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	<title>Article Archives - Lok Dastak</title>
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	<description>Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, Breaking News in Hindi.Lok Dastak</description>
	<lastBuildDate>Wed, 04 Feb 2026 16:14:48 +0000</lastBuildDate>
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	<title>Article Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>HEALTH ARTICLE : कैंसर को मात देने की चुनौती</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/25518</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 16:14:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[HEALTH]]></category>
		<category><![CDATA[कीमोथेरेपी]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
		<category><![CDATA[चुनौती]]></category>
		<category><![CDATA[प्रतिरोधक क्षमता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति &#8211; अरविंद जयतिलक (वरिष्ठ स्तम्भकार) दुनिया भर के वैज्ञानिक कैंसर का प्रभावी इलाज खोजने...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3></h3>
<h3><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; अरविंद जयतिलक</strong></span></h3>
<h3><strong>(वरिष्ठ स्तम्भकार)</strong></h3>
<p>दुनिया भर के वैज्ञानिक कैंसर का प्रभावी इलाज खोजने के लिए लगातार शोध कर रहे हैं। उसी का नतीजा है कि आज कीमोथेरेपी के अलावा कई ऐसे उपचार तैयार कर लिए गए हैं जिससे कैंसर को मात देने में सफलता मिल रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले चार दशकों में कैंसर से उबरने वाले लोगों की संख्या में दो गुना इजाफा हुआ है। गत वर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ जेनेवा और स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ बासेल के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डिजायनर वायरस तैयार किया है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को अधिक सक्रिय कर कैंसर के प्रोटीन को खत्म कर रहा है।</p>
<p>उधर, लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी अंडाशय कैंसर के लिए प्रभावी दवा तैयार करने का दावा किया है। आंकड़ों पर गौर करें तो 1991 से अब तक कैंसर से मृत्यु दर में जकरीबन 23 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई है। आज 3.2 करोड़ लोग कैंसर को मात देकर जीवन जी रहे हैं। भारत की बात करें तो यहां सालाना होने वाली कुल मौतों में से तकरीबन 6 फीसदी यानि 3.5 लाख लोगों की मौत कैंसर से होती है। यह दुनिया भर में कैंसर से होने वाली कुल मौतों का 8 फीसद है।</p>
<p>एक अन्य आंकड़ें के मुताबिक देश में हर रोज 13000 लोगों की मौत कैंसर से होती है। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के मुताबिक वर्ष 2020 में तकरीबन 14 लाख लोगों की मौत कैंसर से हुई। इसके मरीजों की संख्या में प्रतिवर्ष 12.8 फीसद की बढ़ोत्तरी हो रही है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2025 में यह बीमारी 15 लाख से अधिक लोगों की जिंदगी खत्म की। भारत के संदर्भ में कैंसर की प्रमुख वजहों पर नजर दौड़ाएं तो इसके लिए मुख्य रुप से अशिक्षा, कुपोषण, गरीबी, कम उम्र में विवाह, महिलाओं का बार-बार गर्भवती होना और खराब सेहत जिम्मेदार है।</p>
<p>अगर इस दिशा में सुधार के कदम उठाएं जाए तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के उपचार के विकल्प को मात्र तीन तरीके से पाटा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले वैश्विक समुदाय को विकासशील देशों में कैंसर की जांच के लिए कार्यक्रम चलाने में मदद देनी चाहिए। इसके तहत रेडियोथेरेपी मशीनें उपलब्ध कराने के साथ ही भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की तरह आम लोगों के लिए बुनियादी स्वास्थ्य बीमा को अपनाने का बढ़ावा दिया जाना चाहिए।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर साल कैंसर के उपचार में पूरी दुनिया में 320 अरब डॉलर का निवेश किया जाए तो कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या आधी हो जाएगी। अगर सर्वाइकल व स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाएं समय रहते पपानीकोलाउ (पैप) स्मीयर और मैमोग्राम स्क्रीनिंग टेस्ट कराकर तुरंत इलाज कराएं तो इस भयंकर बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। आईएआरसी के मुताबिक बेहतर उपचार होने की स्थिति में बचने वाले पांच मरीजों में से चार विकासशील देशों के होंगे। लेकिन विडंबना है कि कैंसर पीड़ित मरीजों विशेषकर महिलाओं में इस भयावह बीमारी को लेकर जागरुकता का घोर अभाव है। जागरुकता के लिए साल 2016-18 के दौरान ‘वी कैन, आई कैन’ की थीम निर्धारित किया गया।</p>
<p>इसका मकसद प्रत्येक व्यक्ति के सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर वैश्विक रुप से कैंसर की रोकथाम की दिशा में प्रयास करना था। इस थीम के तहत लोगों को अपनी जीवनशैली को स्वस्थ रखकर तथा परिवार एवं समुदाय को इसके प्रति जागरुक रखकर कैंसर की रोकथाम और उससे बचाव की दिशा में जागरुक किया गया। यह इसलिए भी आवश्यक है कि अमेरिकन कैंसर सोसायटी और प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट द्वारा गत वर्ष खुलासा किया गया कि 2030 तक कैंसर से होने वाली मौतों में 60 फीसद का इजाफा होगा और सालाना 55 लाख महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है।</p>
<p>दरअसल विशेषज्ञों ने शोध में पाया कि वर्तमान समय में दुनिया की प्रत्येक 7 महिलाओं की मौतों में एक की मौत कैंसर से हो रही है। एक अन्य शोध से भी उद्घाटित हो चुका है कि 2030 तक सर्वाइकल (बच्चेदानी का मुंह) कैंसर से पीडित महिलाओं की संख्या में 25 फीसद का इजाफा होगा। उल्लेखनीय है कि मौजूदा समय में सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आकर हर साल दुनिया में तकरीबन 2 लाख 75 हजार महिलाओं की मौत हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो सर्वाइकल कैंसर के कारण दम तोड़ने वाली महिलाओं की 85 फीसदी आबादी केवल विकासशील देशों से है।</p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो कैंसर से सर्वाधिक लोगों की मौत अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका में रहने वाले लोगों की होती है। कैंसर के कारण मरने वाले 70 फीसद से अधिक लोग इन्हीं तीन महाद्वीपों के होते हैं। चिंता की बात यह भी कि कैंसर से पीड़ित महिलाओं के सर्वाधिक मामले भी गरीब देशों में ही देखे जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के कैसर के मामलों में 56 से 64 फीसद मौतें गरीब देशों में होती है। उल्लेखनीय तथ्य यह कि गरीब देशों में कैंसर से होने वाली कुल मौतों में दो तिहाई स्तन कैंसर और 10 में से 9 सर्वाइकल कैंसर से होती है। शोधकर्ताओं की मानें तो तेजी से होते आर्थिक बदलाव से बढ़ती शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित खुराक, मोटापा और प्रजनन कारकों के चलते गरीब देशों में कैंसर पीड़ित महिलाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है।</p>
<p>अगर नियमित शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा दिया जाए तो इससे शरीर संतुलित रहेगा और एक तिहाई कैंसर के मामले रोके जा सकते हैं। ‘इंडस हेल्थ प्लस’ की रिपोर्ट की मानें तो शहरों में बढ़ते हुए मोटापे के कारण 10 से 12 फीसद जनसंख्या पेट के कैंसर के जोखिम के दायरे में आ गयी है। 25 से 30 वर्ष के आयु वर्ग की 17 फीसद जनसंख्या में धुम्रपान एवं तंबाकू के सेवन के कारण मुख एवं फेफड़े के कैंसर का उच्च स्तरीय खतरा बन गया है। चिकित्सकों का कहना है कि एक तिहाई से ज्यादा कैंसर तंबाकू या उससे बने उत्पादों के सेवन की देन है जबकि एक तिहाई खान-पान व रहन-सहन या दूसरे कारणों हो होते हैं। जहां तक महिलाओं द्वारा तंबाकू का सेवन का सवाल है तो इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। महिलाओं को तंबाकू के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि उनका शरीर तंबाकू के प्रति उच्च संवेदनशील होता है।</p>
