शिवधनुष भंग से राम वनवास तक पहुंची कथा, जनकपुर की विदाई पर छलकी आंखें तो कुसंग से बचने का मिला संदेश
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लोक दस्तक संवाददाता

तिलोई, अमेठी। आरबीएस इंटर कॉलेज तिलोई के प्रांगण में राज्यमंत्री राजा मयंकेश्वर शरण सिंह द्वारा आयोजित श्रीराम कथा के पंचम दिवस अंतरराष्ट्रीय कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने अयोध्या कांड की पावन मांगलिक चौपाइयों के गायन के साथ कथा का शुभारंभ किया। कथा के दौरान शिवधनुष भंग के बाद भगवान परशुराम के जनकपुर पहुंचने से लेकर श्रीराम-सीता विवाह, माता जानकी की विदाई, अयोध्या आगमन, श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों, कैकेयी के वरदान और भगवान राम के वनगमन तक के प्रसंग सुनाए गए।

कथा व्यास ने शिवधनुष भंग के बाद भगवान परशुराम के जनकपुर पहुंचने का प्रसंग सुनाया। परशुराम के क्रोधित होकर पहुंचते ही सभा में मौजूद राजा और राजकुमार उनके चरण स्पर्श करने लगे, लेकिन वे किसी की ओर ध्यान दिए बिना शिवधनुष के पास जा पहुंचे। महाराज जनक ने उनका स्वागत किया और श्रीराम व माता जानकी से भी उन्हें प्रणाम कराया। इसके बाद परशुराम ने शिवधनुष तोड़ने वाले के बारे में पूछा और क्रोध में कहा कि जिसने धनुष भंग किया है, वह सामने आए।

इस दौरान भगवान श्रीराम ने विनम्रता से परशुराम को समझाने का प्रयास किया, जबकि लक्ष्मण जी ने अपने व्यंग्यपूर्ण संवाद से प्रसंग को रोचक बना दिया। लक्ष्मण ने कहा कि बचपन में उन्होंने भी कई धनुष तोड़े, लेकिन कभी किसी ने इस तरह क्रोध नहीं किया। उन्होंने यह भी प्रश्न किया कि शिवधनुष न तो परशुराम का था और न ही उनके पास रखा था, फिर इसके टूटने पर इतना क्रोध क्यों।

स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को पीछे किया और परशुराम को शांत करने का प्रयास किया। कथा में बताया गया कि अंततः परशुराम ने श्रीराम की दिव्यता को पहचानने के लिए उन्हें अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने को कहा। श्रीराम के हाथ में आते ही धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ गई। यह देखकर परशुराम का संदेह समाप्त हो गया और उन्होंने स्वीकार किया कि अब श्रीराम के आ जाने के बाद उनकी आवश्यकता नहीं है।

आचार्य शांतनु जी महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से ज्ञान और विवेक की शक्ति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि परशुराम शस्त्रों से सुसज्जित थे, जबकि महाराज जनक के पास कोई शस्त्र नहीं था, लेकिन जनक अपने ज्ञान, धैर्य और बुद्धि-विवेक से परिस्थितियों को संभाल रहे थे।
इसके बाद श्रीराम-सीता विवाह के साथ भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति के विवाह का प्रसंग सुनाया गया। विवाह के बाद बारात करीब एक माह तक जनकपुर में रही। फिर अयोध्या लौटने का समय आया तो माता जानकी की विदाई का प्रसंग कथा का सबसे भावुक क्षण बन गया।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि बेटी बहुत कुछ सहन कर सकती है, लेकिन अपने पिता की आलोचना कभी सहजता से स्वीकार नहीं कर सकती। माता सीता की विदाई के समय महाराज जनक जैसे गंभीर और ज्ञान-विवेक से परिपूर्ण राजा भी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सके। उन्होंने महाराज दशरथ के समक्ष अपनी पुत्री सीता का विशेष ध्यान रखने का भावपूर्ण आग्रह किया।
इस प्रसंग को सुनाते समय कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज स्वयं भी भावुक हो उठे। पंडाल में बैठे महिला और पुरुष श्रद्धालुओं की आंखें भी नम हो गईं। माता जानकी की विदाई का दृश्य सुनकर पूरा वातावरण करुणा और भावनाओं से भर गया।
विदाई के बाद श्रीराम, माता सीता, तीनों भाइयों और उनकी पत्नियों का अयोध्या में भव्य स्वागत हुआ। आचार्य ने बताया कि एक माह बाद जब श्रीराम जनकपुर से अयोध्या लौटे तो अयोध्या की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। चारों ओर रिद्धि-सिद्धि और समृद्धि का वातावरण था।
इसी बीच महाराज दशरथ ने राजसभा में बैठकर शीशे में अपना चेहरा देखा। आचार्य शांतनु जी महाराज ने शीशा देखने के प्रसंग को आत्मावलोकन से जोड़ते हुए कहा कि शीशा स्वयं देखने पर गुरु का काम करता है, जबकि दूसरा व्यक्ति दिखाए तो वह दुश्मन का काम भी कर सकता है। शीशा देखने का वास्तविक अर्थ आत्मावलोकन, आत्मचिंतन, आत्मदर्शन और आत्मसंवाद है।
महाराज दशरथ को अपने सफेद बाल दिखाई दिए तो उन्होंने श्रीराम को राज्य सौंपने का मन बनाया। कथा व्यास ने कहा कि जीवन के चौथे पड़ाव में मनुष्य को धीरे-धीरे सांसारिक जिम्मेदारियों से विरक्त होकर भजन और प्रभु चिंतन की ओर बढ़ना चाहिए। इसके बाद अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां शुरू हुईं और राज्यसभा में इसको लेकर चर्चा तेज हो गई।
लेकिन श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों के बीच कथा ने नया मोड़ लिया। आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि देवताओं ने विघ्न की भूमिका तैयार की और सरस्वती ने मंथरा की बुद्धि को प्रभावित किया। मंथरा ने कैकेयी को अपने प्रभाव में लेकर पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी।
मंथरा के चरित्र को कुसंग का प्रतीक बताते हुए आचार्य ने कहा कि कुसंग का प्रभाव अत्यंत भयानक होता है। इसे कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कुसंग और गलत प्रभाव से बचने की सीख देते हुए कहा कि बुरी संगति व्यक्ति के विचार और निर्णय दोनों को बदल सकती है।

