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एटम बम की खतरनाक होड़……..

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स्टाॅकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (सिप्री) की ताजा रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि यूएसए, रुस, यूके, फ्रांस, उत्तर कोरिया और इजरायल जैसे परमाणु हथियारों से संपन्न देश अभी भी परमाणु हथियारों की होड़ में सलग्न हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में इस समय 12,512 एटम बम हैं। पिछले साल के मुकाबले इसमें 86 फीसदी की वृद्धि हुई है। अमेरिका के पास इस वक्त 5,244, रुस के पास 5,889, भारत के पास 164 तो पाकिस्तान के पास 170 एटम बम हैं।

गौर करें तो कुल एटम बम का 90 फीसदी हिस्सा रुस और अमेरिका के पास है। भारत के लिए चिंता की बात यह कि पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान दोनों ने अपने परमाणु हथियारों की संख्या में जबरदस्त इजाफा की है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास जनवरी 2022 में 350 एटम बम थे। लेकिन उसने इसे बढ़ाकर जनवरी 2023 तक 410 कर लिया है। इसी तरह पाकिस्तान ने भी वृद्धि की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रुस-यूक्रेन जंग शुरु होने के बाद से परमाणु हथियारों की जानकारी देने में पारदर्शिता घटी है।

जबकि 2021 में सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को कम करने का वादा किया था। एक सच यह भी कि अमेरिका और रुस ने अपने तकरीबन 2000 एटमी हथियारों को हाई एलर्ट पर रखा है। कुलमिलाकर यह स्थिति परमाणु अप्रसार संधि को मुंह चिढ़ाने वाली है। अभी गत वर्ष ही संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनिया गुटेरस ने 50 साल पुरानी परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की 10 वें समीक्षा बैठक में परमाणु हथियारों की बढ़ती होड़ को लेकर गंभीर चिता जतायी थी। तब अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी ने भी उनके सुर में सुर मिलाया था।

समीक्षा बैठक में अमेरिका, रुस, जापान, जर्मनी समेत कई देशों ने अपने पक्ष रखे लेकिन मौजूदा तस्वीर से साफ है कि कोई भी देश परमाणु हथियारों की होड़ में किसी से कम रहना नहीं चाहता। एक अन्य शोध के मुताबिक इन एटम बमों के जरिए दुनिया को एक दो बार नहीं बल्कि दर्जनों बार मिटाया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका 1945 के बाद से हर नौ दिन में एक के औसत से परमाणु परीक्षण किया है। 1945 के बाद से दुनिया में कम से कम 2060 ज्ञात परमाणु परीक्षण हो चुके हैं जिनमें से 85 फीसदी परीक्षण अकेले अमेरिका और रुस ने किया है।

ये दोनों देश विश्व की महाशक्तियां हैं और दुनिया के अधिकांश देश इन्हीें दोनों देशों के खेमे में बंटे हुए हैं। इसमें से अमेरिका ने 1032, रुस ने 715, ब्रिटेन ने 45, फ्रांस ने 210, चीन ने 45 परीक्षण किए हंै। अमेरिका ने 16 जुलाई, 1945 को मैक्सिको के आल्मागार्दो रेगिस्तान में परमाणु बम का परीक्षण किया और उसके बाद से परमाणु युग की शुरुआत हो गयी। अमेरिका की तर्ज पर सोवियत संघ ने 1949 में, ब्रिटेन ने 1952 में, फ्रांस ने 1958 में तथा चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस बिरादरी में भारत भी सम्मिलित हुआ जब उसने 18 मई, 1974 को पोखरन में अपना प्रथम भूमिगत परीक्षण किया। हालात यह है कि आज समूची दुनिया कभी न खत्म होने वाली परमाणु परीक्षणों की घुड़दौड़ में शामिल हो गयी है।

उल्लेखनीय है कि परमाणु अस्त्रों के उत्पादन को सीमित करने तथा उनके प्रयोग एवं उनके परीक्षण पर रोक लगाने के संबंध में संसार की दो महाशक्तियों के बीच 1967 की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) हुई। इसे 12 जून 1968 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से स्वीकृति प्रदान की और 5 मार्च 1970 से प्रभावी हो गयी। इस संधि के अंतर्गत यह व्यवस्था दी गयी कि कोई भी परमाणु संपन्न देश अकेले या मिलकर अपने अस्त्र किसी भी राष्ट्र को नहीं देंगे। संधि पर हस्ताक्षर करने वाला प्रत्येक राष्ट्र आणविक अस्त्रों की होड़ समाप्त करने एवं आणविक निःशस्त्रीकरण को प्रभावशाली बनाने के लिए बाध्य होगा। तब इस संधि के प्रारुप पर आपत्ति जताते हुए भारत ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था।

