भरत चरित्र में त्याग, प्रेम और समर्पण की अद्भुत मिसाल, कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
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लोक दस्तक समाचार
तिलोई, अमेठी। आरबीएस इंटर कॉलेज तिलोई के प्रांगण में चल रही श्रीराम कथा के दौरान अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक आचार्य शान्तनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम के वनगमन के बाद अयोध्या में घटित घटनाओं और भरत चरित्र का मार्मिक वर्णन किया। कथा के दौरान दशरथ वियोग,
भरत का त्याग और भगवान श्रीराम के प्रति उनके निष्काम प्रेम का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

आचार्य शान्तनु जी महाराज ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने राजा दशरथ को धर्म और मर्यादा के धुरंधर के रूप में चित्रित किया है। भगवान श्रीराम के वियोग में माता कौशल्या की गोद में उन्होंने छह बार ‘राम-राम’ कहते हुए प्राण त्याग दिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को भी दशरथ जी के जीवन से सीख लेकर अपना जीवन भगवान के नाम और मर्यादा के साथ जीना चाहिए। उन्होंने भावपूर्ण पंक्तियों के माध्यम से कहा कि प्रभु से मिलने की सच्ची तमन्ना हो तो प्रेम से हरि का भजन करते रहिए, धीरे-धीरे वही भक्ति प्रभु तक पहुंचा देती है।

महाराज ने बताया कि दशरथ जी के शरीर को तेल से भरे कड़ाह में सुरक्षित रखा गया और भरत को उनके ननिहाल से वापस बुलाने के लिए संदेश भेजा गया। उस समय अयोध्या में तीनों माताएं विधवा हो चुकी थीं और भगवान श्रीराम माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ वन को प्रस्थान कर चुके थे। मानो अयोध्या का धैर्य भी टूट चुका था।
भरत के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भरत के चरित्र का वर्णन कोई पूरी तरह नहीं कर सकता। परिवार में जब संकट का समय आए तो उसे बचाने के लिए भरत जैसी गंभीरता और त्याग की आवश्यकता होती है। संवाद के माध्यम से बड़े से बड़े विवाद को समाप्त किया जा सकता है। यदि भरत का जन्म न हुआ होता तो भगवान श्रीराम के त्याग और मर्यादा के दर्शन संसार को कौन कराता।
भरत के ननिहाल में होने के दौरान जब अयोध्या से सेवक उन्हें बुलाने पहुंचे तो माता कौशल्या ने उनसे कहा कि भरत को अयोध्या की घटना के बारे में कुछ न बताया जाए नहीं तो उन्हें भारत से भी हाथ धोना पड़ सकता है। भरत ने शत्रुघ्न अयोध्या के बारे में पूछा कि कोई संदेश मिला है, अयोध्या की कुशलता पूछी इस पर शत्रुघ्न ने कहा भैया मुझे कोई जानकारी नहीं है फिर उसके बाद भारत जी ने कहा कि मेरा मन शांत है मुझे अयोध्या की चिंता हो रही है, फिर भारतजी भगवान शिव के मंदिर में जाकर अभिषेक किया।
किसी भी अयोध्या से गए सेवक पहुंच गए सेवकों को देख भारत की बहुत प्रसन्न हुए भारत जी ने एक-एक करके सबका हाल पूछा लेकिन सेवकों ने अपना सिर नीचे कर लिया और बिना कुछ बताएं उनकी हां में हां मिलाते रहे,लेकिन राम के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि प्रभु वन को चले गए हैं और गुरु वशिष्ठ ने उन्हें अयोध्या तुरंत बुलाया है।
भरत तत्काल अयोध्या के लिए रवाना हुए। रास्ते भर उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। अयोध्या पहुंचने पर नगरवासियों ने उन्हें देखकर मुंह फेर लिया। भरत जब माता कैकेयी के कक्ष में पहुंचे तो उन्हें वहां भगवान श्रीराम नहीं मिले। पूछने पर कैकेयी ने कहा कि मै ने सब संभाल लिया है और बिचारी मंथरा ने उसका इन सब चीजों में साथ दिया। जब भरत ने पिता के बारे में पूछा तो मां कैकेयी ने बताया कि दशरथ अब इस दुनिया में नहीं हैं।

