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हर्षोल्लास का महापर्व होली ….. 

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होली हमारे देश का प्राचीनतम राष्ट्रीय पर्व है। जो कि प्रतिवर्ष नवीन उल्लास व स्फूर्ति लेकर आता है। इस त्योहार में न कोई वर्ग भेद है और न ही कोई जाति भेद। भक्त प्रह्लाद व होलिका की पौराणिक कथा के सन्दर्भ में यह अधर्म पर धर्म की विजय का महोत्सव है। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि जिस प्रकार भक्त प्रह्लाद के समक्ष होलिका का कोई महत्व नही रहा, उसी प्रकार पुण्य के समक्ष पाप का कोई अस्तित्व नही है। सत्य सदैव ही असत्य पर विजय प्राप्त करता है।

होली के त्योहार की जो सबसे बड़ी विशेषता है वो यह है कि इस त्योहार को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं बालक,वृद्ध, स्त्री, नवयुवक आदि सभी अत्यंत धूमधाम के साथ मनाते हैं। होली के त्योहार का “भविष्य पुराण” में विस्तार से वर्णन है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के द्वारा होलिकोत्सव मनाए जाने का विस्तृत वर्णन गोस्वामी तुलसीदास कृत “गीतावली” में है।

होलिकादहन में अग्नि की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि अग्नि को परमात्मा का स्वरूप माना गया है। इनकी वन्दना से हमें दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ती मिलती है। यदि हम लोग होलिका दहन के सही अर्थ को समझें तो सम्पूर्ण विश्व में आतंकवाद जैसी समस्या ही न रहे। क्योंकि यह समस्या मुख्य रूप से दुर्भावना की ही देन है। अतैव होलिका दहन के अवसर पर हम सभी को अग्नि देव से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम सभी पारस्परिक बैर-भाव भूल जाएं और प्रेम पूर्वक होली का त्योहार मनाएं।होली के त्योहार का आध्यात्मिक महत्व भी है। वैदिक काल में इसे “नवन्नेष्टि” नाम से भी सम्बोधित किया जाता था। उस समय अधपके अन्न का यज्ञ में हवन कर प्रसाद वितरण करने का विधान था। इस अन्न को “होला” कहते थे। कालांतर में यही “होला” शब्द होली बन गया।

होली का त्योहार एक-दूसरे को समीप लाने और आपस की स्वतंत्रता को समाप्त करने के लिए भी प्रसिद्ध है। अतः हम सभी को इस दिन अपनी बुराइयों को त्यागने का संकल्प लेना चाहिए।
हमारे समूचे देश में इस पर्व को मनाने का ढंग अत्यंत वैविध्यपूर्ण है। 15वीं व 16वीं शताब्दी के भक्ति युग में ब्रज की होली को इतना बड़ा धरातल प्रदान किया जो कि सम्पूर्ण भारत की धर्मप्राण संस्कृति में अपना एक विशेष महत्व रखती है।

ब्रज की होली अपनी अनूठी और अनोखी परम्पराओं के कारण समूचे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां होली की विधिवत शुरुआत बसन्त पँचमी से हो जाती है और यहां के सभी मंदिरों में ठाकुर जी के समक्ष नित्य-प्रति के श्रृंगार में गुलाल का प्रयोग होने लगता है। होली का यह रंग माघ शुक्ल पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक पूरे 50 दिनों समूचे ब्रज के कण-कण में छाया रहता है। ब्रज की होली का प्रथम चरण यहां के राधारानी मानसरोवर मन्दिर में फाल्गुन कृष्ण एकादशी को राधा रानी के मेले से शुरू होता है। मथुरा के बरसाना कस्बे में फाल्गुन कृष्ण अष्टमी को लड्डू की होली व फाल्गुन शुक्ल नवमी को विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली होती है।

जिसमें बरसाना की हुरियारिनें (स्त्रियां) नंदगाँव के हुरियारों(पुरुषों) पर लाठियों से प्रहार करती हैं। जिन्हें कि नंदगांव के हुरियारे अपनी ढालों पर रोकते हैं। फाल्गुन शुक्ल दशमी को नंदगांव में भी लट्ठमार होली होती है। मथुरा के फालैन व जटवारी ग्राम में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को जलती हुई होली की विशालकाय आग की लपटों में से ग्राम का प्रह्लाद भक्त पण्डा नंगे पांव बाहर निकलता है। परन्तु उसका बाल तक बांका नही होता है।

धुलेंडी के दिन सारे देश में होली का विश्राम हो जाता है। परन्तु ब्रज में इसके 10 दिन बाद तक भी होली का त्योहार किसी न किसी रूप में मनाया जाता रहता है। धुलेंडी के दिन से 4 दिन बाद तक समूचे ब्रज में “तानों” के गायन का क्रम चलता है। चैत्र कृष्ण द्वितीया को बल्देव के ठाकुर दाऊदयाल मन्दिर में दोपहर लगभग 12 बजे दाऊजी का हुरंगा होता है। इस हुरंगे में गुसाईं समाज की हुरियारिनें (स्त्रियां) , हुरियारों (पुरुषों) के शरीर से उनके वस्त्र फाड़कर और उनके कोड़े बना कर उनसे गीले बदन हरियारों की पिटाई करती हैं।

