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हिन्दी दिवस पर विशेष— अपनों के बीच बेगानी हुई हिन्दी भाषा !

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नीरज सिंह–

(संपादक)

आज हिंदी दिवस है हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी देशभर में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है इसी दिन ही मातृभाषा हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था आज हम देश में 75 वें स्वतंत्रता दिवस को अमृत महोत्सव के रूप में मना चुके हैं I आजादी के 75 वर्ष बाद भी हमारी मातृभाषा हिंदी आज भी देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है आज भी हिंदी अपनी ही मातृभूमि पर बेगानी सी हो गई है I हम भले ही 75 वा स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं लेकिन आज भी मन से स्वतंत्र नहीं हो सके हैं , हमारी भाषा और संस्कृत पर अंग्रेजी हावी है अंग्रेजी कल्चर हमारी संस्कृति संस्कार को खोखला बना रही है ।लोगों का मानना है कि बिना अंग्रेजी के कुछ नहीं हो सकता मेरा बच्चा आगे नहीं बढ़ सकता है I लेकिन मेरे विचार इससे थोड़ा अलग है हमारे कैरियर के लिए अंग्रेजी आवश्यक है लेकिन जरूरत नहीं है इसका साफ सीधा उदाहरण देखने को चीन में मिलता है चीन अपनी ही मातृभाषा के बल पर आज पूरे विश्व में महाशक्ति के रूप में खड़ा हुआ है I एक विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है विश्व के हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रहा है I वहां अंग्रेजी जी दोयम दर्जे की है I लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमारे भारत देश में मातृ भाषा हिंदी ही दोयम दर्जे की हो चली है। और आज हम हर वर्ष की तरह गर्व से 15 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं मनाना भी चाहिए I लेकिन गोष्ठियों सोशल साइटों पर लेख एक दूसरे को बधाई देकर क्या हमारी मातृभाषा हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो जाएगी, यह बड़े सवाल हम और आपके सभी के जेहन में आने चाहिए I हमारी मातृभाषा हिंदी राजभाषा के रूप में स्थापित है इसे राष्ट्र भाषा के रूप में कब पूर्ण रूप से स्थापित होगी यह बड़ा सवाल है I पूर्ण दर्जा पाने की जद्दोजहद कब तक चलेगी। कंप्यूटरीकरण के युग में हिंदी के विकास को बड़ा झटका लगा है I क्योंकि अधिकांश सरकारी अर्द्ध सरकारी विभागों में अंग्रेजी में ही काम किए जा रहे हैं और इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंदी का व्यवसायीकरण नहीं हो सका  I कहने को तो राजभाषा की दर्जा प्राप्त हिंदी के लिए उसके प्रचार प्रसार के लिए केंद्र सरकार के दफ्तरों में बाकायदा हिंदी
अधिकारी नियुक्त किए गए हैं और विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि हिंदी में कार्यालयों में कामकाज किए जाएं I लेकिन क्या ऐसा हो रहा है बिल्कुल नहीं। केंद्र सरकार की विभागों की बात करें और रेल डाक बीएसएनल जैसे विभागों में अंग्रेजी का अधिकांश प्रयोग हो रहा है। उपभोक्ता इसे चाह कर भी प्रयोग नहीं कर सकते क्योंकि कंप्यूटरों में अंग्रेजी के सॉफ़्टवेयर लगे हुए हैं I टेलीफोन के बिल, बिजली के बिल ,कनेक्शन फार्म सभी अंग्रेजी में ही होते हैं I इनके निकलने वाले विज्ञापन भी अंग्रेजी अखबारों में ही प्रकाशित किया जाते हैं I हिन्दी को सही रूप में राजभाषा बनाने के लिए जारी शासनादेश का सिर्फ मखौल उड़ाया जा रहा है क्रियान्वित कहीं होता दिख नहीं रहा है ,वरना आज हिंदी का यह हाल ना होता । धीरे-धीरे हिंदी के सारगर्भित शब्दों का विलोपन हो रहा है। कुछ विशेष अखबारों के संपादकीय मेंं कुछ सारगर्भित शब्द देखने को जरूर मिल जाते हैं।  