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Reality : छदम धर्मनिरपेक्षता की बलिवेदी पर भेट चढ़ता न्याय

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प्रस्तुति- … नैमिष प्रताप सिंह …

राम मोहन गुप्ता – रामबाबू गुप्ता हत्या कांड

मेरे बेटे के हत्यारो को बेनक़ाब कर उन्हें फासी दी जाए… यह चीख थी… पुकार थी… उस मंगला देवी की जिसके पुत्र रामबाबू गुप्ता को अम्बेडकरनगर जिले के टांडा कसबे में गत ३ मार्च को खुलेआम जान से मार दिया गया था। ३८ फीसदी आबादी के साथ टांडा में अल्पसंख्यक हो चुके हिन्दुऒ सहित अन्य समुदायो के बेबसों – पीडितो पर होने वाले किसी भी प्रकार के अन्याय – अत्याचार के विरुद्ध उठ खड़े हो जाने वाले हिन्दू युवा वाहिनी के जिला अध्य्क्ष रहे रामबाबू की हत्या के चलते मर्मान्तक पीड़ा से आकुल – व्याकुल उसकी माँ की पुकार शासन – प्रशासन ने नहीं सुनी। अपराधियो के हौसले बुलंद हुए। कानून के राज्य होने की अवधारणा पर तमाचा मारते हुए टांडा कसबे में संगठित अपराध को अंजाम दे रहे गिरोह ने ४ दिसम्बर को सरेराह रामबाबू गुप्ता की हत्या के प्रमुख गवाह रहे राममोहन गुप्ता की हत्या कर दिया।

आगामी लोकसभा के चुनाव को ध्यान में रखकर वोटो का समीकरण मजबूत होते देख रजनीतिक सौदागरो के चेहरे पर भले ही मुस्कान थिरक रही हो लेकिन लोकतान्त्रिक / मानवीय मूल्यो के रक्षार्थ अपना बलिदान देने वाले रामबाबू – राममोहन के परिवार वाले न्याय के लिए तड़फ रहे है. सड़क से लेकर विधानसभा तक मामला गूज रहा है लेकिन पुलिस मुख्य साजिशकर्ता से पूछताक्ष करने का साहस नहीं जुटा पा रही है. राममोहन के परिजनो से बातचीत की जाये तो साफ़ जाहिर होता है कि अब उन्हें शासन – प्रशासन से न्याय की कोई उम्मीद नहीं रह गई है.

संज्ञान में लेने की जरुरत है कि गत ३ मार्च को जब रामबाबू की हत्या हुई थी तब भी उनके घरवाले राममोहन की हत्या के मुख्य आरोपी टांडा के सपा विधायक अज़ीमुलहक उर्फ़ पहलवान को ही मुख्य आरोपी मान रहे थे लेकिन पुलिस ने रामबाबू के परिवार पर इतना दबाव बनाया कि तब उनके खिलाफ नामजद मुक़दमा दर्ज नहीं हो सका था। प्रशासन ने सपा विधायक के खिलाफ मुक़दमा दर्ज न हो इसके लिए पूरी शक्ति लगा दिया तो दूसरी और रामबाबू के भाइयो :ज्ञानप्रकाश, वेदप्रकाश और श्यामबाबू के खिलाफ गुंडा एक्ट का मुक़दमा दर्ज कर दिया। इतना ही नहीं बल्कि रामबाबू के परिवार वालो को लगातार उनकी हत्या की पैरवी न करने की धमकी दी गयी। १४ मार्च , ५ अप्रैल और २७ मई को रामबाबू के भाइयो ज्ञानप्रकाश – वेदप्रकाश की सूचना पर अलीगंज थाने में इस सन्दर्भ में मुक़दमा भी दर्ज हुआ।राममोहन को ७ जून को एसएमएस के द्वारा धमकी दी गयी। इतना कुछ होने के वावजूद अम्बेडकरनगर प्रशासन ने रामबाबू की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाये।