<p>तंबाकू के सेवन से उनमें सर्वाइकल कैंसर का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। तंबाकू के सेवन के अलावा घर व बाहर का वायु प्रदूषण भी कैंसर के बढ़ते खतरे का शबब बनता जा रहा है। भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 35 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के लोग विभिन्न प्रकार के कैंसर के जोखिम के दायरे में आ रहे हैं जिसके लिए काफी हद तक वायु प्रदुषण भी जिम्मेदार है। वाहन एवं उद्योगों से निकलने वाले जहरीले धुंए से होने वाले प्रदूषण के कारण पिछले वर्ष फेफड़े के कैंसर मामले में 5 से 6 फीसद की वृद्धि हुई है। दक्षिण पूर्व एशिया में यह समस्या ज्यादा विकट है। वर्तमान समय में विश्व के शीर्ष 20 प्रदूषित शहरों में 14 दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र से हैं। हालांकि विश्व कैंसर दिवस के संस्थापक ‘यूनियन फॉर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल का दावा है कि विकासशील देश में फैली कैंसर की बीमारी उपचार के विकल्प की कमियों का नमूना भर है।</p>
<p>यूनियन का कहना है कि अगर ‘एचपीवी टीका’ को कैंसर के मरीजों के बीच अच्छी तरह वितरित किया जाए तो सर्वाइकल कैंसर को समाप्त किया जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि विकासशील देशों की इस टीके तक पहुंच ही नहीं है जिसके कारण कैंसर पीड़ितों की मौत का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। जबकि कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के 90 फीसद से ज्यादा मरीजों का फस्ट स्टेज में इलाज हो सकता है। पर देखा जाए तो इस स्तर पर ठोस पहल नहीं होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस दिशा में ठोस पहल नहीं हुआ तो 2026 तक सामने आने वाले कैंसर के नए मामलों में 70 फीसद मामले विकासशील देशों के हो सकते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>Indian Economy : &#8220;सियासत के सौदागरों को क्यों डेड दिखती है देश की अर्थव्यवस्था?&#8221;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 Aug 2025 15:41:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Economy :]]></category>
		<category><![CDATA[अर्थव्यवस्था]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK</strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-11283" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद सियासी धंधेबाजों की नजर में भारतीय अर्थव्यवस्था डेड हो चुकी है। गौर करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड बताने वाले वहीं लोग हैं जो 2014 से पहले औंधे मुंह पड़ी विकास दर, कमरतोड़ महंगाई और उत्पादन में कमी से निपटने में बुरी तरह नाकाम साबित हुए थे। अब उनका अर्थ ज्ञान इतना मजबूत हो चुका है कि टैरिफ बढ़ जाने मात्र से उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था रसातल में धंसती नजर आ रही है। उनके इस निष्कर्ष और कुतर्क-कुप्रचार का आधार सिर्फ इतना भर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के बाद इंडिया को डेड इकोनॉमी कहा है।</p>
<p>लेकिन मजेदार बात यह कि वह टैरिफ को लेकर अभी भी आगे-पीछे कर रहे हैं। फिलहाल इस मसले पर दोनों देशों के बीच अभी बातचीत जारी है। लेकिन उतावलेपन की हद है कि भारत के खिलाफ कुप्रचार का ठेका उठा रखे सियासी धंधेबाजों के पास धैर्य नाम की कोई चीज ही नहीं हैं। कौवा कान ले गया तो ले गया। वे इस कहावत को भली भांति चरितार्थ कर रहे हैं। दरअसल डोनाल्ड ट्रम्प की तरह ये सियासी धंधेबाज भी चाहते थे कि कि भारत अपने कृषि-डेयरी बाजार को अमेरिका के लिए खोल दे। अगर भारत सरकार अमेरिकी शर्तों पर झुक गई होती तो इन सियासी धंधेबाजों को सरकार पर किसान विरोधी फैसला लेने का तोहमत लगाकर सरकार को घेरने, बदनाम करने और राजनीतिक माहौल विषाक्त बनाने का मौका मिल जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।</p>
<p>भारत सरकार ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा। अब सियासी धंधेबाजों के पास एक ही रास्ता बचा है कि वे डोनाल्ड ट्रम्प की भाषा का समर्थन कर भारत की अर्थव्यवस्था के खिलाफ माहौल निर्मित करें। दुनिया के निवेशकों को भड़काएं। इस काम में अच्छी तरह जुट भी गए हैं। लेकिन उनकी मंशा पूरी होने वाली नहीं है। दुनिया के निवेशकों का भारत के ग्रोथ रेट पर भरोसा है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि टैरिफ बढ़ जाने मात्र से कोई अर्थव्यवस्था रसातल में नहीं चली जाती। वह भी भारत जैसी तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था जो हाल ही में जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी है। वे जानते हैं कि अगर अमेरिकी टैरिफ बढ़ भी जाता है तो भारत पर बहुत असर पड़ने वाला नहीं है।</p>
<p>हां, श्रम-प्रधान उत्पाद जैसे वस्त्र, फार्मास्यूटिकल, रत्न-आभूषण और पेट्रोकेमिकल्स पर थोड़ा असर जरुर पड़ेगा। लेकिन भारत का बाजार इतना बड़ा है और इन उत्पादों का अपने ही देश में जबरदस्त डिमांड है। सच तो यह है कि टैरिफ बढ़ने का सर्वाधिक नुकसान अमेरिका को ही भुगतना होगा। भारत पर टैरिफ बढ़ाने से अमेरिका में न सिर्फ महंगाई बढ़ेगी बल्कि उसे कम जीडीपी और डॉलर के कमजोर होने का खतरा उठाना होगा। एसबीआई रिसर्च ने अमेरिकी टैरिफ को एक बुरा बिजनेस फैसला करार दिया है। उसके अनुमान के मुताबिक अमेरिका में महंगाई 2026 तक 2 प्रतिशत के तय लक्ष्य को पार कर जाएगी। ऐसा टैरिफ के सप्लाई-साइड इफेक्टस और एक्सचेंज रेट में बदलाव के कारण होगा।</p>
<p>वैसे भी गौर करें तो भारत के साथ व्यापार में अमेरिका पहले से ही घाटा झेल रहा है। वर्तमान में उसका घाटा 45.7 बिलियन डॉलर के पार है। अब उसे एक नई मुसीबत महंगाई की मार भी झेलनी होगी। रही बात भारत की तो इस टैरिफ का उसके ग्रोथ रेट पर बहुत असर पड़ने वाला नहीं है। तमाम आर्थिक एजेंसियों द्वारा आंकलन कर उद्घाटित किया गया है कि टैरिफ के बाद भी भारत का ग्रोथ रेट 6.8 प्रतिशत के पार रहेगा। दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी से निवेशक उत्साहित हैं और वे लगातार भारत की ओर रुख कर रहे हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था टैरिफ से प्रभावित होने के बजाए इसे एक अवसर के रुप में बदल देगी।</p>
<p>दुनिया को पता है कि भारत अमेरिकी टैरिफ बढ़ने से होने वाले अपने मामूली नुकसान की भरपाई यूरोप और आसियान देशों के साथ व्यापार बढ़ाकर कर सकता है। यूरोप और आसियान देशों में भारतीय उत्पादों की जबरदस्त मांग है। आसियान के सभी दस देशों जैसे इंडोनेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, बु्रनेई, फिलीपींस, लाओस और कंबोडिया के साथ भारत की आर्थिक साझेदारी में तेजी से वृद्धि हुई है। वैसे भी ये देश एक अरसे से भारत के साथ व्यापारिक विस्तार की मांग करते रहे हैं। अब भारत इन देशों में अपने उत्पाद निर्यात को बढ़ा सकता है। आज की तारीख में भारत आसियान के लिए चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझीदार है।</p>
<p>पिछले डेढ़ दशक के दौरान आसियान देशों से भारत में कुल 70 अरब डॉलर यानी करीब पांच लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ है जो भारत के कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के 17 प्रतिशत के बराबर है। इसी तरह भारत यूरोपीय संघ के साथ भी अपने कारोबारी रिश्ते को मजबूती दे सकता है। आज की तारीख में यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2024 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच 120 बिलियन यूरो अर्थात 141.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ। यह भारत के कुल व्यापार का 11.5 प्रतिशत है। भारत की अर्थव्यवस्था को मर चुकी अर्थव्यवस्था का नगाड़ा पीटने वालों को याद रखना चाहिए कि आज भारत की जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुकी है। आने वाले दो-तीन वर्षों में वह जर्मनी को भी पछाड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा हासिल कर लेगा।</p>
