके भीतर की आत्मा ने आपको अपने देश हित के लिए जब खड़ा होने के लिए बार-बार पुकारा तो आप आत्मा की भी न सुनकर अपने हित की सुनते रहे तो आपको आपके बाद की पीढ़ियाँ कदाचित वह महत्त्व नहीं दें, जिसकी आप जीवन भर अपेक्षा करते रहे.

भारत की संसद में इसलिए जो चयनित होकर या नामित होकर सदन की गरिमा बढ़ाने के लिए सौभाग्य प्राप्त करते हैं, उन्हें सतर्क रहना चाहिए. उन्हें अपने आचार-व्यव्हार और अपनी जिम्मेदारी के साथ जीने की आदत तो होनी ही चाहिए. वैसे भी भारत की दोनों सदनों में कितने दागदार पहुँच रहे हैं, इसकी चर्चा भारत में होती है और मामला जहाँ का तहाँ रह जाता है. देश की चुनाव में शामिल होने वाली पार्टियों में ऐसा साहस ही नहीं बचा है कि वे यह कह सकें कि हमें किसी भी तरह के दागदार हमारी पार्टी के लिए स्वीकार नहीं हैं, जो अच्छी छवि के हैं, वे ही हमारे पार्टी में सम्मिलित होकर देश की सेवा के लिए हमारे साथ आएं. यह मामला इसलिए पार्टियों के नैतिक साहस का भी है. पार्टियों के देश हित में सोच का इससे खुलासा हो जाता है. यदि वे देश हित चाहतीं तो शायद ऐसा करतीं. उनके एजेंडे में यह शर्त शामिल होती.

सदन में सांकेतिक आचरण भी मायने रखते हैं. प्रायः मनुष्य अनेक बात सांकेतिक ही प्रकट करता है. शब्दों के अभाव में, अपनी बात को गंभीर बनाने के लिए, अपनी बात को सशक्त तरीके से पेश करने के लिए वह सांकेतिक भाषाओँ का प्रयोग करता है. यदा-कदा इन सांकेतिक भाषाओँ में कुछ ऐसे भी सांकेतिक अभिव्यंजनाओं का प्रकट होना जो अवांछित हैं या किसी को दुखी कर देने वाली हैं, वे अभिव्यंजनाएं व्यक्ति परभारी पड़ती हैं. भले ही इसके पीछे उस व्यक्ति का कोई वैसा भाव नहीं हो, पर उसकी व्याख्याएं कुछ इस प्रकार होने लगती हैं जो कुतर्क को जन्म देती हैं. विवाद पैदा करती हैं. गतिरोध डालती हैं. गरिमा के साथ खेलती हैं. ऐसी चीजें पूरी राज्य में रह रही आबादी के ऊपर अपना असर डालती हैं जो की अवांछनीय रहीं, थीं और रहेंगी भी. पर इसके पीछे छुपी राजनीति बेवजह की बहस को जन्म देती हैं, उसका भी भुगतान जनता के हितों से होता है. सदन न चलने पर यदि इस कारण से गतिरोध होंगे तो पूरे भारत का नुकसान होगा. यह बातें जनसामान्य रूप से लोग समझने की कोशिश भी नहीं करते कि हम किसकी कीमत पर ऐसे बेवजह की बहस में फंसे जा रहे हैं.

आमजनता को संबोधित करते हुए प्रायः लोग अपनी मर्यादाओं को लांघ जाते हैं. वे अपने चुनावी हित या अपनी सोच के मुताबिक हित के लिए अपनी मर्यादाओं को लांघते हैं. अब सदन में ऐसा हो रहा है. राहुल गाँधी के फ़्लाइंग किस को लेकर उपजे सवाल और इसके बाद उठे शोर अब इस ओर हमारा ध्यान खींच रहे हैं कि सदन में मर्यादाओं का ध्यान रखना ज़रूरी है. विगत बार राहुल गाँधी के आँख मारने पर बहस तेज हुई थी. अब उनके फ़्लाइंग किस पर बवाल हो रहा है. अब राहुल गांधी के इस अवांछित सांकेतिक भाषा में कहने की कोशिश हमें सचेत कर रहे हैं कि संसद में सांसद गरिमा के अनुकूल आचरण बरतें. उनके होने, दिखने, कहने और प्रकट करने पर देश भर की निगाहें हैं. संवेदनशील जन की निगाहें हैं.किसी बात के क्या मायने निकले जायेंगे और किसी बात के क्या असर होंगे, यह कोई नहीं जानता इसलिए हमारे कोड ऑफ़ कंडक्ट पर भी अब सचेत होने की आवश्यकता है. लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों को कुछ ज्यादा ही अब ध्यान देने की आवश्यकता है.

प्रदेशों में भी जो विधानसभा और विधान परिषद् की गरिमा को के अभिवृद्धिकर्ता हैं, आपसे सीखते हैं. उन सदनों के माननीय चयनित या नामित सदस्य आपको फ़ॉलो करते हैं, तो संसद के सदस्यों को अपने हर दृष्टिकोण से आचार-व्यवहार में मर्यादा दिखाना, आज अच्छे सांसद के लिए ज़रूरी हो गया है. अब तक बातें होती थीं कि संसद में अपराधी न जाएँ. अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े लोग इसमें कैसे शामिल कर लिए जा रहे हैं? अब मामला केवल वहीँ तक नहीं है. अब सभी सांसदों को यह ध्यान देना ज़रूरी सा हो गया है कि हम अपनी मर्यादा को अपनी सामाजिकी में प्रकट करें साथ ही सदन में भी हमारे व्यवहार इस प्रकार हों, जो लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनें. सांकेतिक भाषाओँ का भी सहयोग लेने पर यह बार-बार सोचें कि इसके क्या अर्थ हैं और यह कहीं किसी के लिए पीड़ादायी तो नहीं बनने वाली है. सबसे अहम् बात यह है कि हमारे देश की दोनों सदनों को अपनी प्रतिष्ठा से भरना है न कि मजाक से. भारतीय इतिहास में हमारी सदनों में शामिल लोगों के आचरण इसलिए बहुत ही मायने रखते हैं. कल सत्ता में कोई था, आज सत्ता में कोई है, कल सत्ता में कोई और शामिल होगा लेकिन सबसे पहले भारतीय अस्मिता और पहचान को गरिमा प्रदान करने के लिए यदि हमारे नेतृत्वकर्ता सोचेंगे तो ऐसी नौबत आयेगी ही नहीं जिस पर हम शर्मिंदित हों.

स्मरण यह रखना आज आवश्यक है कि देश-काल-परिस्थितियां बदलेंगी. युग बदलेगा. सभ्यताएं भी करवट लेंगी. लेंकिन सबका अपना समय इतिहास में अंकित हो रहा है. समय सबके सच को उजागर करता है. समय रहते मर्यादित होने का स्वांग न करके मर्यादित होने में ही इसलिए भलाई है, नहीं तो पीढ़ियां हमारे इस आचरण पर हँसेंगी.

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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी-ओएसडी रह चुके हैं। आप केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में चेयर प्रोफेसर और अहिंसा आयोग और अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं।

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