यदि पुलिस और नागरिक प्रशासन का रवैया विधि के समक्ष समता को अभिव्यक्त कर रहा है तो राममोहन की हत्या के बाद उसके शव के साथ अहिंसक सत्याग्रह कर रहे उनके परिजनो पर लाठिया क्यों चली ? महिलाओ के साथ अभद्रता क्यों हुई ? राममोहन के शव को घसीटते हुए पुलिस गाड़ी पर क्यों लादा गया ? जिले के शीर्ष पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी पोस्टमार्टम के बाद राममोहन के शव को घर के बजाय सीधे शमसानघाट क्यों ले जाने पर अमादा थे ? जबकि हिन्दू धार्मिक मान्यताओ के अनुसार शव के दाह – संस्कार के पहले उसे घर के आगन में जरुर रखा जाता है। आखिरकार अम्बेडकरनगर जिला प्रशासन को किसी हिन्दू की धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार किसने दिया ? अम्बेडकरनगर जिला प्रशासन संविधान के प्रति उत्तरदायी है या गुप्ता परिवार को ख़तम करने वाले गिरोह के प्रति। यदि वह सब कुछ विधिसम्मत है तो फिर राममोहन गुप्ता के शव के साथ प्रदर्शन कर रहे उनके परिजनो पर लाठीचार्ज के बाद उनका चिकत्सीय परीक्षण करने में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर तरह – तरह की परेशानी क्यों खड़ी की।

सच यह है कि वह का प्रशासन असामाजिक तत्वो को के इशारे पर कदमताल कर रहा है। इसे इस तरह से समझा जाये कि जब राममोहन की हत्या हुई तब वहाँ पुलिस पीकेट अपनी ड्यूटी से गायब हो गयी। हत्या के समय विजली कट गई और हत्यारो के भाग जाने के बाद विजली आ गयी। कुलमिलाकर यदि यह कहा जाये कि प्रशासन के एक पक्षीय होने और टांडा में गुंडाराज चलाने वालो के चलते रामबाबू के परिवार वालो की स्थिति कश्मीरी हिन्दुऒ की तरह से है जहा उनके लिए केवल मृत्यु अथवा पलायन का ही विकल्प शेष है.

अब टांडा में रामबाबू गुप्ता – राममोहन गुप्ता की हत्या के बाद हिन्दुऒ के अस्तित्व बने रहने पर सवालिया निशान लग गया है। जो पुलिस टांडा में भय और आतंक का राज्य कायम करने वालो के हाथो खिलौना बनी हुई है वह यदि हत्या की जाँच करेगी तो परिणाम पहले से ज्ञात है. दिखावे के लिए जो गिरफ्तारिया हो रही है लेकिन जिस सपा विधायक के खिलाफ १५८ /१३ धारा ३०२ / १२०बी का मुकदमा दर्ज हुआ है उससे पुलिस पूछताक्छ का साहस नहीं कर पा रही है. इसी वर्ष के मार्च माह में प्रतापगढ़ जिले में तिहरा हत्याकांड हुआ था। दो गुटो के आपसी संघर्ष में एवं जनाक्रोश के चलते मृत्यु का शिकार हुए सी. ओ. की पत्नी की प्रत्येक जायज – नाजायज मांगे राज्य सरकार द्वारा मानी गयी। प्रधान नन्हे यादव और उनके भाई सुरेश यादव की विधवाओ को २० – २० लाख रुपए का चेक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा दिया गया। मृतक यादव भाइयो के पिता दुखीराम को सांत्वना देते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि प्रदेश सरकार उनके साथ है और उनकी प्रत्येक जरुरत पूरी की जायेगी। मुख्यमंत्री ने घर के सभी बच्चो से बात किया था और उनके शिक्षा की वयस्था मुफ्त में करने का वायदा भी किया था.

प्रतापगढ़ में हुई हत्या के आश्रितो के साथ यह दरियादिली और अम्बेडकरनगर में एक ही परिवार में हुई दो हत्याओ के आश्रितो के प्रति यह बेरुखी क्यों ? सरकारी खजाना किसी की जागीर नहीं है जिसे अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने में खर्च किया जाये ताकि पार्टी मजबूत हो।

आख़िरकार यह कैसा न्याय है , कैसा लोकतंत्र है , कैसा समाजवाद है …??? जिसमे हत्या के प्रति प्रतिक्रिया भी राजनीतिक गुणा – भाग का आकलन करके की गयी है ? यह कैसे मुख्यमंत्री है जो प्रतापगढ़ में हुई हत्याओ को लेकर उनके घर जाकर अपनी संवेदना वयक्त करते है और अम्बेडकरनगर में हुई हत्या के शिकार लोगो के परिवारवालो के प्रति तिरछी निगाह से देखना भी जरुरी नहीं समझते। कोई संदेह शेष नहीं है किं राज्य सरकार की नीति और नीयत दोनों राजनीतिक हितो का सशक्त बनाने तक सीमित है.

