Administrative Proceedings : अमेठी से उठी सख्ती की आहट… स्वास्थ्य विभाग में बड़ा एक्शन
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प्रस्तुति – रवि दीक्षित
अमेठी।
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएँ लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। राज्य सरकार लगातार यह दावा करती आई है कि ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों में चिकित्सा सेवाओं को मज़बूत किया जा रहा है। मगर जमीनी स्तर पर कई बार अव्यवस्थाएँ, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और इलाज में लापरवाही जैसी शिकायतें आम जनता के सामने आती रही हैं। अमेठी में घटित हालिया घटना इस पूरी समस्या की गहरी परतों को उजागर करती है।
अमेठी ज़िले में कार्यरत दो डॉक्टरों को उनकी लगातार गैरहाजिरी और ड्यूटी से गायब रहने के कारण सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। यह निर्णय न केवल उन चिकित्सकों के लिए चेतावनी है जो अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ते हैं, बल्कि पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक सख्त संदेश भी है।
घटना का संक्षिप्त विवरण
डॉ. विकास मिश्र (सीएचसी शुकुल बाजार) और डॉ. विकलेश शर्मा (सीएचसी जगदीशपुर) ये दोनों डॉक्टर लंबे समय से बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित थे। अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाएँ प्रभावित हो रही थीं। जांच में पुष्टि होने के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने दोनों को बर्खास्त करने का निर्णय लिया।
स्वास्थ्य मंत्री के उवाच…
स्वास्थ्य मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने स्पष्ट कहा कि “जनता को समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है। लापरवाह डॉक्टरों को सेवा में रहने का कोई अधिकार नहीं है।”
पृष्ठभूमि : ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति
भारत की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में लाखों लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) पर ही इलाज कराने जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। कई केंद्रों पर डॉक्टर तैनात तो होते हैं, मगर वास्तव में वे उपस्थित नहीं रहते।
छुट्टियाँ, निजी प्रैक्टिस, या बड़े शहरों में समय बिताना—इन कारणों से ग्रामीण अस्पतालों की हालत बदतर हो जाती है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है, जिन्हें समय पर इलाज न मिलने से कई बार गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
डॉक्टरों की अनुपस्थिति : एक पुरानी समस्या
अमेठी का यह मामला नया नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स बार-बार यह बताती रही हैं कि…
1. बड़ी संख्या में डॉक्टरों की पोस्टिंग तो ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, लेकिन वे ड्यूटी पर नहीं पहुँचते।
2. कई बार डॉक्टर केवल हस्ताक्षर करने आते हैं और मरीजों को देखने की बजाय निजी क्लीनिक में समय देते हैं।
3. अनुपस्थिति की शिकायतों के बावजूद कार्रवाई धीमी रहती है, जिससे लापरवाह कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है।
अमेठी में सरकार की यह कार्रवाई इसलिए विशेष मानी जा रही है क्योंकि यह केवल चेतावनी नहीं, बल्कि बर्खास्तगी तक पहुँची है।
सरकार का रुख और संदेश
बृजेश पाठक ने अपने कार्यकाल के दौरान कई बार औचक निरीक्षण किए हैं। वे अक्सर अचानक अस्पताल पहुँच जाते हैं और व्यवस्थाओं का जायज़ा लेते हैं। उनके रुख से यह स्पष्ट है कि वे स्वास्थ्य सेवाओं में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। यह बर्खास्तगी एक कड़ा संदेश है कि अब केवल नोटिस या चेतावनी से काम नहीं चलेगा। यह भी संकेत है कि आने वाले समय में और भी सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक चुनौतियाँ
1. डॉक्टरों की कमी
भारत में WHO मानक के अनुसार प्रति 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। उत्तर प्रदेश में यह अनुपात बहुत कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी चिंताजनक है।
2. अस्पतालों की आधारभूत संरचना
कई सीएचसी और पीएचसी पर पर्याप्त दवाएँ, उपकरण और स्टाफ मौजूद नहीं होता। डॉक्टर के न आने से यह समस्या और गहरी हो जाती है।
3. निजी प्रैक्टिस का आकर्षण
कई सरकारी डॉक्टर निजी क्लीनिक चलाते हैं। वहाँ कमाई अधिक होती है और जिम्मेदारी भी कम। इसलिए वे सरकारी ड्यूटी को महत्व नहीं देते।
4. प्रशासनिक ढीलापन
अक्सर शिकायतें होने के बाद भी कार्रवाई देर से होती है। इससे लापरवाह कर्मचारियों में डर नहीं बैठ पाता।
अमेठी प्रकरण का असर
प्रदेशभर के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों में यह संदेश गया कि सरकार अब लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगी। ग्रामीण जनता में उम्मीद जगी है कि शायद स्वास्थ्य सेवाएँ अब बेहतर होंगी।प्रशासनिक स्तर पर भी अधिकारियों को सतर्क रहने की चेतावनी मिली है।
स्वास्थ्य मंत्री के शब्दों का महत्व
बृजेश पाठक ने जो बयान दिया, उसमें केवल चेतावनी ही नहीं बल्कि एक नीतिगत दृष्टिकोण भी झलकता है। उनका कहना था—सरकार जनता को समय पर इलाज देना चाहती है। डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि वे अपने कर्तव्य का पालन करें। जो डॉक्टर ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें सेवा में रहने का हक नहीं।यह बयान जनता के विश्वास को मज़बूत करता है और स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है।
जनता की उम्मीदें और अनुभव
ग्रामीण इलाकों के लोगों का कहना है कि—कई बार उन्हें इलाज के लिए 20–30 किलोमीटर दूर ज़िला अस्पताल जाना पड़ता है। अगर स्थानीय केंद्रों पर डॉक्टर मिल जाएँ तो उनकी परेशानी कम हो सकती है। गरीब तबके के लिए निजी अस्पतालों का खर्च वहन करना संभव नहीं होता।इसलिए डॉक्टरों की अनुपस्थिति उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती है।
भविष्य की राह : सुधार के उपाय
1. कठोर निगरानी प्रणाली
डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस, सीसीटीवी मॉनिटरिंग और नियमित निरीक्षण जरूरी हैं।
2. निजी प्रैक्टिस पर नियंत्रण
सरकारी डॉक्टरों को निजी क्लीनिक चलाने से रोकने के लिए कड़े नियम लागू करने होंगे।
3. प्रोत्साहन और दंड का संतुलन
जहाँ लापरवाह डॉक्टरों को दंड मिले, वहीं ईमानदारी से सेवा देने वाले डॉक्टरों को प्रोत्साहन और सम्मान भी मिले।
4. आधारभूत सुविधाओं का विस्तार
केवल डॉक्टरों की उपस्थिति ही काफी नहीं। दवाइयाँ, उपकरण और नर्सिंग स्टाफ भी उपलब्ध कराना होगा।
5. जनभागीदारी
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य समितियाँ बनाई जा सकती हैं, जो डॉक्टरों की उपस्थिति और सेवाओं की निगरानी करें।
प्रकरण का निष्कर्ष
अमेठी के दो डॉक्टरों की बर्खास्तगी एक साधारण घटना नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी और सबक है। यह साबित करता है कि अब सरकार स्वास्थ्य सेवाओं की लापरवाही को हल्के में नहीं लेगी।
जनता के लिए यह निर्णय उम्मीद जगाता है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होंगी और उन्हें अपने अधिकार के अनुसार समय पर इलाज मिलेगा। डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए यह घटना एक बड़ा संदेश है—“जिम्मेदारी निभाओ, वरना सेवा से बाहर जाओ।”

