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हिन्दी दिवस विशेष (HINDI DIWAS SPECIAL)_______ भारत की राजभाषा हिन्दी : दिशा और दशा

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भाषा सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है, जीवंतता,स्वायतता और लचीलापन भाषा के प्रमुख लक्षण है। एक कहावत है “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी”

भाषा हिन्दी को भारत की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह भारतीय एकता और विविधता को साझा करने का माध्यम है और सार्वभौमिक भाषा मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह विज्ञान, साहित्य, कला और व्यापार मे भी उपयोग होती है। इसके साथ ही हिन्दी भाषा बुनियादी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भारत सरकार ने इसे शिक्षा के क्षेत्र मे प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएँ चलाई हैं।

हिन्दी दीर्घकाल से अखंड भारत मे जन-जन की पारस्परिक संपर्क की भाषा रही है। भक्तिकाल मे अनेक संत कवियों ने हिन्दी मे रचना की और लोगों का मार्गदर्शन किया। केवल उत्तरी भारत मे ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों जैसे बल्लभाचार्य,रामानुज,रामानन्द आदि ने भी हिन्दी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भूषण, छत्रपति शिवाजी के राज कवि थे।

सन 1816 मे विलियम केरी ने लिखा कि हिन्दी किसी एक प्रदेश कि भाषा नहीं, बल्कि देश मे सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है। यद्यपि भारत एक बहुभाषी देश है, किन्तु बहुत लंबे काल से हिन्दी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर संपर्क भाषा के रूप मे प्रयुक्त होता था। स्वतन्त्रता आंदोलन मे हिन्दी पत्रकारिता ने महान भूमिका अदा की।

राजा राम मोहन राय, पंडित बलकृष्ण भट्ट, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी,सुभाष चन्द्र बोस, सुब्रमनियम भारती आदि अनेकानेक लोगों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का सपना देखा था। पंडित बालकृष्ण भट्ट जी एक सफल पत्रकार, निबंधकार,नाटककार, उपन्यासकार और व्यंगकार थे , हिन्दी गद्य साहित्य मे उनका विशेष योगदान रहा।

हिन्दी गद्य काव्य की रचना की शुरुआत भट्ट जी ने की थी। इनके द्वारा हिन्दी प्रदीप का सम्पादन भी किया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से सन 1877 मे प्रयागराज मे “हिन्दी वर्धीनी सभा” की स्थापना की गई, जिसके चलते उन्होने अनेक प्रकार की पुस्तकें लिखीं। पंडित मदन मोहन मालवीय और राजर्षि पुरषोत्तम दास टंडन जैसी विभूतियाँ भट्ट जी की शिष्य रहीं।

महात्मा गांधी ने सन 1917 के एक सम्मेलन मे कहा था कि भारतीय भाषाओं मे केवल हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप मे अपनाया जा सकता है क्यूंकी यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है; यह समस्त भारत मे आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक संपर्क माध्यम के रूप मे प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है।

18 अप्रैल 1900 नागरी प्रचारिणी सभा और पंडित मदन मालवीय जी के नेत्रत्व मे चले आंदोलन ने स्कूलों और कचहरियों मे हिन्दी भाषा के लिए द्वार खोल दिया। वर्ष 1905 मे बाल गंगाधर तिलक ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अधिवेशन मे देवनागरी को सभी भारतीय भाषाओं को संपर्क भाषा तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आह्वान किया। इससे देशभर मे समर्थन मिला और जगह जगह संस्थाएं बनने लगी,और हिन्दी भाषाई आयोजन होने लगे।

आप सभी को जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि वर्ष 1935 मे तामिलनाडु के मुख्यमंत्री स्वर्गीय सी राजगोपालाचारी ने अपने राज्य मे हिन्दी कि शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था, किन्तु आजकल के राजनेताओं कि गंदी राजनीति के कारण इस राज्य से हिन्दी बिलकुल खत्म सी हो गयी।

इन राजनेताओं ने हिन्दी को हटाने के नाम पर वोट मांगना शुरू कर दिया और राज्य मे हिन्दी को हाशिये पर लाने मे सफल रहे किन्तु पूर्व मे दक्षिण के कई आचार्यों और विद्वानो के द्वारा हिन्दी को बढ़ाने हेतु किए गए कार्य पर पानी फेरने मे कोई संकोच नहीं किया।

भारत के बाहर हिन्दी नेपाल,दक्षिण अफ्रीका, मौरिशस,यमन,अमेरिका,इंग्लैंड,युगांडा,जर्मनी,न्यूजीलैंड,कनाडा और खाड़ी के देशो मे प्रयोग की जाती है। दुनिया के 12 विश्वविद्यालयों मे इसके पठन पाठन की व्यवस्था है। विश्व हिन्दी सचिवालय मौरिशस मे स्थित है जो हिन्दी को बढ़ावा देने मे विशेष भूमिका निभा रहा है।

हिन्दी जानने वालों की संख्या मे निरंतर व्रद्धि हो रही है। ये लिंक भाषा है और लोगों के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करती है। सदियों से अपने अनोखेपन के कारण भारत दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। इसका ऐतिहासिक महत्व,व्यापारिक प्रसार,भौतिक संव्रद्धि, दार्शनिक सम्पदा ने विश्व को आकर्षित किया है।