<p>सच तो यह है कि भारत की मौजूदा सरकार ने मैक्रो-इकनॉमिक फंडामेंटल्स को मजबूत करते हुए अर्थव्यवस्था को नई उर्जा दी है। ब्लुमबर्ग की रिपोर्ट में कहा जा चुका है भारतीय अर्थव्यवस्था ने ऊंची छलांग लगायी है और जीडीपी 13.5 फीसद की दर से आगे बढ़ी है। भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि भारत 2029 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रुप में उभर सकता है। 2014 में भारत आर्थिक रुप से दसवें पायदान पर था। लेकिन सरकार की नीति, उपभोक्ता खर्च में आई तेजी, घरेलू स्तर पर बढ़ी मांग और सेवा क्षेत्र में लगातार विस्तार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। आज उसी का नतीजा है कि भारत जी-20 देशों में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश बन चुका है।</p>
<p>आंकड़ों पर गौर करें तो आज भारत में सबसे ज्यादा स्मार्टफोन डेटा उपभोक्ता हैं। सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स के मामले में दूसरे स्थान पर है। तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। इनोवशन इंडेक्स में भारत की रैंकिंग लगातार सुधर रही है। देश में यनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआइ के जरिए लेन-देन बढ़ा है। वर्ष 2024 में यूपीआइ लेन-देन की कुल संख्या 17221 करोड़ थी। इसका कुल मुल्य 246.8 लाख करोड़ रुपए था। विनिर्माण क्षेत्र में ग्रोथ से भारत के निर्यात में लगातार वृद्धि हो रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल निर्यात 824.9 अरब अमेरिकी डॉलर था। बीते एक दशक में 110 अरब डॉलर से ज्यादा की नई कंपनियां अस्तित्व में आई हैं। आज इनका मूल्य 12 लाख करोड़ रुपए से अधिक है।</p>
<p>यह संकेत भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था की संभावना को पुख्ता करता है। मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण भारत में निवेश को लगातार बढ़ावा मिला है। अनुकूल माहौल के कारण निवेशक इनवेस्ट में रुचि दिखा रहे हैं। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था और भी अधिक ऊंची छलांग लगाएगी। इसकी प्रमुख वजह विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से हो रहा ग्रोथ है। आज भारत पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। याद होगा गत वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में पांच लाख करोड़ (पांच ट्रिलियन) की अर्थव्यवस्था की क्षमता पर शक करने वाले लोगों को पेशेवर निराशावादी कहा था। आज वहीं निराशावादी एक बार फिर भारतीय अर्थव्यस्था को डेड बता फूले नहीं समा रहे हैं। भगवान इन्हें सद्बुद्धि और राष्ट्रभक्ति प्रदान करें।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong><span style="color: #993300">Note &#8211; The author is a senior journalist, the article reflects his own views.</span></strong></p>
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		<title>Special in Shravan : अद्भुत व अनौखी होती है श्रावण मास में ब्रज की छटा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jul 2025 13:52:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[Shravan]]></category>
		<category><![CDATA[special]]></category>
		<category><![CDATA[अद्भुत]]></category>
		<category><![CDATA[अनौखी]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रज की छटा]]></category>
		<category><![CDATA[मांस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; REPORT BY DR GOPAL CHATURVEDI श्रावण (11 जुलाई से 09 अगस्त 2025) में विशेष...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>REPORT BY DR GOPAL CHATURVEDI</strong></span></p>
<p><strong>श्रावण (11 जुलाई से 09 अगस्त 2025) में विशेष</strong></p>
<p>ब्रज में श्रावण मास की छटा अद्भुत व अनौखी होती है। जो कि देखते ही बनती है। हर ओर अत्यंत हर्षोल्लास रहता है। वन-उपवन और कुंज लताओं की हरीतमा के मध्य नृत्य करते मयूरों के झुंड श्रावण के आगमन पर अपने पंख फैलाकर कुहुकने लगते हैं। वर्षा की नन्ही रिमझिम व बड़ी फुहारों के मध्य समूचा ब्रज प्रिया-प्रियतम में भाव निमग्न होकर झूमने लगता है।</p>
<p>यहां श्रावण का अर्थ है- झूले, कजरी, बरसते मेघ, भीगता मन, खनकती चूड़ियाँ और खिलती महंदी। प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि वह आकाश को छू ले। यहां के विभिन्न मंदिरों में झूलों, हिंडोलों, रासलीला, मल्हार गायन व सत्संग-प्रवचन आदि की विशेष धूम रहती है। देश-विदेश के विभिन्न दूरवर्ती स्थानों से आये भक्त-श्रद्धालुओं व पर्यटकों का जमघट इस धूम का और अधिक सम्वर्धन कर देता है।</p>
<p>इस माह में प्रायः प्रत्येक मन्दिर-देवालयों में हिंडोले सजाये जाते हैं। हिंडोले उन्हें कहते हैं कि जिनमें बैठकर ठाकुर जी झूला झूलते हैं। &#8220;भक्ति रसामृत सिंधु&#8221; ग्रंथ में यह लिखा है कि भक्ति के जो 64 अंग हैं उनमें एक अंग हिंडोला उत्सव भी है। साथ ही मन्दिरों को केले के पत्तों, फूल-पत्तियों, कांच की रंगीन पिछ्वाईयों व पर्दों आदि से सजाया जाता है, जिसे कि घटा कहते हैं। कभी काली घटा, कभी हरी घटा, कभी लाल घटा।</p>
<p>कुछ मन्दिरों में नित्य नए-नए प्रकार के हिंडोले सजाये जाते हैं। जिनमें ठाकुर विग्रह विराजित कर उनका मालपूए,घेवर व फैनी आदि से भोग लगाया जाता है। वस्तुतः ब्रज के प्रायः सभी ठाकुर विग्रह पूरे श्रावण मास यह मिष्ठान अगोरते रहते हैं। भगवान शिव को श्रावण मास अत्यंत प्रिय है।</p>
<p>जो व्यक्ति पूरे श्रावण मास भर उनकी पूजा-अर्चना व व्रत आदि के द्वारा उन्हें प्रसन्न कर लेते हैं,उनकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण हो जातीं हैं। श्रीधाम वृन्दावन के वंशीवट क्षेत्र स्थित गोपीश्वर महादेव मंदिर में इस मास शिव भक्तों का तांता लगा रहता है। भक्तगण उनका रुद्राभिषेक कर भांति-भांति से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।</p>
<p>ब्रज में श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज का त्योहार अत्यंत श्रद्धा व धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस पर्व में माँ पार्वती की पूजा का विधान है। ऐसा माना जाता है कि इसी व्रत के फल-स्वरूप पार्वती जी ने भगवान शिव को प्राप्त किया था। ब्रज में हरियाली तीज का त्योहार यहां की जीवन-शैली का एक अविभाजित हिस्सा है।</p>
<p>यहाँ यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण और उनकी आल्हादिनी शक्ति राधा रानी के &#8220;झूलनोत्सव&#8221; के रूप में तीज से लेकर रक्षा बंधन तक पूरे 13 दिनों अत्यंत धूमधाम के साथ मनाया जाता है। साथ ही यहाँ इन दिनों सर्वत्र हिंडोला उत्सव की बहार आ जाती है। इस उत्सव के दौरान यहां के हर एक मन्दिर में हिंडोला पड़ जाता है और उनमें नित्य-प्रति संगीत की मृदुल स्वर लहरियों के मध्य झूले के पदों का गायन प्रारंभ हो जाता है।</p>
<p>स्वर्ण व रजत मण्डित एवं विशाल व कलात्मक हिंडोले केवल ब्रज के मंदिरों में हीं दिखाई देते हैं। जो कि यहां के मंदिरों के वैभव व सम्पन्नता के प्रतीक हैं ।ब्रज के मन्दिरों में &#8220;हिंडोला उत्सव&#8221; अर्थात &#8220;झूलनोत्सव&#8221; का शुभारंभ महाप्रभु बल्लभाचार्य के समय में हुआ था।</p>
<p>हरियाली तीज पर वृन्दावन का विश्वविख्यात ठाकुर बाँके-बिहारी मंदिर सभी के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता है। क्योंकि यहां वर्ष भर में केवल इसी एक दिन ठाकुर बाँके बिहारी जी महाराज को सोने व चांदी से बने अत्यंत भव्य व विशाल 218 किलो वजनी हिंडोले में झुलाया जाता है। यह हिंडोला सन 1947 में ठाकुर श्री बाँके बिहारी महाराज के अनन्य भक्त सेठ स्व. हरगुलाल बेरीवाला ने वाराणसी से कुशल कारीगरों को बुलाकर बनवाया था। यह हिंडोला उत्कृष्ट कारीगरी का नायाब नमूना है।</p>
