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जीवन के लक्ष्यों पर अड़े रहें, सफलता अवश्य मिलेगी

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विचारणीय बिंदु
एक घटना प्रसंग किसी ने दिल्ली से लन्दन जाने के लिये वायुयान से अपनी टिकट बुक करवायी । निर्धारित समय पर
हवाई अड्डे पहुँचने से पहले घर से जल्दी निकलना जरुरी होता हैं । क्योंकि घर से हवाई अड्डे कि दूरी ज्यादा होती है । कही भी गंतव्य तक जाने के लिये यह जरुरी होता है कि प्रस्थान समय से पहले निर्धारित जगह पहुँच जाये ।

ठीक इसी तरह क्या हमने कभी सोचा हैं कि जिन्दगी से प्रस्थान होने से पहले कभी यहाँ सही से अनुमान के बारे में ? हर दिन है जीवन में एक अवसर हमारे धीरज की परीक्षा का।हमें हर हाल में इस परीक्षा में अपने चिंतन को सही रखकर और मजबूत मनोबल को ढाल बनाकर , देव,,गुरु और धर्म की शरणा में दृढ़ आस्था रखते हुए सफल होना है।जब कोई भी विकट परिस्थिति आती है,हमारे सही चिंतन की परीक्षा की घड़ी होती है ।

हम जीव,अजीव आदि 9 तत्वों पर श्रद्धा तो रखते हैं लेकिन उनको जीवन के आचरण में नहीं ला पाते हैं । कहते हैं कि हमको समय कम जयादा लग सकता हैं लेकिन हम हमारे जीवन के लक्ष्यों पर चट्टान कि तरह अड़े रहे हमको मंजिल जरुर मिलेगी । शरीर नश्वर और आत्मा अनश्वर यह सब जानते हैं लेकिन जब आत्मा की पर्याय बदलती है और कोई चला जाता है प्रिय व्यक्ति हमें छोड़कर तो हम दुःखी होते हैं।हम जानते हैं कि आयुष्य किसी का एक समय बढ़ाया नहीं जा सकता हैं ।

फिर भी हम अज्ञानी बनकर अपने आचरण में मोहकर्म के उदय के कारण को सही से समझ नहीं पाते हैं । हम अपने जीवन के अनमोल क्षणों को जो बीतने के बाद हाथ आने वाले नहीं हैं उनका सदुपयोग करें । अपने को सुरक्षित रखने के लिए सतर्क रहें और सोच को सार्थक बनाकर, उत्साहित रहकर, हर समय का सदुपयोग करें।हम वर्तमान में रहें हमारे शुभ भावों में रहते हुए समय की कीमत को पहचानकर जीवन जीयें। दरअसल हमारी जिन्दगी छोटी नहीं होती हैं |

क्योंकि हम जीना ही जीवन में देरी से शुरू करते हैं फिर आगे जब तक रास्ता हमको समझ में आना शुरू होता है तब तक हमारे यहाँ से जाने कि उदघोषणा शुरू हो जाती हैं ।

थोड़े में बहुत का संतोष 

हमारे जीवन में हमको ऐसे अनेकों प्रसंग से प्रेरणा मिलती है जो
हमको थोड़े में ही बहुत कुछ बता देती हैं । शरीर से ज्यादा मांग
हमारे इस मन की ही होती है । शरीर तो थोड़े में तृप्त हो जाता है पर मन की मांग सदा रोती रहती है ।मन कभी सामग्री से सन्तुष्ट नहींहोता है । पुष्ट व संतुष्ट उसका पात्र तो कभी भरता ही नहीं
हैं । ऐसा ढीठ व जिद्दी वह होता है जो आंख दिखाने से भी नहीं डरता हैं । इसे तो बड़े प्यार-दुलार से हमको समझना होगा।इसे मानने के लिए तो धीरे – धीरे इसके बहुत करीब जाना होगा।जब
आवश्यकता और आकांक्षा में अंतर हमको समझ आएगा। तब ही हमारी असंग्रह वृति सजग जागेगी । गुरुवर्य फरमाते अहिंसा परमोधर्म: से पहले मानो अपरिग्रह परमो धर्म: हिंसा का मूल है परिग्रह।जहा लाहो तहा लोहो ।

लाभ बढ़ेगा उतना बढ़ता जाएगा लोभ। मनचाहा न मिलने पर जागेगा क्षोभ। इच्छाओ आगास समा अणन्तया । क्योंकि हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं लेकिन आकांक्षाएं नहीं। इसलिये हम संतोषवृति को अपनाएं वह जीवन को सुखी बनायें। कहते है कि हर पल समय बीत रहा है साथ मेंपरिवर्तन भी चल रहा हैं । जो इस परिवर्तन के साथ अपने जीवन में चला उसने शाश्वत सत्य को पहचान लिया है ।

हर पल बदल रही हैयह हमारी उम्र , अनुभव , बड़प्पन , रुप , आदि जिन्दगी में । इस जीवन में हमारे कभी छांव है तो कभी धूप भी हमको मिलती हैं । इसजीवन का हर पल यहाँ हम जी भरके अध्यात्म से परिपूर्ण रहते हुए जिये व आनन्द में रहे । इस तरह थोड़े में बहुत कुछ हमारा जीवन समाहित हो जाता हैं ।

प्रदीप छाजेड़
(बोरोवाड,राजस्थान)

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