विद्यालयों में भी हिंदी व्याकरण का प्रयोग नाम मात्र का हो रहा है I जहां कभी विद्यालयों के नाम महापुरुषों के नाम होते थे, आज वही सेंट ,कॉन्वेंट,पब्लिक स्कूल, पीटर्स, जान जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है I आज अभिभावकों का भी बच्चों को इंग्लिश पढ़ाने के लिए इंग्लिश मीडियम विद्यालय में पढ़ाना ज्यादा उचित समझते हैं I उन्हें लगता है कि हिंदी मीडियम पढ़ाने से बच्चे कमजोर हो जाते हैं और उनका कैरियर अच्छा नहीं होता है यही नहीं समाज में इंग्लिश मीडियम से बच्चों को पढ़ाना अपना स्टेटस समझते हैं। नहीं लगता है कि सम्मान और रोजगार दोनों मिलता है। अभिभावक कहते हैं कि हिंदी मीडियम मीडियम में पढ़े बच्चों के लिए उच्च शिक्षा में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है I क्योंकि कंपटीशन हो या कोई जॉब हर जगह अंग्रेजी आ जाती है तो क्यों ना हम अंग्रेजी माध्यम से ही बच्चों को पढ़ाएं I यह सच भी है कहीं ना कहीं हमारी शिक्षा मैकाले पद्धति से प्रभावित जरूर है I अगर लोक संघ सेवा आयोग के पिछले परीक्षा फलों पर नजर डालते हैं तो आईएएस की श्रेणी में हिंदी माध्यम के गिने-चुने बच्चे ही सफल हो रहे हैं I जबकि इनका 2015 से पहले सफलता का प्रतिशत 25 से 30% हुआ करता था I आज स्थित यह है कि 100 में नहीं 500 में 02 से 03 कंपटीशन बीट कर पाते हैं I अधिकांश बच्चे इंग्लिश मीडियम के ही सफल हो रहे हैं जानकारों की माने तो इसका सबसे बड़ा कारण आयोग में बैठे पैनल के सदस्यों के दिमाग में अंग्रेजियत कीड़ा घुसा हुआ है I हिंदी को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार आखिर इस तरफ क्यों ध्यान नहीं दे रही अंग्रेजी मीडियम के बच्चे ही क्यों सिलेक्ट हो रहे हैं ,हिंदी माध्यम से क्यों नहीं I जब देश की सबसे बड़ी सिलेक्शन कमेटी का यह हाल है की हिंदी की अहमियत नहीं है तो देश में हिंदी में कैसे सुधार किया जा सकता है I इस बिंदुओं पर सरकार को मनन करने की आवश्यकता है I अब हम बात करते हैं हिंदी के दूसरे पहली पर जहां हिंदी विश्व की अग्रणी भाषाओं में एक है। जो हिंदी भाषा हमें गौरवान्वित करती है आज वर्तमान पीढ़ी अंग्रेजी को लेकर अपना सम्मान समझती है,  फिर भी हिंदी हमारी पहचान है I वर्तमान में गौर करें तो आज हिंदी भाषा विश्व के अनेक देशों में बोली जाती है, किसके विभिन्न बड़े विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है इसके प्रति लोगों का रुझान पूरे विश्व में बढ़ रहा है इतना ही नहीं कारपोरेट घराने भी इस ओर आकर्षित हो रहे हैं जो कि एक शुभ संदेश है सोशल साइटों पर वे हिंदी बोलचाल की भाषा में लोकप्रिय हो रही है इसका जीता जागता उदाहरण यह है कि 2010 से पहले ब्लॉग अंग्रेजी में हुआ करते थे लेकिन आज हिंदी में भी ब्लॉग लिखा जाता है जिन पर लाखों की संख्या में व्यूज आते हैं I इससे लगता है कहीं ना कहीं हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है I जो हर भारतवासी के लिए गर्व की बात है I विश्व में छात्र राज करने वाली अंग्रेजी को हिंदी से कड़ी चुनौती मिल रही है I हिंदी भाषा कोई सुधार के लिए जानकारों का कहना है कि इसके व्याकरण  क़े कड़े  शब्दों को हटाकर इसमें सरलता लाने की जरूरत है, उनका ये भी मानना है कि हिन्दी भाषा एक ऐसी मात्र विश्व भाषा है, जो सुनने वाले के अन्तःकरण को छू लेती है I हम अंग्रेजी भाषा के विरोधी नहीं है वो भी आवश्यकता है I लेकिन इसे लेकर अपनी मातृभाषाा को भूल जाएं यह भी सही नहीं है I हिन्दी भाषियों को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए यह कामना करता हूं कि हिंदी अपनी मातृभूमि में बेगानी ना होकर राष्ट्रभाषा बने और विश्व भाषा के रूप में अग्रणी हो । जिससे हमारी और देश की पहचान बनी रहे।

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