यह सुनते ही भरत धरती पर गिर पड़े और फूट-फूटकर रोने लगे। पूरी घटना जानने के बाद उन्होंने मां कैकेयी से कहा कि तुमने मुझे कलंकित कर दिया। तुम मेरी मां नहीं हो सकतीं। कैकेयी ने बताया कि उसके दो वरदान शेष थे, जिन्हें उसने मांग लिया। भरत ने इस निर्णय को परिवार और रघुकुल की मर्यादा के विरुद्ध बताया तथा माता कौशल्या के पास चले गए।
माता कौशल्या के सामने भरत ने अपने निर्दोष होने की बात कहते हुए कहा कि इस षड्यंत्र में उनका कोई हाथ नहीं है। यदि उनका कोई दोष हो तो उन्हें वही दंड मिले, जो धर्म और वेद के मार्ग को छोड़कर अधर्म का साथ देने वाले को मिलता है। माता कौशल्या ने भरत को गले लगाकर कहा कि वह जानती हैं कि उनका इसमें कोई दोष नहीं है।
दशरथ जी के अंतिम संस्कार के समय अयोध्या शोक में डूब गई। माताओं ने अपना शेष श्रृंगार भी उतार दिया और पूरी प्रजा विलाप करने लगी। अंतिम संस्कार के बाद पहली बार दरबार लगा तो तीनों माताएं सफेद वस्त्रों में थीं। यह दृश्य देखकर उपस्थित सभी लोग भावुक हो उठे।
गुरु वशिष्ठ ने भरत को समझाया कि वह 14 वर्षों तक राज्य संभालें और श्रीराम के लौटने पर राज्य उन्हें सौंप दें, लेकिन भरत ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि भगवान का जूठा प्रसाद ग्रहण किया जाता है, लेकिन भगवान का अधिकार छीना नहीं जाता। भरत ने संकल्प लिया कि वे स्वयं चित्रकूट जाकर श्रीराम को अयोध्या वापस लाने का प्रयास करेंगे।
आचार्य शान्तनु जी महाराज ने भरत की भक्ति को रेखांकित करते हुए कहा कि भगवान को पाने के तीन प्रमुख मार्ग ( ज्ञान, कर्म और भक्ति) हैं, लेकिन कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही सबसे सरल आधार है। भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेम, आंसू और पूर्ण समर्पण का नाम है। उन्होंने माता [मीरा] का उदाहरण देते हुए कहा कि मीरा ने लोकलाज की चिंता किए बिना प्रभु के प्रेम में घुंघरू बांधकर नृत्य किया। लोगों ने उन्हें बावरी कहा, लेकिन भगवान ने उनकी भक्ति स्वीकार की।
उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त के आंसू भी भगवान तक पहुंचने का माध्यम बनते हैं। जिस प्रकार मां बच्चे के रोने की आवाज सुनकर दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार भक्त की सच्ची पुकार भी भगवान को अपने भक्त के पास आने के लिए विवश कर देती है। उन्होंने भावपूर्ण पंक्तियों के माध्यम से भक्तों को प्रभु के चरणों में प्रेम के दो आंसू अर्पित करने का संदेश दिया।
भरत जब विशाल सेना के साथ चित्रकूट की ओर बढ़े तो निषादराज से उनका मिलन हुआ। आगे प्रयागराज पहुंचने पर तीर्थराज ने भी भरत के चरित्र की प्रशंसा की। भरत ने रोते हुए अपनी चिंता व्यक्त की कि कहीं बड़े भैया श्री राम उन्हें दोषी तो नहीं समझ रहे है। इस पर तीर्थराज ने कहा कि राम जी रातभर जिन बातों का स्मरण करते रहे, उनमें भरत की प्रशंसा ही प्रमुख थी।
उधर चित्रकूट में लक्ष्मण जी ने भरत को सेना के साथ आते देखा तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं भरत आक्रमण करने तो नहीं आ रहे। उन्होंने भगवान श्रीराम के समक्ष अपनी चिंता व्यक्त की। श्रीराम ने उन्हें समझाया कि भरत ऐसा कभी नहीं कर सकते। लक्ष्मण के मन में संदेह बना रहा तो भगवान श्रीराम ने महाराज दशरथ जी व लक्ष्मण जी की शपथ लेकर उन्हें विश्वास दिलाया कि भारत ऐसा कभी नहीं कर सकता इसके बाद लक्ष्मण जी शांत हुए।
कथा के दौरान आचार्य शान्तनु जी महाराज ने भरत के चरित्र को त्याग, प्रेम, मर्यादा और समर्पण की जीवंत मिसाल बताते हुए कहा कि भरत ने अपने आचरण से भाई के प्रेम और परिवार की मर्यादा को अमर कर दिया।
इस अवसर पर व्यास पीठ से अनेक लोगों को आशीर्वाद प्राप्त हुआ। तत्पश्चात राजा साहब तिलोई द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश त्रिवेदी सहित क्षेत्र से आए अन्य गणमान्य व्यक्तियों को प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