इसके बाद कैकेयी द्वारा महाराज दशरथ से मांगे गए दो वरदानों का प्रसंग आया। कैकेयी ने भरत के लिए राज्य और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। यह सुनकर महाराज दशरथ टूट गए। उन्होंने कैकेयी को समझाने, मनाने और अपना निर्णय बदलने के लिए बहुत विनती की, लेकिन कैकेयी अपने निर्णय पर अडिग रहीं।
भगवान श्रीराम को जब वनवास की सूचना मिली तो उन्होंने माता कौशल्या से आशीर्वाद लिया। आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि भारत की माताओं में वह शक्ति, क्षमता, पराक्रम और सहनशीलता रही है, जिसने देश की धर्म, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा है। उन्होंने माता कौशल्या के प्रसंग को पारिवारिक एकता और मातृ सम्मान का संदेश बताया।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने माता कौशल्या को कैकेयी के विरुद्ध भड़काने के बजाय उन्हें माता का ही सम्मान दिया। श्रीराम ने माता-पिता दोनों की आज्ञा को सर्वोपरि माना और पिता के वचन की रक्षा के लिए वन जाने का निर्णय स्वीकार किया।
लक्ष्मण जी भी श्रीराम के साथ वन जाने के लिए तैयार हो गए। भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन लक्ष्मण अपने निर्णय पर अडिग रहे। अंततः भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण तीनों वन की ओर प्रस्थान कर गए। आचार्य शांतनु जी महाराज ने इसे रघुवंश के अद्भुत भ्रातृ प्रेम का उदाहरण बताते हुए कहा कि यही वह भाईचारा है, जिसे आज भी समाज श्रद्धा और आनंद के साथ याद करता है।

पंचम दिवस की कथा में जहां शिवधनुष भंग और परशुराम संवाद ने शौर्य और मर्यादा का संदेश दिया, वहीं माता जानकी की विदाई ने श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। इसके बाद दशरथ के आत्मावलोकन से जीवन के उत्तरार्ध में भजन का संदेश, मंथरा के माध्यम से कुसंग से बचने की सीख और श्रीराम के वनगमन से माता-पिता की आज्ञा, पारिवारिक एकता तथा भ्रातृ प्रेम का संदेश श्रद्धालुओं तक पहुंचा। कथा के दौरान आरबीएस इंटर कॉलेज परिसर में मौजूद श्रद्धालु पूरे मनोयोग से कथा का श्रवण करते रहे।

इस मौके पर रायबरेली सदर विधायक अदिति सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष अमेठी सुधांशु सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, भाजपा पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं क्षेत्र के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

कथा में शामिल होने के लिए तिलोई ही नहीं, बल्कि अमेठी, रायबरेली सहित आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। विशाल कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की मौजूदगी और भक्ति भाव का वातावरण पूरे आयोजन की भव्यता को दर्शाता रहा।

