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होरी के दिन चारि नइहरवा से कोउ न आवा”|

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अमेठी I
बसंतपंचमी से होली के बाद दुर्गा अष्टमी तक पूरे डेेेढ़ माह तक चलने वाला होली का त्यौहार अपनी पुरानी पहचान को खो चुका है बेतुके रंगों और भौंडे हुड़दंग तक सीमित होकर रह गया है आज का होली का त्यौहार|परंपरागत होली के गीत सुनने को कान तरस रहें हैं।

कभी समय था कि बसंतपंचमी का त्यौहार होते ही होली का रंग क्या बूढ़े,क्या जवान,क्या महिलाए सब के सिर चढ़कर बोलने लगता था गाँव में अलग-अलग टोलियों में मंडलियाँ बनाकर लोग डफले की थाप पर होली के गीतों के साथ थिरकते देखे जाते थे गाये जाने वाले गीतों में डेढ ताल,चौताल,धवांरी,होली गीत जैसे परंपरागत गीत पूरी तरह विलुप्त हो चुकें हैं अब तो डफले की वह थाप सुनायी भी नही देती है यदा कदा ढोल और मंजीरे पर गीत गाये जातें हैं वह भी होली के बहुत नजदीक आने पर।

सेमरौता निवासी देवी शंकर मिश्र बतातें हैं कि कभी समय था जब शाम को उजियारनाथ महादेव मंदिर पर दर्जनों की संख्या में ग्रामीण इकट्ठा होकर होली गीत गाते थे और भरपूर होली का आनंद लेते थे परन्तु समय के साथ भागमभाग जिंदगी ने होली की पुरानी पहचान छीन ली|खेखरुवा निवासी शिक्षक सुनील सिंह बतातें हैं कि फ़िल्मी धुनें होली गीतों की जरुर सुनायी देतीं हैं परन्तु गाँव की विधा के होली गीत खासकर जो आल्हा की तर्ज पर धवांरी गीत गाये जाते थे वो विलुप्त हो रहें हैं I

जबकि डेढ़ ताल व चौताल विधा के गीत पूरी तरह विलुप्त हो चुकें हैं।पहले बसंतपंचमी से चलकर होली तक इन गीतों की गाँव-गाँव में प्रतियोगिता होती थी अब तो होली के दिन तक ही होली के हुड़दंग गीत सीमित होकर रह गयें हैं।सेमरौता निवासी परमानंद मिश्र ने बताया कि होली पर डेढ़ ताल,चौताल,धवांरी,फगुवा,फाग,होरी गीत प्रमुखता से गाये जाते थे परन्तु धवांरी व होरी गीत तो यदा-कदा सुनायी देतें हैं परन्तु डेढ़ ताल,चौताल फगुवा पूरी तरह विलुप्त हो चुकें हैं।

महिलाओं के बीच में लोकप्रिय होरी गीत भी अंतिम साँसे गिन रहें हैं सेमरौता निवासिनी वयोवृद्ध श्यामा देवी और सुशीला देवी कहती हैं कि “भईया कबौ समय रहा जब बूढीन ते लैके जवानिन तक होरी गीत गावै कय बड़ा शउख रहा मुला अब इ नए ज़माने की दुलहिनी उ लाला उ लाला गउतीं हैं इनका होरी गीत कय पत्तैय नही न”।एक पुराना होरी गीत गुनगुनाते हुए श्यामा देवी ने सुनाया कि “सुगना बैरि लिहे जाय मोर मन बैइरी का ललकय”दूसरा गीत का मुखड़ा सुनाते हुए सुशीला देवी ने कहा कि “होरी के दिन चारि नइहरवा से कोउ न आवा”।

शैलेन्द्र वर्मा (साहित्यकार)

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