<p>ठाकुर राधा-रमण मन्दिर वृन्दावन का प्रख्यात मन्दिर है। यहां हरियाली तीज के प्रथम तीन दिन सोने,अगले तीन दिन चांदी और फिर पूर्णिमा तक के शेष साथ दिन तक फूल-पत्ती आदि के भव्य हिंडोलों में लम्बे-लम्बे झोटे देकर ठाकुर जी को झुलाया जाता है।</p>
<p>वृन्दावन के ठाकुर राधादामोदर मन्दिर में हरियाली तीज से रक्षा बन्धन पर्यंत झूलन यात्रा महोत्सव की अत्यधिक धूम रहती है। इस दौरान ठाकुर जी को काष्ठ से सुसज्जित हिंडोले में झुलाया जाता है। इस दर्शन हेतु भक्त श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। साथ ही लोग-बाग इस मंदिर की चार परिक्रमा भी करते हैं। क्योंकि यह मान्यता है कि इस मंदिर की चार परिक्रमा करने गिरिराज गोवर्धन की सप्तकोसीय परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त होता है।</p>
<p>उत्तर को दक्षिण से जोड़ने वाले वृन्दावन के प्रख्यात ठाकुर रँगलक्ष्मी मन्दिर में चांदी और शाहजी मन्दिर में सोने के हिंडोले में ठाकुर जी को झुलाया जाता है। शाहजी मन्दिर में रक्षा बंधन के दिन भक्त-श्रद्धालुओं को झाड-फ़ानूश से सुसज्जित बसन्ती कमरे के दर्शन भी कराए जाते हैं। यह कमरा वर्ष भर में केवल रक्षा बंधन व बसंत पंचमी पर ही खोला जाता है।</p>
<p>राधारानी की क्रीड़ा स्थली बरसाना के श्रीजी मन्दिर में भी हिंडोला उत्सव हरियाली तीज से रक्षा बन्धन तक मनाया जाता है। इस दौरान राधारानी के श्रीविग्रह को भव्य स्वर्ण हिंडोले में गीत-संगीत की मृदुल स्वर लहरियों के साथ झुलाया जाता है। जबकि नंदगांव के नन्दबाबा मन्दिर में ठाकुर जी को विशालकाय चांदी के हिंडोले में झुलाया जाता है।</p>
<p>भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज ठाकुर दाऊदयाल की नगरी बल्देव के दाऊजी मन्दिर में श्रावण शुक्ल एकादशी से श्रावण शुक्ल पूर्णिमा तक भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज दाऊजी व उनकी भार्या रेवती मैया के श्रीविग्रहों के समक्ष जगमोहन में 15-15 फुट के स्वर्ण व रजत जड़ित हिंडोले स्थापित कर दिये जाते हैं। साथ ही स्वर्ण जड़ित दर्पण में पड़ने वाले दाऊजी और रेवती मैया के प्रतिविम्बों को उक्त हिंडोलों में झुलाया जाता है। क्योंकि इन दौनों के विग्रह बड़े होने के कारण हिंडोलों में विराजित नही किये जा सकते हैं।</p>
<p>मथुरा के ठाकुर द्वारिकाधीश मन्दिर एवं गोकुल के विभिन्न बल्लभकुलीय मन्दिरों में श्रावण के प्रारंभ से रक्षाबंधन तक निरन्तर एक माह प्रतिदिन ठाकुर जी को हिंडोले में अत्यंत भाव व श्रद्धा के साथ झुलाया जाता है।यहाँ सोने का एक एवं चांदी के दो विशालकाय हिंडोले हैं। द्वारिकाधीश मन्दिर में हिंडोला उत्सव प्रायः श्रावण कृष्ण द्वितीया से प्रारंभ होकर भाद्र कृष्ण द्वितीया तक चलता है। इस दौरान श्रावण शुक्ल अष्टमी को लाल घटा, श्रावण शुक्ल दशमी को गुलाबी घटा, श्रावण शुक्ल द्वादशी को काली घटा, श्रावण शुक्ल चतुर्दशी को लहरिया घटा सजाई जाती है।</p>
<p>इस अनूठे हिंडोला झूलनोत्सव के दर्शन करने के लिए अपने देश के सुदूर प्रांतों से और विदेशों से भी असँख्य दर्शनार्थी यहां प्रतिवर्ष आते हैं। जो कि यहां के विभिन्न मंदिरों में सजाये गए हिंडोलों और घटाओं के मध्य राधा-कृष्ण के अद्भुत रूप-माधुर्य का दर्शन सुख प्राप्त कर कृतार्थ होते हैं। इस प्रकार समूचा ब्रज पूरे श्रावण मास सोने, चांदी व पुष्पों से आच्छादित हिंडोलों के द्वारा श्यामा-श्याम मय रहता है।</p>
<p><span style="color: #993300"><strong>(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व आध्यात्मिक पत्रकार हैं)</strong></span></p>
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		<title>Spiritual Matters : &#8220;विराट श्रीकृष्ण चालीसा&#8221; : नारायण की साक्षात अनुभूति — डॉ. दिव्या चौधरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Jul 2025 14:03:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA["विराट]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[Spiritual Matters]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY DR. DIVYA CHAUDHARY विजय प्रकाश मिश्र द्वारा रचित &#8220;विराट श्रीकृष्ण चालीसा&#8221; एक...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY DR. DIVYA CHAUDHARY</strong></span></p>
<p>विजय प्रकाश मिश्र द्वारा रचित &#8220;विराट श्रीकृष्ण चालीसा&#8221; एक अद्वितीय काव्य-रचना है, जो भक्ति, श्रद्धा, और आध्यात्मिक अनुभूति का अनुपम संगम है। इस चालीसा में न केवल श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप और समग्र ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का ओजस्वी वर्णन है, बल्कि यह मन से पाठ करने वाले की चेतना को एक उच्च आध्यात्मिक धरातल पर ले जाकर आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध को स्थापित करती है।</p>
<p>श्री मिश्र की यह रचना गहराई, सरलता और भगवान श्री कृष्ण की अनंत ऊर्जा का दुर्लभ समन्वय है। उनका ज्ञान, संवेदना और रचनात्मक दृष्टिकोण उन्हें केवल एक रचनाकार ही नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक दृष्टा के रूप में भी प्रतिष्ठित करता है। उनके लेखन में शब्द मात्र नहीं होते, अपितु उनमें दिव्यता की ऐसी ऊर्जा होती है जो हृदय को स्पर्श करती है, मन को आनंदित करती है और आत्मा को शांति प्रदान करती है।</p>
<p>जब मैंने &#8220;विराट श्रीकृष्ण चालीसा&#8221; का पाठ किया, तो मुझे भगवद्गीता के 11वें अध्याय का वह परम क्षण स्मरण हो आया, जब अर्जुन, नारायण श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन कर स्तब्धता और भक्ति में विलीन हो गए थे। श्री मिश्र की लेखनी ने उसी विराट भाव की सजीव अनुभूति मुझे करवाई — यह कोई सामान्य रचना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना का स्वरूप है।</p>
<p>पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कुछ श्लोक चौपाइयों के रूप में उतर आए हों और साक्षात भगवान नारायण के विराट स्वरूप के दर्शन हो रहे हों। पूरी ऊर्जा अंदर महसूस होती है। पूरा प्रकाश अपने भीतर आता हुआ महसूस होता है। एक अद्भुत,असीमित ऊर्जा उत्पन्न होती है और लगता है कि बस नारायण की कृपा मिल गई है।</p>
<p>जिस प्रकार से जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य और मैहर धाम के महाराज जी द्वारा आशीर्वचन लिखा गया है, वह इस पुस्तक की प्रमाणिकता को स्वयं सिद्ध करता है।</p>
<p>यहां पर कुछ श्लोक के माध्यम से मैं पुस्तक के बारे में कुछ अपने निजी विचार साझा करना चाहती हूं । कुछ श्लोक नीचे दिए गए हैं, उनका वाचन इस चालीसा को समझने के लिए आवश्यक है ।</p>
<p><strong>श्लोक 11.38:</strong></p>
<p>त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्&#x200d;त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।</p>
<p>वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।</p>
<p>अर्थात,</p>
<p>आप आदिदेव हैं, सनातन पुरुष हैं, समस्त सृष्टि के परम आधार हैं। आप ही ज्ञाता हैं, जानने योग्य हैं, और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपसे व्याप्त है।</p>
<p><strong>श्लोक 11.39:</strong></p>
<p>वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।</p>
<p>नमः नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।</p>
<p>अर्थात,</p>
<p>आप ही वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चंद्रमा हैं, प्रजापति हैं और ब्रह्मा जी के भी परब्रह्म परमात्मा हैं। आपको बार-बार, सहस्त्रों बार नमस्कार है। फिर भी बारंबार, बारंबार आपको नमस्कार।</p>
<p><strong>श्लोक 11.40:</strong></p>
<p>नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।</p>
<p>अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।</p>
<p>अर्थात,</p>
<p>आपको आगे से, पीछे से और सभी दिशाओं से बारंबार नमस्कार है। हे सर्वशक्तिमान! हे अमित पराक्रम वाले! आप ही सब कुछ हैं और सबको व्याप्त करते हैं, इसीलिए आप ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं।</p>
