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इन्सान की आदत….

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भौतिक चकाचौंध की इस दौड़ में मानव जो साथ में नहीं जाता साथ उसके पीछे तो भागता है अपनी आदत से लेकिन जो साथ में जाता है उसके पीछे उसकी दौड़ नहीं लगती है । यह सच है कि आदतें बदलना आसान नहीं है पर जो आदत न बदल सके वो इंसान नहीं है । हम अक्सर दूसरों में कमिया देखते हैं लेकिन जिस के काम में कुछ गलत लगें तों हमें बिना प्रचारित किये स्वंय उन्हें जताना चाहिये ।

और हमें अगर सभी में दोष लगें तो हमें दूसरों को गलत साबित करने की अपेक्षा अपने स्वयं में बदलाव लाने का प्रयत्न करें । सबसे अधिक ज्ञानी वही है जो अपनी कमियों को समझकर उनका सुधार कर सकता हो ।अतःबदलाव ही जीवन का सार है । जहाँ बदलाव नहीं वहां जीवन नहीं । यदि किसी के मन में सीखने की लगन ना हो तो कोई भी उसे नहीं सिखा सकता क्योंकि फूंक मारकर आप उस ढेर को तो जला सकते है जिसमें चिंगारी हो पर राख के ढेर मे फूंक मारकर आप रोशनी की आशा नहीं कर सकते।

आदत में हम अगर बदलाव करेंगे तो वह स्वभाव और व्यक्तित्व को बदलने का सही सोपान है ।साधना के प्रासाद पर आरोहण करने का साधन भी है ।चिंतन और व्यवहार में गंभीरता लाने का संजीवनी बुटी है । जीवन को सात्त्विक और सुसंस्कारी बनाने के लिए । स्वाध्याय ध्यान आदि की अग्नि में तपकर ही आत्मा रूपी स्वर्ण निखरता है ।शरीर निर्वाह के लिए जैसे भोजन है जरुरी वैसे ही जीवन के लिए स्वाध्याय आदि जरुरी है ।

भगवन महावीर ने निर्जरा के 12 भेदों में सबसे महत्त्वपूर्ण स्वाध्याय को बतलाया है । मैंने सोचा गंभीरता से सोचा तो पाया कि स्वाध्याय से भावों की श्रेणी का आरोहण ऐसा होता है कि अगर हो द्वार खुला अभी मोक्ष नगर का तो हम भव भरमन का पार पा जाएँ ।पर संतुष्ट बने इसीमें कि भव सीमा तो कर पाएंगे ।बढ़ते – बढ़ते एक दिन सिद्धि सदन अवश्य पहुँच जायेंगे ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

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