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आजकल की विक्रय विधि……

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आजकल के जमाने में विक्रय विधि का एक तरीका हो गया है की किसी चीज की बिक्री बढ़ानी हो तो लालच दे दे । जिससे
चीज की बिक्री हो जायेगी । ठीक इसी तरह राग – द्वेष आदि को हम बढ़ायेंगे तो उसके साथ हमारे कर्मों का बन्धन तैयार हैं । अपरिग्रह रहित होंगे व जीवन जीयेंगे तो आगे के लिये मोक्ष की सीढ़ी तैयार हैं । बचपन क्या छूटा कि मन की पवित्रता और निश्चलता भी छूट गयी।कारण कंधे पर ज़िम्मेवारी और आर्थिक जगत की अंधी दौड़।

वर्तमान युग हो गया भौतिकतावाद और टेक्नॉलजी का।एक इंसान की क़ार्य क्षमता हो गयी दस आदमी जितनी।एक समय था कि प्रायः हर व्यक्ति सादा जीवन उच्च विचार की धारा में चलते थे।भरा-पूरा परिवार एक साथ आँगन में बैठ कर एक ही थाली में खाते थे।ना ज़्यादा ख्वाहिशें थी और ना ही मन में किसी तरह की बेईमानी।घर के मेन गेट पर ना ताले होते थे और ना ही गहने रखने के लिये बैंक लॉकर। समय बदला, इंसान के सोच का तरीक़ा भी बदल गया।हर इंसान पैसों के पीछे दीवाना हो गया।किसी का ध्येय अति मेहनत और लगन से ज़्यादा धन कामना तो किसी का लक्ष्य चोरी-बेईमानी से धन प्राप्त करने की लालसा बढ़ गयी।

जब एक स्टेज ऐसा आता है कि अक़ूट संपती तो इकट्ठी कर ली तो अब अपने स्टेट्स को बरकरार रखने के लिये संतोष भी नहीं कर सकता।और अधिक धन प्राप्ति के लिये तरह-तरह के दांव पेच भी अपनाने लगा।अपने गुँथे जाल में खुद ही उलझ गया। आज का इंसान धन तो ख़ूब कमा रहा है पर बदले में खो रहा है पारिवारिक प्रेम और मन की शांति।एक ही परिवार में चार सदस्यों को आपस में एक साथ बैठ कर कुछ पल बिताने का समय नहीं।इंसान अपनी लाइफ़ को भी एक मशीन की तरह बना लेता है।जो चौबीस घंटे या तो कुछ क़ार्य करता है या सोते समय भी व्यापार की ही सोचता है।

जब फुर्सत में कभी सोचता है कि मैंने धन तो बहुत कमाया पर अपने जीवन की सुख-शांति खो दी। तब इंसान को अपना बचपन याद आता है कि वो भी क्या दिन थे।पूरा बचपन हीकेवल सुख-शांति, मौज-मस्ती और निश्चल जीवन की ज़िंदगी थी।पर अब वो बचपन वापिस लौट कर कभी नहीं आता। केवल साधु -संतों का ही जीवन कुछ हद तक बचपन वाला होता है क्योंकि ना उन्हें कमाने की चिंता और ना संग्रह करने की फ़िक्र।वो अपनी फ़क़ीरी में ही मस्ती का जीवन जीते हैं और अपने जीवन का कल्याण करते हैं। इस तरह हम जैसा बीज बोयेंगे फल भी वैसा ही पायेंगे । इसलिये कहते है की यह मानव के ऊपर निर्भर करता है की वह अपने जीवन यापन में कैसी विधि अपनाता हैं ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़,राजस्थान)

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