<p>विजय मिश्र न केवल साहित्य, रचना और अंग्रेज़ी के गुणी विद्वान हैं, बल्कि एक दूरदर्शी और संवेदनशील इंसान भी हैं। उनकी कुछ कविताएं और रचनाएं पढ़ने का मौक़ा मुझे भी मिला हैं, लेकिन यह चालीसा तो अपने आप में अनमोल है। इसमें श्रीकृष्ण के विराट रूप का ऐसा दिव्य वर्णन किया गया है जो इंसान के अंतर्मन को छू जाता है और उसे आध्यात्मिक ऊँचाइयों की ओर ले जाता है।</p>
<p>मैं एक लंबे समय से विजय प्रकाश मिश्र जी की रचनाओं और विचारधारा को पढती और समझती आ रही हूँ। उनके शब्दों में, मैंने एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस किया है—जो मेरे मन को शांति देती है और आत्मा को स्पर्श करती है।</p>
<p>आज के समय में ऐसी अनुभूति मिलना दुर्लभ है, पर श्री मिश्र जी का यह एहसास, प्रेरणा और गहरायी इस रचना में जैसे सभी भाव को सजीव कर उठती है।</p>
<p>मेरी हार्दिक इच्छा है कि हर जनमानस ,&#8221; विराट श्री कृष्ण चालीसा&#8221; को नियमित रूप से पढ़े और ईश्वर की शक्ति और ऊर्जा का अनुभव करे | मंदिरों में नियमित उच्चारण हो और विजय मिश्र जी का नाम सभी दिशाओं में अलौकिक हो, इसी आत्मीयता के साथ नारायण से प्रार्थना करती हूं | &#8220;विराट श्रीकृष्ण चालीसा&#8221; उनकी अब तक की रचनात्मक साधना का शिखर प्रतीत होती है — जो साहित्यिक भी है, दार्शनिक भी, और दिव्य भी।</p>
<p>मैं हृदय से संकल्प लेती हूं कि इस पावन रचना को जनमानस तक पहुंचाने में अपना सतत योगदान देती रहूंगी, जिससे यह चालीसा न केवल पाठकों के हृदय को आलोकित करे, अपितु मंदिरों और घरों में इसकी दिव्य वाणी गूंजे और लोक-कल्याण का माध्यम बने।</p>
<p>मैं पुनः श्री मिश्र जी को इस उत्कृष्ट रचना के लिए कोटिशः बधाई देती हूं और ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि उनका नाम साहित्य और अध्यात्म के क्षेत्र में चिरकाल तक आलोकित रहे।</p>
<p><span style="color: #993366"><strong>( लेखिका प्रोफेसर (डॉ.) दिव्या चौधरी- निदेशक, जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कानपुर में कार्यरत हैं )</strong></span></p>
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		<title>ARTICLE : भारत साइप्रस का मसला उछाले, चीख उठेगा तुर्की !</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 May 2025 10:12:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रीस]]></category>
		<category><![CDATA[चीख]]></category>
		<category><![CDATA[तुर्की]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK संस्कृत की एक प्रसिद्ध कहावत है ‘शठे शाठयम समाचरेत्’। यानि...</p>
<p>The post <a href="https://www.lokdastak.com/archives/23275">ARTICLE : भारत साइप्रस का मसला उछाले, चीख उठेगा तुर्की !</a> appeared first on <a href="https://www.lokdastak.com">Lok Dastak</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK</strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-11283" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>संस्कृत की एक प्रसिद्ध कहावत है ‘शठे शाठयम समाचरेत्’। यानि दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार होना चाहिए। यूरेशिया में स्थित तुर्की ऐसा ही एक दगाबाज देश है जिसके साथ इसी तरह का व्यवहार होना चाहिए। इसलिए कि उसने भारत के विरुद्ध आतंकियों के प्रश्रयदाता देश पाकिस्तान के साथ कंधा जोड़ने की हिमाकत की है। उसने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर के विरुद्ध पाकिस्तान को गोला-बारुद, समुद्री जहाज, ड्रोन और हरक्यूलिस विमान उपलब्ध कराकर रेखांकित कर दिया है कि वह दुनिया का सबसे अहसान फरामोश और कृतध्न देश है। उसके लिए दोस्ती बेमानी है। अलग बात है कि पाकिस्तान को दिए उसके सभी हथियार फुस्स साबित हुए हैं। भारत ने उसके सभी ड्रोन एवं उसके सैन्य ऑपरेटिव्स मार गिराए। इससे दुनिया भर में उसकी भद्द पीट रही है। तुर्की कितना अहसान फरामोश है इसी से समझा जा सकता है कि वर्ष 2023 में वहां आए भीषण भूकंप में भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ के जरिए उसे राहत सामग्री भेजकर भरपूर मदद की थी।</p>
<p>लेकिन उसने इस अहसान को दरिया में डालकर जेहादियों से गलबहियां कर बैठा। उसके इस कृत्य से भारत में आक्रोश और गुस्सा होना लाजिमी है। भारत के नागरिकों द्वारा उसके वस्तुओं के आयात को बंद किए जाने और उसके सामानों के बहिष्कार की मांग तेज हो गई है। भारतीय व्यापारी टर्किश सेब के बहिष्कार का ऐलान कर दिए हैं। पर्यटन पर निर्भर तुर्की के लिए ट्रैवल एजेंसियों ने भी ट्रैवल पैकेज रद्द करने का ऐलान कर दिए हैं। मेक माई ट्रिप के मुताबिक तुर्की की बुकिंग में तकरीबन 60 फीसदी की गिरावट आई है। दूसरी ओर जामिया और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय समेत कई अन्य भारतीय विश्वविद्यालयों ने तुर्की के विश्वविद्यालयों से अपना समझौता रद्द कर दिया है। मतलब साफ है कि अब तुर्की को पाकिस्तान से कंधा जोड़ने की कीमत चुकानी ही होगी।</p>
<p>उचित होगा कि भारत तुर्की को सबक सिखाने के लिए उसकी दुखती रग साइप्रस का मसला उठाकर उसकी अंतर्राष्ट्रीय घेराबंदी तेज करे। गौरतलब है कि तुर्की साइप्रस के 36 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा जमा रखा है। साइप्रस की भौगोलिक परिदृश्य पर नजर डालें तो यहां मुख्य रुप से ग्रीस और तुर्की समुदाय के लोग रहते हैं। इनके बीच दशकों पहले से नस्लीय विवाद चला आ रहा है। इतिहास में जाएं तो साइप्रस कभी अंग्रेजों की कॉलोनी हुआ करता था। 1878 से चले आ रहे ब्रिटिश उपनिवेश का अंत 1960 में हुआ और साइप्रस को एक नए देश के रुप में पहचान मिली। चूंकि साइप्रस एक नया देश था लिहाजा वहां सत्ता-संघर्ष की स्थिति तेज हो गयी। लिहाजा 15 जुलाई, 1974 को तुर्की की सेना ने साइप्रियट नेशनल गार्ड की अगुवाई में साइप्रस के अंदरुनी हालातों का फायदा उठाते हुए अंतर्राष्ट्रीय कानून को ठेंगा दिखाकर उत्तरी हिस्से पर आक्रमण कर उसके महत्वपूर्ण शहर वरोशा पर कब्जा कर लिया।</p>
<p>उस समय साइप्रस में सैन्य विद्रोह चल रहा था। इस विद्रोह को ग्रीस का समर्थन प्राप्त था। तुर्की कतई नहीं चाहता था कि साइप्रस में ग्रीस का हस्तक्षेप हो। वैसे भी ग्रीस और तुर्की के बीच पहले से ही समुद्री क्षेत्र को लेकर तनाव चल रहा था। साइप्रस को हथियाने के खेल में तुर्की भारी पड़ा और उसने उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर उसे टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉदर्न साइप्रस नाम दे दिया। तब सुरक्षा परिषद के सभी देशों ने तुर्की के इस कदम की निंदा की। 2 अगस्त, 1975 को तुर्की और साइप्रस के बीच वियना में समझौता हुआ। समझौते के मुताबिक तय हुआ कि तुर्की अपने बलात् किए गए कब्जे वाले इलाके में लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और अपने मजहब को मानने की आजादी समेत सामान्य जीवन जीने में मददगार हर बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराएगा। लेकिन तुर्की ने इस समझौते को ठेंगा पर रख अपना अत्याचार जारी रखा।</p>
<p>वर्ष 1998 के प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सभी सदस्य देशों से साइप्रस गणराज्य की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही। लेकिन तुर्की जबरन कब्जा किए इलाके को नहीं छोड़ा। तुर्की के आक्रमण के कारण 162000 ग्रीक-साइप्रियोट अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह गए। जो लोग अपना घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए उन पर तुर्की ने इस कदर कहर बरपाया कि वे अपनी संपत्ति छोड़कर भागने को मजबूत हो गए। आज इस इलाके में ग्रीक-साइप्रियोट की आबादी महज तीन सैकड़ा ही बची है। जिन लोगों ने तुर्की के बलात् कब्जे का विरोध किया उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया। तुर्की ने इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए हजारों तुर्क परिवारों को बसा रखा है।</p>