इसके प्रत्युतर में ब्रज के यह वीर हुरियारे मन्दिर में बने हुए कुंड में से पिचकारियों व बाल्टियों में रंग भर-भर कर हुरियारिनों को रंग से सराबोर कर देते हैं। इसी दिन मथुरा के जाव ग्राम में भी अत्यंत रसपूर्ण हुरंगा होता है। इसमें जाव ग्राम की स्त्रियां व बठैन ग्राम के पुरुष भाग लेते हैं। चैत्र कृष्ण तृतीया को बठैन ग्राम में भी लट्ठमार हुरंगा होता है।

ब्रज की होली की मस्ती में धुलेंडी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक जगह-जगह चरकुला नृत्य, हल नृत्य, हुक्का नृत्य, बम्ब नृत्य, तख्त नृत्य, चाँचर नृत्य एवं झूला नृत्य आदि अत्यंत मनोहारी नृत्य भी होते हैं। साथ ही चैत्र कृष्ण तृतीया से चैत्र कृष्ण दशमी तक निरन्तर 7 दिनों तक ब्रज के समस्त मंदिरों में फूलडोल की छटा छाई रहती है। साथ ही सुमधुर होलियों का गायन भी होता है। अनेक स्थानों पर फूलडोल के मेले भी लगते हैं।

रंगों का त्योहार होली समूचे देश में कई रूपों में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इन सभी के साथ अपने-अपने आंचलिक नाम,महत्ता और कहानियां जुड़ी हुई हैं। बिहार में होली को “फगुआ” या “फ़ाल्गुन पूर्णिमा” भी कहा जाता है। “फगु” का अर्थ होता है लाल रंग और “पूर्णिमा” यानि पूर्ण चंद्र ।

बिहार में होलिका दहन को “सम्वत्सर दहन” भी कहा जाता है।
हरियाणा में धुलेंडी के दिन भाभियाँ अपनी साड़ियों से कोड़े बना कर अपने देवरों को पीटती हैं।इस पर देवर अपनी भाभियों को मिठाईयों का उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करते हैं।साथ ही लोग-बाग अपनी-अपनी सुविधानुसार किसी एक स्थान पर एकत्रित हो कर दही की मटकी फोड़ते हैं।

महाराष्ट्र के लोग होली को “रँग पंचमी” कहते हैं। यहां के लोग, विशेषकर मछुआरे इस त्योहार को “शिमगो” कहते हैं। इस दिन यहां के लोग खूब नाचते, गाते और खुशियां मनाते हैं। साथ ही इस दौरान सभी अपनी-अपनी खुशियों व दुखों को एक-दूसरे को बता कर आपस में “शेयर” करते हैं।इसके अलावा अपने हाथ और मुँह के सहारे एक विचित्र शैली में आवाज निकालते हैं।

पँजाब में होली के अवसर पर 3 दिन तक “होला मोहल्ला” नामक वार्षिक मेला जुड़ता है।जो कि वृहद स्तर पर आनंदपुर साहिब में लगता है। इसे सिखों के दसवें गुरु गुरुगोविंद सिंह ने शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य सिख युवकों को शारीरिक रूप से मजबूत करना है। इस मेले में सिख नवयुवक कई तरह के कारनामे भी दिखाते हैं। इस मेले का समापन शोभायात्रा व लंगर के साथ होता है।

तमिलनाडु में होली के अवसर पर लोग-वाग कामदेव की पूजा करते हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान शिव के कोप के कारण कामदेव जल कर भस्म हो गए थे। लेकिन बाद में उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उन्हें जीवन दान दे दिया था। तमिलनाडु वासियों की ऐसी मान्यता है कि होली के ही दिन कामदेव पुनः जीवित हुए थे, इसलिए तमिलनाडु वासी इस दिन लोक-गीतों के माध्यम से रति की व्यथा-कथा गाते हैं। साथ ही कामदेव को जलन से मुक्ति दिलाने के लिए चन्दन अर्पित करते हैं।

विडम्बना है कि हर्षोल्लास, प्रेम, सौहार्द्र एवं भाईचारे आदि का त्योहार होली अब विभिन्न विसंगतियों के चलते अशोभनीय कृत्यों, फूहडताओं एवं विकृतियों आदि से ग्रस्त हो गया है। जिसके कारण लोग-वाग नशा करते हैं, जुआ खेलते हैं एवं पुरानी रंजिशों को निकालते हैं।व्यापक जनहित में इस सब पर अंकुश लगना चाहिए ताकि होली जैसे सनातन संस्कृति के पावन व प्रेमपूर्ण इस त्योहार की अस्मिता सुरक्षित रह सके।

डॉ. गोपाल चतुर्वेदी
वृन्दावन

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं आध्यात्मिक पत्रकार हैं)

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