JOURNEY : पूर्वोत्तर की पहाड़ियों ने दिखाई भारत की नई तस्वीर—प्रकृति, संस्कृति और विकास की कहानी
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संतोष कुमार श्रीवास्तव

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के तहत असम-मेघालय की यात्रा बनी संस्कृति, प्रकृति, विकास और मानवीय संवेदनाओं से साक्षात्कार
कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं, जिनकी दूरी नक्शे पर भले ही हजारों किलोमीटर हो, लेकिन लौटने के बाद महसूस होता है कि वे यात्रा बाहर से ज्यादा भीतर की थी। असम और मेघालय की यह यात्रा मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही। पूर्वोत्तर की धरती पर बिताए गए दिन केवल अलग-अलग स्थानों के भ्रमण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारत को देखने और समझने की मेरी दृष्टि को और व्यापक किया।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के अंतर्गत पत्र सूचना कार्यालय (PIB), लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए आयोजित असम-मेघालय मीडिया टूर में शामिल होने का अवसर मिला। यात्रा का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यटन, स्थानीय कला-शिल्प और विकास की विभिन्न पहलों को करीब से समझना था।
लेकिन लौटकर लगा कि इस यात्रा ने उद्देश्य से कहीं अधिक दिया—इसने हमें भारत की उस आत्मा से मिलाया, जो महानगरों की चकाचौंध से दूर पहाड़ियों, जंगलों, नदियों, गांवों, करघों और परंपराओं के बीच आज भी सांस ले रही है।
पहली मुलाकात—ब्रह्मपुत्र से
असम पहुंचते ही सबसे पहले जिस चीज ने मन को छुआ, वह थी यहां की प्रकृति। विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे खड़े होकर यह महसूस होता है कि प्रकृति जब विराट रूप लेती है तो मनुष्य का अहंकार अपने आप छोटा हो जाता है।
ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं है। वह असम के जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। उसके किनारे बसे लोगों के जीवन में नदी का अपना एक संसार है। यहां प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता किताबों में पढ़े किसी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है।
मां कामाख्या के दरबार में आध्यात्मिक क्षण
इस यात्रा का सबसे आध्यात्मिक और भावुक क्षण रहा नीलाँचल पर्वत पर मां कामाख्या के दर्शन का। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण बदल जाता है। घंटियों की आवाज, श्रद्धालुओं की आस्था और मां के प्रति लोगों का विश्वास मन को भीतर तक छूता है। मां के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करने और आशीर्वाद लेने का अवसर मिला।
एक पत्रकार के रूप में हम अक्सर घटनाओं को शब्दों में तलाशते हैं, लेकिन कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में पूरी तरह बांधना कठिन होता है। मां कामाख्या का दर्शन मेरे लिए ऐसा ही अनुभव रहा।
वहां खड़े होकर मन में यही भाव आया कि भारत की सांस्कृतिक एकता केवल संविधान या नक्शे की सीमाओं में नहीं है। यह उन आस्थाओं में भी है, जो देश के अलग-अलग कोनों को अदृश्य धागे से जोड़ती हैं।
राजभवन में असम के विकास की कहानी
गुवाहाटी स्थित लोकभवन में असम के राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य से मुलाकात यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। राज्यपाल ने प्रतिनिधिमंडल से संवाद करते हुए असम के विकास, पर्यटन, संस्कृति और समृद्ध विरासत से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी साझा की।
राज्यपाल से बातचीत के दौरान असम की विकास यात्रा और उत्तर प्रदेश-असम के संबंधों पर चर्चा हुई। इससे यह समझने का अवसर मिला कि पूर्वोत्तर को केवल प्राकृतिक पर्यटन के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। यह क्षेत्र विकास, आधारभूत संरचना, शिक्षा, रोजगार और पर्यटन की दृष्टि से भी तेजी से बदल रहा है।
पानी में रोजगार की कहानी
कालोंग-कपिली के एक्वा टेक पार्क का भ्रमण यात्रा का एक अलग अनुभव था। यहां पानी केवल मछली पालन का माध्यम नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता का आधार बनता दिखाई दिया।
किसानों, महिलाओं और युवाओं को आधुनिक मत्स्य पालन की तकनीक से जोड़ने के प्रयासों ने यह विश्वास मजबूत किया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे-छोटे नवाचार बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। विकास की सबसे सुंदर तस्वीर शायद वही होती है, जिसमें किसी योजना का लाभ सीधे उस व्यक्ति तक पहुंचता दिखाई दे, जो अपने श्रम से अपना भविष्य बदलने की कोशिश कर रहा हो।
रेल की पटरियों पर बदलता पूर्वोत्तर
