Filmfare Award : अमेठी की मिट्टी से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचे मनोज मुंतशिर, मिला सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान
1 min read


रिपोर्ट – लोक दस्तक संवाददाता
लख़नऊ, उत्तर प्रदेश।
कभी कागज पर लिखी गई पंक्तियां जब राष्ट्रीय मंच पर सम्मान बनकर सामने आती हैं, तो वह क्षण गौरव का बन जाता है। अमेठी से जुड़े गीतकार मनोज मुंतशिर शुक्ला को फिल्म “मैदान” के गीत “जाने दो” के लिए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गीतकार के सम्मान से नवाजा गया है। इसकी खबर मिलने पर उनके गृह जनपद अमेठी गौरीगंज में खुशी की लहर फ़ैल गई।
मनोज मुंतशिर की इस उपलब्धि पर उनके मित्र एवं सहयोगी डॉ. प्रवीण सिंह दीपक ने खुशी जताते हुए कहा कि यह सम्मान केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि अमेठी की मिट्टी का गौरव है। उन्होंने कहा कि अमेठी से राष्ट्रीय मंच तक मनोज मुंतशिर की यात्रा उन युवाओं के लिए प्रेरणादायी है, जो बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस रखते हैं। उन्होंने इस गौरवपूर्ण उपलब्धि को अपनों के साथ साझा करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की।
इसी के साथ समाजसेवी व उनके मित्र अनुपम, शशिकांत तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार संतोष श्रीवास्तव,नीरज सिंह, चिंतामणि मिश्र, ललित सिंह सहित अनेक प्रबुद्ध जनों ने मनोज मुन्तशिर को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिलने पर खुशी का इजहार किया है।

अमेठी से मुंबई तक… 700 रुपये लेकर निकला युवक, कलम के दम पर बनाई देशभर में पहचान
सपने देखने वालों के लिए मंजिल भले दूर हो, लेकिन हौसला मजबूत हो तो रास्ते खुद बनते जाते हैं। अमेठी के गौरीगंज से निकलकर मुंबई की फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले गीतकार और लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला का सफर संघर्ष, जुनून और सफलता की कहानी है।
27 फरवरी 1976 को गौरीगंज में जन्मे मनोज मुंतशिर का वास्तविक नाम मनोज शुक्ला है। बचपन से ही उनका झुकाव कविता और लेखन की ओर था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1999 में उन्होंने लेखक बनने का सपना लेकर मुंबई का रुख किया। बताया जाता है कि पिता से मुंबई जाने के लिए उन्होंने 300 रुपये मांगे थे, लेकिन उन्हें 700 रुपये मिले।
मुंबई पहुंचने के बाद शुरुआती दौर बेहद कठिन रहा। आर्थिक परेशानियों के बीच उन्होंने संघर्ष किया और लेखन के छोटे-छोटे अवसर तलाशते रहे। टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए लिखने से शुरुआत हुई और धीरे-धीरे फिल्मों में गीत लेखन का रास्ता खुला।
फिल्म ‘एक विलेन’ के गीत ‘तेरी ‘गलियां’ ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। इसके बाद ‘तेरे संग यारा’, ‘फिर भी तुमको चाहूंगा’ और ‘तेरी मिट्टी’ जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। उन्होंने ‘बाहुबली 2’ के हिंदी संवाद लेखन में भी योगदान दिया।
निष्कर्ष..
गौरीगंज की धरती से निकला यह सफर आज भी इस बात की मिसाल है कि छोटे शहर का बड़ा सपना, मेहनत और लगातार संघर्ष के दम पर देश के बड़े मंच तक पहुंच सकता है।