मुगल आए और उसमे से कई लूट कर वापिस अपने स्थान को लौट गए, कई यंही बस गए। बचे हुए लोग यंहा की भाषा संस्कृति मे रच बस गए। कोलंबस असल मे सोने की चिड़िया भारत को खोजते हुए अमेरिका के तट पर जा लगा। हॉलैंड,डेन्मार्क,पुर्तगाल,फ्रांसऔर ब्रिटेन के लोग व्यापार करने यहाँ आए और अंततः इस देश पर राज करने लगे।

पंडित बालकृष्ण भट्ट जी भारतेंदु युग के महान लेखक, साहित्यकार, गद्य काव्य संग्रह, व्यंगकार और निबंधकार रहे।

भारतीय संविधान मे हिन्दी को कार्यालयी भाषा का दर्जा दिया गया है । भारत मे करोड़ों लोगों की मातृभाषा हिन्दी है, इससे कई गुना अधिक लोग इसे द्वितीय भाषा के रूप मे प्रयोग करते हैं। हिन्दी को राजभाषा नहीं अपितु राष्ट्रभाषा के रूप मे जानना चाहिए। भारत के बाहर जंहा भी भारतीय हैं उनमे से अधिकांश लोग हिन्दी मे बोलना पसंद करते हैं।

देश मे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और पर्यटन को बढ़ावा देने के कारण हिन्दी का प्रयोग राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा है। दुनिया की भाषाओं मे बोलने वालों की संख्या के आधार हिन्दी विश्व मे तीसरा स्थान रखती है। भारत मे हिन्दी को बोलचाल की भाषा बनाने मे बॉलीवुड और दूरदर्शन के कार्यक्रम का अहम योगदान है हिन्दी फिल्मों और टी वी सीरियल की हिन्दी को प्रचलित करने की भूमिका से कैसे इंकार किया जा सकता है।

जिसमे विशेष तौर पर रामानन्द सागर द्वारा प्रस्तुत “रामायण” और बी आर चोपड़ा द्वारा प्रस्तुत “महाभारत” का प्रमुख योगदान रहा। भारत के अहिंदी भाषियों तथा विदेश मे हिन्दी की लोकप्रियता का एक सशक्त माध्यम हिन्दी फिल्मे हैं। हिन्दी के कार्यक्रम रेडियो पर देश विदेश मे सुने जाते हैं, खासतौर पर हिन्दी फिल्मों की गीत माला। यू ट्यूब पर भी हिन्दी गीत- संगीत का खजाना है। इस्कॉन मंदिर पूरी दुनिया मे फैला हुआ है और उसके बड़ी संख्या मे विदेशी अनुयायी हैं जो कृष्ण भजन हिन्दी मे गाते हैं।

संविधान के अनुछेद 343 के खंड (1) के अनुसार देवनागिरी मे लिखित हिन्दी संघ की राष्ट्र भाषा है। 14 सितम्बर 1949, मे हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप मे स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान मे अनुछेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध मे व्यवस्था की गई । हिन्दी के विस्तार मे तकनीकि की महत्वपूर्ण भूमिका है। अब मोबाइल,कम्प्युटर पर हिन्दी लिखना पढ़ना सुलभ हो गया है। व्यापार भी शुरू से हिन्दी के प्रचार प्रसार का मुख्य माध्यम रहा है।

लेकिन इस बात को सुनकर दिल दुख से द्रवित हो उठता है जब आज के अभिवाहक बड़े गर्व से बताते हैं कि मेरे बच्चे की हिन्दी विषय छोड़कर सभी अन्य विषयों मे अच्छी पकड़ है, मै इसमे बच्चे की गलती नहीं मानता, केवल अभिवाहक ही पूर्ण रूप से इसके लिए जिम्मेदार हैं। हिन्दी भाषा को विश्व भाषा दिवस मनाने का एक उत्तम तरीका हो सकता है कि हम हिन्दी भाषी लोग अपने बच्चों से हिन्दी मे बात करें, उन्हे हिन्दी बोलने –पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। हम जब हिन्दी को सम्मान देंगे तभी सच्चे अर्थों मे उसे विश्व भाषा का दर्जा दिया जा सकेगा। तभी हिन्दी दिवस मनाना सार्थक होगा।

“हिन्दी हम आप से दुखी होकर कहती है वर्ष मे एक दिन विश्व हिन्दी दिवस मना कर मेरे लिए छाती कूटना बंद करो और बाकी के 365 दिन भी मेरा सही प्रयोग करो। मैं इतनी भी कठिन नहीं हूँ कि अन्य भाषा के सहारे से मुझे सरल बनाने कि अवश्यकता पड़े, और ना ही इतनी लाचार हूँ कि दूसरी भाषा कि बैसाखी ले कर चलूँ।“ इसीलिए आज हम सभी प्रतिज्ञा लें कि हम अपनी रोज कि दिनचर्या मे हिन्दी को अवश्य प्राथमिकता दें।

 

सर्व मित्र भट्ट
लेखक- वरिष्ठ प्रबन्धक (पंडित बालकृष्ण भट्ट के बिद्धित प्रपोत्र ) तुलन अनुभाग, अंचल कार्यालय,
लखनऊ, यूपी में कार्यरत ।

 

 

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