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी कपिंजल शर्मा से मुलाकात के दौरान क्षेत्र में रेलवे की विकास योजनाओं और सुविधाओं की जानकारी मिली।
दूरदराज और सीमावर्ती क्षेत्रों तक संपर्क बढ़ाना पूर्वोत्तर के लिए विशेष महत्व रखता है। सड़क और रेल केवल यात्रा के साधन नहीं होते। वे शिक्षा, रोजगार, व्यापार, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यटन के दरवाजे भी खोलते हैं।
रेलवे की विकास योजनाओं के बारे में जानकारी लेते हुए यह महसूस हुआ कि पूर्वोत्तर भारत के भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों को देश की मुख्यधारा के संपर्क से जोड़ने का कार्य अपने आप में एक बड़ी प्रक्रिया है।
एरी सिल्क के धागों में बसी परंपरा
बक्सा जिले के खरुआ स्थित एरी सिल्क स्पिनिंग मिल में पहुंचना भी यादगार रहा। कोकून से एरी सिल्क यार्न तैयार किए जाने की प्रक्रिया को करीब से देखने का अवसर मिला।
यहां एक बात विशेष रूप से महसूस हुई—परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह बदलते समय के साथ संवाद करती है। एरी सिल्क की परंपरा पुरानी है, लेकिन आधुनिक तकनीक और उत्पादन व्यवस्था के साथ उसका जुड़ाव इसे रोजगार का नया आधार दे रहा है।
असम की महिलाओं को करघे पर गमछा बुनते देखना भी इसी कहानी का हिस्सा था। करघे पर चलते हाथों में केवल धागे नहीं थे। उनमें परिवार की उम्मीद, अपनी पहचान और आत्मनिर्भर बनने का सपना भी बुना जा रहा था।
मानस—जहां जंगल बोलते हैं
मानस नेशनल पार्क की यात्रा मेरे लिए प्रकृति के सबसे करीब जाने वाला अनुभव रही। भूटान की सीमा से सटे हिमालय की तलहटी में फैला मानस घने जंगलों, बहती नदी, घास के मैदानों और वन्यजीवों से समृद्ध क्षेत्र है। जंगल में घूमते हुए सबसे बड़ा एहसास यह होता है कि यहां मनुष्य मालिक नहीं, बल्कि प्रकृति का एक छोटा-सा हिस्सा है।
वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक भोजन की व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से विभिन्न प्रजातियों की घास के मैदान विकसित किए जा रहे हैं। यह एक ऐसा प्रयास है, जो बताता है कि संरक्षण केवल जानवरों को बचाने का नाम नहीं है। उनके प्राकृतिक आवास और भोजन की व्यवस्था को बचाना भी उतना ही जरूरी है।
मानस में महिला फोर्स को वन्यजीवों की सुरक्षा में भूमिका निभाते देखना विशेष अनुभव रहा। जंगल की कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभाती महिलाओं ने यह संदेश दिया कि संरक्षण के क्षेत्र में आधी आबादी की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
असम की बेटियां और करघे पर आत्मनिर्भरता
असम के गांवों में जब महिलाओं को करघे पर गमछा बुनते देखा तो लगा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ बड़े-बड़े नारों से कहीं अधिक व्यापक है। एक महिला अपने घर में बैठकर करघे पर कपड़ा बुनती है। उसके हाथों से निकलने वाला गमछा बाजार तक जाता है और उसके बदले मिलने वाली आय उसके परिवार की जरूरतें पूरी करती है।
यहां परंपरा और रोजगार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि परंपरा ही रोजगार का आधार बन रही है। करघे की आवाज में मुझे असम के गांवों की धड़कन सुनाई दी।
मेघालय—बादलों के बीच बसा एक अलग संसार
असम से मेघालय की ओर बढ़ते ही भू-दृश्य बदलने लगा। सड़कें पहाड़ियों के बीच से गुजरने लगीं। बादल कभी पहाड़ियों के ऊपर थे तो कभी ऐसा लगता था जैसे रास्ते पर ही उतर आए हों। शिलांग पहुंचकर लगा कि प्रकृति यहां केवल आसपास नहीं है, बल्कि जीवन का हिस्सा है।
मेघालय के राज्यपाल श्री सी.एच. विजयशंकर से मुलाकात हुई। इसके बाद सचिवालय में अपर मुख्य सचिव डॉ. विजय कुमार डी. से शिष्टाचार भेंट के दौरान राज्य के विकास, प्रशासन, पर्यटन, संस्कृति और प्राकृतिक संपदा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुईं।
बातचीत से यह समझने का अवसर मिला कि पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के बीच विकास की अपनी अलग चुनौतियां होती हैं और उनके समाधान भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तलाशने पड़ते हैं।
लोकतंत्र की तस्वीर भी देखी
शिलांग के पाइनवुड होटल में Special Intensive Revision (SIR)-2026 को लेकर आयोजित मीडिया ब्रीफिंग में शामिल होने का अवसर मिला। मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी.डी.आर. तिवारी, IAS ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया, प्रगति और आगे की कार्रवाई की जानकारी दी।
इस अनुभव ने यह याद दिलाया कि पत्रकार की यात्रा केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। समाज और शासन की प्रक्रियाओं को समझना भी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जीवित जड़ों का पुल—प्रकृति से सीखने की कला