<p>इस कारण दक्षिण और उत्तर साइप्रस के बीच यदा-कदा तनाव की स्थिति उत्पन होती रहती है। तुर्की के बलात् कब्जे के बाद से ही यह द्वीप दो हिस्सों में बंट गया है। तुर्क साइप्रसवासियों ने अपने इलाके को टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉदर्न साइप्रस नाम दिया है। फिलहाल इसे सिर्फ तुर्की ने ही मान्यता दे रखा है। तुर्की द्वारा जबरन कब्जाया गया साइप्रस का यह उत्तरी इलाका लोगों की जीविका और आमदनी का बड़ा स्रोत हुआ करता था। यह इलाका वर्ष भर पर्यटकों से भरा गुलजार रहता था। आर्थिक रुप से समृद्ध यह इलाका बहुमंजिली इमारतों के लिए भी जाना जाता था। लेकिन तुर्की के अत्याचार ने इसे वीरान बना दिया है। यहीं नहीं किसी तरह का विरोध न हो इसके लिए यहां उसने 40 हजार से अधिक सैनिकों का जमावड़ा कर रखा है। तुर्की नहीं चाहता है कि इस इलाके में किसी अन्य देश का हस्तक्षेप हो</p>
<p>। लेकिन अब वक्त आ गया है कि भारत इस मसले को हवा देकर वैश्विक स्तर पर तुर्की की फजीहत बढ़ाए। याद होगा वर्ष 2022 में भारतीय विदेशमंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में साइप्रस का मुद्दा उठाकर तुर्की की चौधराहट की हवा निकाल दी थी। तब भारतीय विदेशमंत्री ने तुर्की के विदेशमंत्री मेवलुत कावुसोग्लू से मुलाकात कर साइप्रस की स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वायत्तता की बात उठाया था। उन्होंने ट्वीट कर यह भी कहा था कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के हिसाब से साइप्रस मुद्दे का शांतिपूर्ण हल निकाले। ध्यान देना होगा कि तुर्की के दक्षिण में स्थित साइप्रस का इलाका इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके पश्चिम में सीरिया और उत्तर पश्चिम में इजरायल अवस्थित है। इस नाते इस इलाके का रणनीतिक और सामरिक महत्व बढ़ जाता है।</p>
<p>कुटनीतिक और सामरिक रुप से देखें तो इस इलाके पर जिसकी पकड़ मजबूत होगी वह बड़ी आसानी से भूमध्यसागर के पूर्वी हिस्से नियंत्रित कर सकता है। यहीं वजह है कि इस इलाके पर आसपास के देशों की नजर बनी रहती है। तुर्की का दक्षिणी भाग यूरोपीय यूनियन का सदस्य है जिसे आज की तारीख में साइप्रस का मुख्य भाग माना जाता है। चूंकि मौजूदा समय में दुनिया भर में भारत की साख बढ़ी है और वैश्विक मंचों पर उसकी आवाज सुनी जा रही है। ऐसे में साइप्रस का मुद्दा तुर्की के गले की फांस बन सकता है। गौर करें तो तुर्की न सिर्फ पाकिस्तान के साथ कंधा जोड़ा है बल्कि वह बार-बार कश्मीर का मुद्दा उठाकर भारत को असहज करने की चेष्टा करता है। वह अन्य मसलों पर भी भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान का साथ देता है।</p>
<p>गत वर्ष पहले उसने पाकिस्तान की शह पर भारत का 56,877 मिलियन टन अनाज से लदे जहाज को वापस भेज दिया था। उसने ऐसा कर वैश्विक बाजार में भारतीय अनाज निर्यात की साख खराब करने की कोशिश की थी। यहीं नहीं वह इंटरनेट मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के जरिए भी भारत विरोधी केंद्र के रुप में इस्तेमाल हो रहा है। तुर्की के आक्रमक व्यवहार को देखते हुए समय आ गया है कि भारत भी उसके विरुद्ध खुलकर पत्ते खेले। भारत को न सिर्फ साइप्रस के मसले को उठाना चाहिए बल्कि ग्रीस और आर्मिनिया के साथ कंधा जोड़कर तुर्की की तेज घेराबंदी करनी चाहिए। इसलिए कि ग्रीस और आर्मिनिया दोनों ही तुर्की के शत्रु हैं और नीति भी कहती है कि ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ होता है।</p>
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		<title>ARTICLE : लोकतंत्र की बुनियाद है पंचायतीराज व्यवस्था</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Apr 2025 17:14:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[पंचायतीराज]]></category>
		<category><![CDATA[बुनियाद]]></category>
		<category><![CDATA[लोकतंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[व्यवस्था]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; REPORT BY LOK REPORTER AMETHI NEWS। आजादी के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>REPORT BY LOK REPORTER</strong></span></p>
<p><em><strong>AMETHI NEWS।</strong></em></p>
<p>आजादी के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ढ़ेर सारे प्रयास हुए। इनमें से एक बड़ी उपलब्धि भारत में पंचायतीराज व्यवस्था की स्थापना है। इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पंचायतीराज व्यवस्था किसी न किसी रुप में भारत के सामाजिक-राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है। वैदिक काल में सभा और समिति का उल्लेख है जिससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था थी। पंचायती राज व्यवस्था को लोकतांत्रिक जामा पहनाने का काम आजादी के बाद शुरु हुआ। 1993 में संविधान में 73 वां संशोधन करके पंचायत राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता दी गयी। बाद में संविधान में भाग 9 को पुनः जोड़कर तथा इस भाग में 16 नये अनुच्छेदों को मिलाकर एवं संविधान में 11 वीं अनुसूची जोड़कर पंचायत के गठन, पंचायत के सदस्यों के चुनाव, सदस्यों के लिए आरक्षण तथा पंचायत के कार्यो के संबंध में व्यापक प्रावधान किए गए।</p>
<p>सच कहा जाय तो स्वतंत्र भारत में पंचायती राज व्यवस्था महात्मा गांधी की देन है। वे स्वतंत्रता आन्दोलन के समय से ही ब्रिटिश सरकार पर पंचायतों को पूरा अधिकार देने का दबाव बना रहे थे। आजादी के बाद 2 अक्टूबर, 1952 को जब सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रारंभ किया गया तो सरकार की मंशा थी कि गांधी जी के पंचायती राज की संकल्पना को आकार दिया जाए। इस मंशा के मुताबिक ही खण्ड को इकाई मानकर खण्ड के विकास हेतु सरकारी मुलाजिमों के साथ सामान्य जनता को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया गया। लकिन दुर्भाग्य कि जनता को वास्तविक अधिकार न दिये जाने के कारण यह कार्यक्रम सफेद हाथी सिद्ध हुआ। सामुदायिक कार्यक्रम की असफलता के बाद पंचायती राज व्यवस्था को परवान चढ़ाने के लिए 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में ग्रामोद्धार समिति का गठन किया गया।</p>
<p>इस समिति ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की। इसी समिति ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए गांवों के समूहों के लिए प्रत्यक्षतः निर्वाचित पंचायतों, खण्ड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत समितियों तथा जिला स्तर पर जिला परिषद गठित करने का सुझाव दिया। महत्वपूर्ण बात यह रही कि बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश को 1 अप्रैल, 1958 को लागू कर दिया गया। राजस्थान राज्य की विधानसभा ने इसी समिति के सुझाव के आधार पर 2 सितम्बर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम की संस्तुति कर दी। 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था को सबसे पहले लागू किया गया। इसके बाद पंचायती राज व्यवस्था को अन्य राज्यों ने भी अपने यहां लागू करना शुरु कर दिया।</p>
<p>मसलन 1959 में आंध्रप्रदेश, 1960 में असम, तमिलनाडू एवं कर्नाटक, 1962 में महाराष्ट्र, 1963 में गुजरात तथा 1964 में पश्चिम बंगाल में लागू किया गया। लेकिन बलवंत राय मेहता समिति के सिफाारिशों के तहत पंचायती राज व्यवस्था में कई गड़बड़ियां देखने को मिली। इसे दूर करने के लिए 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। 1978 में इस समिति ने केन्द्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिश की। मसलन राज्य में विकेन्द्रीकरण की प्रारंभिक शुरुआत जिला स्तर से हो, मण्डल पंचायत को जिला स्तर से नीचे रखा जाय जिसमें करीब 15000-20000 जनसंख्या एवं 10-15 गांव शामिल हों। मेहता समिति ने गांव पंचायत और पंचायत समिति को समाप्त करने की बात कही। समिति ने मंडल पंचायत और जिला पंचायत का कार्यकाल 4 वर्ष तथा विकास योजनाओेेेें को जिला स्तर के माध्यम से तैयार करने एवं उसका क्रियान्वयन मंडल पंचायत से कराने की सिफारिश की लेकिन सरकार ने इस समिति के सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया। फिर सात वर्ष बाद 1985 में डा0 पी0 वी0 के0 राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करके उसे ग्रामीण विकास तथा गरीबी दूर करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर सुझाव देने की बात कही गयी।</p>
