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SANT RAVIDAS SPECIAL ___ मन चंगा तो कठौती में गंगा,मन ही सेवा मन ही धूप,मन ही सेवहुं सहज सरूप —

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REPORT BY VIRENDRA YADAV

AMETHI NEWS ।

संत शिरोमणि रविदास जी की जयंती आज पूरे देश में मनाई जा रही है। अम्बेडकरवादी सामाजिक संगठनों के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से भी कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे। वाराणसी में एक दिन पहले ही संत शिरोमणि रविदास की जयंती मना ली गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस कार्यक्रम में शामिल हुए हैं।

संत रविदास भगवान को बहुत मानते थे ,फिर भी बचपन से लेकर जीवन भर उन्हें उच्च कुल वाले, तथाकथित पुरोहित और अभिजात्य वर्ग की हीन भावना का शिकार होना पड़ा। रविदास जी ने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ जीवन पर कलम के सहारे लड़ाई लड़ी ।

अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने लोगों के बीच ऊंच नीच, छुआछूत, ढोंग और पाखंड के विरुद्ध जनचेतना जागृत की और सच्ची ईश्वर भक्ति के संदेश दिए। जो मन चंगा तो कठौती में गंगा,मन ही सेवा मन ही धूप,मन ही सेवहुं सहज सरूप —, ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न,छोटे बड़ो सब समझ रहे रविदास रहें प्रसन्न –रविदास की ये वाणी और उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

आजादी के 75साल बाद भी जातिवादी मानसिकता और जातीय संकीर्णता,गरीबी और रोजगार की समस्याएं कम नहीं हुई हैं।
रविदास जयंती पर उनकी शिक्षाओं को अपनाने का ढिंढोरा पीटने वाले तमाम नेता आज भी जातीय संकीर्णता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। चुनाव के समय दलित बस्तियों में संत रविदास का गुणगान करते हैं,मन को साफ करने के बजाय गंगा स्नान करते हैं।

गुरु रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास सीर गोबर्धनगाँव में हुआ था। इनकी माता कलसा देवी एवं पिता संतोख दास जी थे. रविदास जी के जन्म पर सबकी अपनी अपनी राय है, कुछ लोगों का मानना है इनका जन्म 1376-77 के आस पास हुआ था, कुछ कहते है 1399 CE. कुछ दस्तावेजों के अनुसार रविदास जी ने 1450 से 1520 के बीच अपना जीवन धरती में बिताया था। इनके जन्म स्थान को अब ‘श्री गुरु रविदास जन्म स्थान’ कहा जाता है. रविदास जी के पिता राजा नगर राज्य में सरपंच हुआ करते थे।

इनका जूते बनाने और सुधारने का काम हुआ करता था. रविदास जी के पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकालकर उससे चमड़ा बनाते और फिर उसकी चप्पल बनाते थे। रविदास जी जैसे जैसे बड़े होते जाते है, भगवान राम के रूप के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती जाती है. वे हमेशा राम, रघुनाथ, राजाराम चन्द्र, कृष्णा, हरी, गोविन्द आदि शब्द उपयोग करते थे, जिससे उनकी धार्मिक होने का प्रमाण मिलता था।

रविदास जी मीरा बाई के धार्मिक गुरु हुआ करते थे। मीरा बाई राजस्थान के राजा की बेटी और चित्तोर की रानी थी। वे रविदास जी की शिक्षा से बहुत अधिक प्रभावित थी और वे उनकी एक बड़ी अनुयायी बन गई थी। मीरा बाई ने अपने गुरु के सम्मान में कुछ पक्तियां भी लिखी थी, जैसे – ‘गुरु मिलया रविदास जी..’ मीरा बाई अपने माँ बाप की एकलौती संतान थी, बचपन में इनकी माता के देहांत के बाद इनके दादा ‘दुदा जी’ ने इनको संभाला था।

दुदा जी रविदास जी के बड़े अनुयाई थे, मीरा बाई अपने दादा जी के साथ हमेशा रविदास जी से मिलती रहती थी। जहाँ वे उनकी शिक्षा से बहुत प्रभावित हुई। शादी के बाद मीरा बाई ने अपनी परिवार की रजामंदी से रविदास जी को अपना गुरु बना लिया था।

 

 

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