टांडा में हुए राममोहन – रामबाबू हत्याकांड से धर्मनिरपेक्ष राजनीति बेपर्दा हो गयी है। धर्मनिरपेक्ष राजनीति का दायरा इतना संकुचित है कि इस विचारधारा को मानने वाला कोई धर्मनिरपेक्ष नेता उस धरनास्थल पर नहीं पहुँच रहा है जहाँ रामबाबू का परिवार न्याय के लिए बैठा है। राममोहन की विधवा : सोनी देवी एवं उनकी पुत्रियो: आस्था (९ वर्ष ) और परी (१ वर्ष) तथा रामबाबू की विधवा: संजू देवी और उनके बच्चो : शिवम् , शुभम , नितिन और श्रृद्धा सहित उस परिवार के अन्य सदस्यों का करुण रुदन किसी धर्मनिरपेक्ष नेता को नहीं सुनायी पड़ रहा है. दो हत्याओ की पीड़ा – व्यथा झेल रहे उस हिन्दू परिवार के प्रति किसी भी धर्मनिरपेक्ष दल का कोई सरोकार नहीं है।अब न कोई न्याय रथ निकल रहा है और न कोई इन दो विधवाओ के आंसू पॊक्षने आ रहा है.

धर्मनिरपेक्ष राजनीति की यह मनोवृति है कि जो संसद पर हमले के गुनाहगारो – अफजल गुरु , २६/ ११ के रूप में मुम्बई हमले के गुनहगार – कसाब , भारत को नष्ट – भ्रस्ट करने पर अमादा हाफिज सईद की तरफदारी करने की इजाजत देती है लेकिन आंबेडकर नगर में दो – दो हत्याओ के चलते मर्मान्तक पीड़ा से आकुल – व्याकुल परिवार के आंसू ,यातना भरी पीड़ा और आतंक से सहमी जिंदगी के लिए मानवीय संवेदना वयक्त करने को प्रतिवंधित करती है.

भारत वह देश है जहाँ तीन बड़े युद्ध , कारगिल युद्ध , संसद – मुम्बई पर हमला और देश के भीतर मंदिर से लेकर न्यायलय , हास्पिटल से लेकर ट्रैन , पार्क से लेकर सिनेमाघर तक में बम विस्फोट का भारत को उपहार देने वाले देश पाकिस्तान का समर्थन करने और उससे दोस्ती करने वाले धर्मनिरपेक्ष लोग मौजूद है लेकिन अपने देश के गुप्ता परिवार से अपना प्यार – स्नेह – संवेदना जताने के लिए कोई धर्मनिरपेक्ष आत्मा आगे आने के लिए तैयार नहीं हैं. अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी और कश्मीर में आतंकवाद का नंगा नाच करने वाले जेहादियो को प्रत्येक तरह की सहायता प्रदान करने वाले परदेशी ओसामा बिन लादेन के अंतिम संस्कार में धार्मिक परम्पराओ का अनुपालन नहीं हुआ तो इसके लिए दुर्दांत धर्मनिरपेक्ष दिग्विजय सिंह ने छाती फाड़ – फाड़कर रुदन किया लेकिन देशी राममोहन गुप्ता के शव को ४- ५ दिसम्बर की रात को घसीटा गया, तरह – तरह से अपमानित किया गया और उसके घर की महिलाओ – बच्चो से अभद्रता हुई तब दिग्विजय सिंह या उनके जैसे किसी धर्मनिरपेक्ष ने इसे गलत नहीं ठहराया .

नोट – लेख के सभी तथ्य लेखक के द्वारा प्रस्तुत हैं।

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