<p>इस समिति ने राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला परिषद, मंडल स्तर पर मंडल पंचायत और गांव स्तर पर गांव सभा के गठन की सिफारिश के साथ अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण देने की बात कही। लेकिन समिति की सिफारिश को अपर्याप्त बताकर उसे अमान्य कर दिया गया। इसके उपरांत डा0एल0एम0 सिंघवी की अध्यक्षता में समिति गठित करके उसे पंचायती राज संस्थाओं के कार्यो की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी। इस समिति ने गांवों के पुर्नगठन की सिफारिश पर बल दिया। इसी समिति ने गांव पंचायतों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की बात कही। पंचायती राज व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने के लिए 1988 में पी0के0 थुंगन समिति का गठन किया गया। इस समिति ने अहम सुझाव के तौर पर कहा कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान सम्मत बनाया जाना चाहिए।</p>
<p>इस समिति के सिफारिश के आधार पर पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने के लिए 1989 में 64 वां संविधान संशोधन लोकसभा में पेश किया गया जिसे लोकसभा ने तो पाारित कर दिया लेकिन राज्यसभा ने नामंजूर कर दिया। 16 दिसम्बर, 1991 को 72 वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया और उसे संसद की प्रवर समिति को सौंप दिया गया। 72 वें संविधान संशोधन विधेयक के क्रमांक को बदलकर 73 वां संविधान संशोधन विधेयक कर दिया गया। 22 दिसंबर 1992 को लोकसभा और 23 दिसंबर 1992 को राज्यसभा द्धारा 73 वें संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी गयी। 17 राज्य विधानसभाओं द्वारा मंजूरी दिये जाने के बाद 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति ने भी अपनी सहमति दे दी। 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का प्रावधान किया गया।</p>
<p>इसके अनुसार ग्राम स्तर पर ग्रामसभा और ग्राम पंचायत का प्रावधान, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत और सबसे उच्च स्तर पर यानी जिला स्तर पर जिला पंचायत के गठन का प्रावधान किया गया। ग्रामसभा की शक्तियों के संबंध में राज्य विधान मंडल द्वारा कानून बनाने का उल्लेख है। जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, उनमें दो स्तरीय पंचायत अर्थात जिला स्तर और गांव स्तर पर गठन किया जायेगा और 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायत राज्य अर्थात गांव तथा मध्यवर्ती और जिला स्तर पर स्थापना की बात कही गयी है। केरल, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, नागालैण्ड और मिजोरम में एक स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। असम, म0प्र0, कर्नाटक, उड़ीसा एवं हरियाणा में दो स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। उ0प्र0, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, हिमाचल, गुजरात, पंजाब, गोवा एवं तमिलनाडू इत्यादि राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू है। वहीं पश्चिम बंगाल में चार स्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू है।</p>
<p>वहां आंचलिक परिषद का भी गठन किया गया हैै। संविधान में उल्लेख है कि सभी स्तर की पंचायतों के सभी सदस्यों का चुनाव वयस्क मतदाताओं द्धारा प्रत्येक पांचवें वर्ष किया जाएगा। गांव स्तर के पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष रुप से तथा जिला स्तर के पंचायत अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रुप से होगा। पंचायत के सभी स्तरों पर सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों के लिए उनके अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है। सभी स्तर के पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष होगा। लेकिन इसका विघटन पांच वर्ष पहले भी किया जा सकता है। किंतु विघटन की दशा में 6 मास के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यक होगा। पंचायतों को कौन-कौन सी शक्तियां प्राप्त होगी और वे किन जिम्मेंदारियों का निर्वहन करंेगी इसका उल्लेख संविधान में 11 वीं अनुसूची में किया गया है।</p>
<p>ग्राम पंचायत में 6 समितियों का उल्लेख है जैसे नियोजन एवं विकास समिति, निर्माण कार्य समिति, शिक्षा समिति, प्रशासनिक समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति तथा जल प्रबंधन समिति। क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत में भी इसी प्रकार की समितियों की व्यवस्था का उल्लेख है। पंचायती राज व्यवस्था के लागू हो जाने से विकास की अपार संभावनाओं को बल मिला है। गांव के लोगों में जागरुकता बढ़ी है। लोग अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सजग हुए हैं। सच कहा जाय तो प्रत्येक पंचायत एक छोटा गणराज्य होता है, जिसकी शक्ति का स्रोत पंचायती राज व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की सफलता भी इसी गणराज्य में निहित है।</p>
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		<title>ARTICLE : स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा थे वीर सावरकर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 04:00:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[महान]]></category>
		<category><![CDATA[योद्धा]]></category>
		<category><![CDATA[वीर सावरकर]]></category>
		<category><![CDATA[स्वतंत्रता संग्राम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK  स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय महारथी वीर सावरकर जी की 26 फरवरी...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000">PRESENTED BY ARVIND JÀYTILAK </span></strong></p>
<p>स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय महारथी वीर सावरकर जी की 26 फरवरी को पुण्यतिथि है। वे जीवन भर अखंड भारत के पक्षधर रहे। 13 दिसंबर 1937 को नागपुर की एक जनसभा में उन्होंने अलग पाकिस्तान के लिए चल रहे प्रयासों को असफल करने की प्रेरणा दी और 15 अगस्त 1947 को भारतीय तिरंगा का ध्वजारोहण करते हुए कहा कि मुझे स्वराज प्राप्ति की खुशी है, किंतु वह खंडित है, इसका दुख है। उन्होंने कहा कि राज्य की सीमाएं, नदी तथा पहाड़ों या संधिपत्रों से निर्धारित नहीं होती, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती है। वीर सावरकर ऐसे प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी भूमि (फ्रांस) पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुंचा। दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंडमान के कठोर कारावास में जेल की दीवरों पर कील और कोयले से राष्ट्रवादी कविताएं लिखी।</p>
<p>ब्रिटिश सरकार ने वीर सावरकर को क्रांति कार्यों के लिए दो-दो आजन्म कारावास की सजा दी, जो विश्व के इतिहास की पहली एवं अनोखी सजा थी। वे विश्व के पहले ऐसे लेखक थे जिनकी कृति ‘द इंडियन वॉर आफॅ इंडिपेंडेस-1857’ दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। गौरतलब है कि जून 1908 में उनकी पुस्तक तैयार हो गयी किंतु मुद्रण की समस्या आ गयी। इसके लिए लंदन से लेकर पेरिस और जर्मनी तक प्रयास किए किंतु सभी प्रयास असफल रहे। बाद में यह पुस्तक किसी प्रकार गुप्त रुप से हालैंड से प्रकाशित हुई और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंचायी गयी। सावरकर पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने वापस ले लिया। वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना किया। नतीजा उनके वकालत करने पर रोक लगा दी गयी।</p>