भारत के अनुसार यह संधि भेदभावपूर्ण, असमानता पर आधारित एकपक्षीय एवं अपूर्ण है। भारत अब भी अपने पुराने तर्क पर कायम है कि आणविक आयुधों के प्रसार को रोकने और पूर्ण निःशस्त्रीकरण के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्षेत्रीय नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जाना चाहिए। भारत का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य रचनात्मक विकास और मानवता के कल्याण के लिए है। वह परमाणु कार्यक्रम का उपयोग अंतरिक्ष में उपग्रह छोड़ने, उपग्रह से एकत्रित आंकड़ों को बेचने, दूर संचार व दूर संवेदन जैसे कामों में कर रहा है। भारत वैश्विक शांति के लिए प्रतिबद्ध है। गौर करें तो भारत हमेशा से परमाणु उर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर और परमाणु शस्त्र नियंत्रण व निरस्त्रीकरण का समर्थक रहा है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 1954 में ही स्टैंड स्टील एग्रीमेंट अर्थात ‘यथास्थिति वाले समझौते’ के माध्यम से सबसे पहले परमाणु शस्त्र नियंत्रण की आवाज उठायी जबकि अन्य राष्ट्र इस बारे में जागरुक नहीं थे। भारत हमेशा एक परमाणु अस्त्रों से मुक्त विश्व गढ़ने का समर्थन किया है। एक व्यापक एवं सार्वभौमिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि बनाने पर जोर दिया है। ध्यान देना होगा कि 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि (पीटीबीटी) के पांच धाराओं वाली संधि के अंतिम रुप प्रदान करने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। दिसंबर 1993 में भारत ने अमेरिका के साथ मिलकर व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि का ब्यौरा संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया। भारत ने परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्रों की परमाणु हथियारों के परीक्षण को जितना गंभीरता से विरोध किया उतना अन्य किसी दूसरे राष्ट्र ने नहीं की है।

भारत निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण को एकदूसरे का पर्याय मानता है। शस्त्र नियंत्रण निरस्त्रीकरण का अनिवार्य अंग है। दोनों का मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय समाज में हिंसा व शक्ति के प्रयोग को रोकना व सीमित करना है। जून, 1982 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र की महासभा में निरस्त्रीकरण पर पांच सूत्रीय ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसकी चतुर्दिक सराहना हुई। अकसर भारत की परमाणु नीति को 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण से जोड़ते हुए उसे संदेह की परिधि में रखा जाता है। लेकिन यह तार्किक नहीं है। यह भारत की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति और आत्मसुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक है। इसलिए और भी कि चीन ने 1964 में परमाणु विस्फोट कर सामरिक रुप से असंतुलित कर दिया था। मौजुदा समय में भारत का तीन स्तरीय स्वदेशी परमाणु विकास का कार्यक्रम मूलतः शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। यह उर्जा उत्पादन एक अहम अंग है।

चूंकि शीतोयुद्धोत्तर युग के आर्थिक सुधारों एवं विश्व में भूमंडलीकरण के बाद आए नए बदलावों ने परमाणु कार्यक्रमों को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया इस लिहाज से भारत को भी अपनी बढ़ती उर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए परमाणु संयंत्रों की स्थापना आवश्यक था। आज की तारीख में भारत की परमाणु नीति का उद्देश्य उर्जा उत्पादन तक सीमित न रह कर संभावित शस्त्र उत्पादन से भी जुड़ गया है। लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। इसलिए कि शीतयुद्धोत्तर युग में संघर्ष में आई कमी के बावजूद दक्षिण एशिया में शांति के युग का प्रारंभ नहीं हुआ है। वाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप, विशेषकर अमेरिका की नीतियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होना, मध्य एशियाई गणराज्यों की उत्पत्ति, पाकिस्तान में आंतरिक अशांति तथा अफगानिस्तान की समस्या से किसी भी समय स्थिति नाजुक बन सकती है। वैसे भी भारत के पड़ोसी देश विशेष रुप से चीन और पाकिस्तान दोनों परमाणु अस्त्रों से लैस हैं।

पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया और उसी समय से लगातार भारत को धमकी दे रहा है। उधर, भारत-चीन संबंधों में सुधार के प्रयत्नों के बावजूद भी उत्तर-पूर्वी सीमा की सुरक्षा के संबंध में निशिं्चत नहीं हुआ जा सकता। बहरहाल भारत के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य पाकिस्तान की तरह किसी देश को धमकी देना नहीं रचनात्मक विकास और मानवता के कल्याण के लिए है। ऐसे में आवश्यक है कि दुनिया के सभी देश मानवता को बचाने के लिए परमाणु हथियारों की होड़ से बाहर निकल मानवतावादी भारत का अनुसारण करें।

 

अरविंद जयतिलक (लेखक/स्तंभकार)

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