चेरापूंजी के सिएज गांव में पहुंचकर ऐसा लगा जैसे प्रकृति ने स्वयं एक पुल बनाया हो। जीवित पेड़ों की जड़ों से तैयार लिविंग रूट ब्रिज केवल इंजीनियरिंग का उदाहरण नहीं है। यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की ऐसी परंपरा है, जिसमें पेड़ को काटकर रास्ता नहीं बनाया जाता, बल्कि उसकी जड़ों को दिशा देकर समय के साथ पुल का रूप दिया जाता है।
यहीं हेली वार से मुलाकात हुई। उन्होंने इस पारंपरिक कला को न केवल जीवित रखा, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी किया है। वर्ष 2026 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनसे मिलना और उनकी बात सुनना अपने आप में प्रेरक अनुभव था।
एक ऐसे दौर में, जब विकास की पहली तस्वीर अक्सर कंक्रीट और सीमेंट से जुड़ती है, मेघालय की जीवित जड़ों के पुल हमें बताते हैं कि विकास प्रकृति को नष्ट किए बिना भी संभव है।
चेरापूंजी—जहां बारिश भी कहानी कहती है
चेरापूंजी के घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए हर मोड़ पर प्रकृति का नया रूप दिखाई देता रहा।सेवन सिस्टर्स फॉल्स का दृश्य हो या पहाड़ों से गिरता पानी, हर जगह प्रकृति की अपनी भाषा सुनाई देती है।
बांग्लादेश की सीमा से सटे क्षेत्रों की ओर देखते हुए मन में यह विचार आया कि सीमाएं नक्शे पर खिंची होती हैं, लेकिन प्रकृति उन्हें नहीं मानती। पहाड़, बादल, हवा और बारिश किसी सीमा से बंधे नहीं होते।
शिलांग पीक से दिखा एक और मेघालय
शिलांग पीक पर पहुंचकर नीचे फैले शिलांग शहर और दूर तक फैली पहाड़ियों को देखना यात्रा का यादगार क्षण रहा। ऊंचाई पर खड़े होकर नीचे देखना हमेशा एक अलग दृष्टि देता है। शायद जीवन भी कुछ ऐसा ही है।
जब हम समस्याओं के बहुत करीब होते हैं तो वे बहुत बड़ी लगती हैं, लेकिन थोड़ा ऊपर उठकर देखने पर तस्वीर बदल जाती है। शिलांग की पहाड़ियों ने भी कुछ ऐसा ही सिखाया—प्रकृति के सामने थोड़ी देर ठहरना जरूरी है।
उमियम झील की शांति
उमियम झील के किनारे पहुंचते ही यात्रा की भागदौड़ जैसे थम गई। चारों ओर हरी पहाड़ियां, शांत जल और बादलों से घिरा आसमान। कुछ दृश्य कैमरे में कैद किए जा सकते हैं, लेकिन कुछ दृश्य केवल मन में उतरते हैं। उमियम झील का शांत वातावरण उन्हीं अनुभवों में से एक रहा।
यात्रा से लौटते हुए…
अब जब असम और मेघालय की यात्रा पूरी हो चुकी है और हम वापस लौट आए हैं, तो मन में बार-बार वही दृश्य घूमते हैं—मां कामाख्या का मंदिर, ब्रह्मपुत्र का विस्तार, मानस के जंगल, करघे पर बैठी महिलाएं, एरी सिल्क के धागे, रेलवे की विकास योजनाएं, शिलांग की पहाड़ियां, चेरापूंजी के झरने, जीवित जड़ों का पुल और उमियम झील की शांति।
लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण स्मृति है—लोगों की। वे लोग, जो अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। जो अपनी भाषा और परंपरा को बचाए हुए हैं। जो आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ रहे हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी सीख रही।
भारत की ताकत उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि उसकी विविधता में है। उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी धरती से लेकर असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और मेघालय की पहाड़ियों तक—भाषा बदलती है, पहनावा बदलता है, खान-पान बदलता है, प्रकृति बदलती है, लेकिन दिल में देश के प्रति भाव नहीं बदलता। यही ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की वास्तविक अनुभूति है।
यह यात्रा हमें बताती है कि भारत को जानना हो तो केवल राजधानी और महानगरों की ओर नहीं देखना चाहिए। कभी पहाड़ों की ओर जाना चाहिए, कभी किसी गांव के करघे के पास बैठना चाहिए, कभी जंगल की खामोशी सुननी चाहिए और कभी किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहिए, जो बिना किसी बड़े संसाधन के अपनी परंपरा को बचाए हुए है।
असम और मेघालय से लौटते हुए मेरे साथ केवल तस्वीरें और स्मृतियां नहीं हैं। मेरे साथ एक नया विश्वास भी है—भारत जितना किताबों में पढ़ा जाता है, उससे कहीं अधिक उन लोगों के जीवन में दिखाई देता है, जो देश के अलग-अलग कोनों में अपनी संस्कृति, प्रकृति और परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। शायद इसीलिए कुछ यात्राएं खत्म होकर भी खत्म नहीं होतीं।
वे लौटने के बाद भी मन में चलती रहती हैं। असम और मेघालय की यह यात्रा भी मेरे लिए ऐसी ही यात्रा है—एक यात्रा, जो पूर्वोत्तर से शुरू हुई और भारत के और करीब आकर समाप्त हुई।
लेखक -दैनिक अखबार के संपादक हैं