<p>वीर सावरकर ने राष्ट्रध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सर्वप्रथम सुझाव दिया जिसे डा0 राजेंद्र प्रसाद ने स्वीकार किया। उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। 10 मई, 1907 को उन्होंने इंडिया हाउस लंदन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती मनाई। इस अवसर पर उन्होंने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत के स्वातंत्रय का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। वीर सावरकर भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर के क्रांतिकारियों में अद्वितीय थे। उनका नाम ही भारतीय क्रांतिकारियों के लिए संदेश था। उनकी पुस्तकें क्रांतिकारियों के लिए गीता समान थी। लंदन में रहते हुए उनकी मुलाकात क्रांतिकारी लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इंडिया हाउस की देखरेख करते थे।</p>
<p>01 जुलाई, 1909 को मदनलाल ढ़ीगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिए जाने के बाद उन्होंने लंदन टाइम्स में एक लेख भी लिखा जो क्रांतिकारिता से परिपूर्ण था। 13 मई 1910 को पेरिस से लंदन पहुंचने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया परंतु 8 जुलाई 1910 को एसएस मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते समय सीवर होल के रास्ते निकल लिए। 24 दिसंबर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके बाद 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया। 1921 में मुक्त होने पर वह स्वदेश लौटे और फिर तीन साल जेल काटी। जेल में ही उन्होंने हिंदुत्व पर शोध ग्रंथ लिखा।</p>
<p>स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे 1937 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के कर्णावती में हुए 19 वें सत्र के अध्यक्ष चुने गए। 15 अप्रैल 1938 को उन्हें मराठी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। 22 जून 1941 को उनकी मुलाकात सुभाषचंद्र बोस से हुई। 9 अक्टूबर 1942 को भारत की स्वतंत्रता के निवेदन सहित उन्होंने चर्चिल को तार भेजकर सूचित किया। दुर्भाग्य पूर्ण की आजादी के बाद भी कांग्रेस उनसे नफरत करती रही और नेहरु सरकार ने 5 फरवरी 1948 को उन्हें प्रिवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट धारा के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया। 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के भारत आगमन की पूर्व संध्या पर भी बेलगाम की जेल में उन्हें रोककर रखा गया। जुझारु तेवर और मातृभूमि के प्रति असीम श्रद्धा के कारण ही उन्हें वीर सावरकर कहा गया।</p>
<p>नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षड़यंत्र कांड के अंतरर्गत उन्हें 7 अप्रैल 1911 को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया। उन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों तथा नारियल आदि का तेल निकालना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटायी की जाती थी। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना नहीं दिया जाता था। वे 4 जुलाई 1911 से 21 मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे और भारत माता की आजादी का सपना देखते रहे। कुल मिलाकर वीर सावरकर 5585 दिन प्रत्यक्ष कारागार में और 4865 दिन नजरबंदी में रहे। दोनों को जोड़ दें तो वे 10410 दिन यानी 28 वर्ष 200 दिन तक जेल में रहे। वीर सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान खिलाफत आंदोलन का विरोध किया और इसके घातक परिणामों की चेतावनी दी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि खिलाफत आंदोलन से ही पाकिस्तान नामक विष वृक्ष की नींव पड़ी।</p>
<p>आइए हम बताते हैं कि कांग्रेस समेत तथाकथित सेक्यूलर वीर सावरकर और उनकी विचारधारा का विरोध क्यों करते हैं। दरअसल सावरकर ने 1946 के अंतरिम चुनावों के दौरान देश के जनमानस को आगाह किया कि वह कांग्रेस को वोट न दे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को वोट देने का अर्थ है भारत विभाजन। सावरकर सच साबित हुए। कांग्रेस का सावरकर से नफरत का एक अन्य कारण यह भी है कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र की उस विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया जो सदियों से वसुधैव कुटुम्बकम की हिमायती है। कांग्रेस को इस बात से भी चिढ़ है कि वीर सावरकर ने हिंदू राष्ट्र के विजय के इतिहास को प्रमाणिक ढंग से लिपिबद्ध क्यों किया? याद होगा तीन वर्ष पूर्व 2019 में जब महाराष्ट्र चुनाव के लिए भाजपा के संकल्प पत्र में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने का वादा किया गया तब कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह समेत कई लोगों ने सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या का साजिशकर्ता करार दिया।</p>
<p>गत वर्ष पहले सावरकर के शहीदी दिवस के दिन कांग्रेस पार्टी ने ट्वीट के जरिए जारी एक तस्वीर में स्वंतत्रता सेनानी वीर सावरकर को गद्दार बताकर उनकी राष्ट्रभक्ति का अपमान किया। तब कांग्रेस ने जारी तस्वीर के हवाले उन्हें गद्दार बताते हुए 1913 में अंडमान स्थित सेल्यूलर जेल से उनकी एक तथाकथित चिठ्ठी का भी जिक्र किया था जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार से रिहाई की मांग की थी। बेहतर होता कि कांग्रेस वीर सावरकर की शहादत को लांक्षित करने के बजाए उनका इतिहासपरक मूल्यांकन करती। कांग्रेस का ऐसा अपमानजनक आचरण तब है जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा वीर सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया जा चुका है।</p>
<p>उचित होगा कि कांग्रेस वामपंथी इतिहासकारों की सांप्रदायिक लेखनी और जुगाली पर भरोसा के बजाए ‘द इंडियन वॉर आफॅ इंडिपेंडेस-1857’ जो कि खुद सावरकर द्वारा लिखित है, से उनके विचारों और खोजपूर्ण इतिहास का अध्ययन करती। कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि जिस 1857 की क्रांति को वह सिपाही विद्रोह या अधिकतम भारतीय विद्रोह करार दी और अधिकांश वामपंथी इतिहासकारों ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह माना उस क्रांति को वीर सावरकर ने प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहा। अच्छी बात है कि देश की मौजूदा सरकार वीर सावरकर के प्रति कृतज्ञ है और स्वतंत्रता संग्राम में उनके महान योगदान को नए सिरे से परिभाषित कर रही है।</p>
<p><span style="color: #993300"><strong>नोट -लेख में लेखक के अपने विचार हैं।</strong></span></p>
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		<title>India-France Relations : नए क्षितिज पर भारत-फ्रांस संबंध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Feb 2025 17:33:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लखनऊ]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
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		<category><![CDATA[Narendra Modi's]]></category>
		<category><![CDATA[Relations]]></category>
		<category><![CDATA[Visit]]></category>
		<category><![CDATA[क्षितिज]]></category>
		<category><![CDATA[भारत-फ्रांस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left"><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK </strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-11283 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते को मिठास से भर दिया है। दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश बढ़ाने के साथ-साथ डिफेंस, सिविल न्यूक्लियर एनर्जी और स्पेस सेक्टर में मिलकर काम करने पर सहमति जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूक्रेन, मध्य-पूर्व एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मौजूदा हालात पर चर्चा के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में त्वरित सुधार पर भी जोर दिया है। दोनों नेताओं ने सीमा पार आतंकवाद समेत सभी प्रकार के आतंकवाद से मिलकर निपटने की प्रतिबद्धता के साथ आतंकवाद के फंडिंग नेटवर्क को भी ध्वस्त करने की प्रतिबद्धता जताई है।</p>
<p>चूंकि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी और टेक्नालॉजी अब नया आयाम ले रही है, इस नाते दोनों देशों ने एआई (आटिफिशियल इंटेलिजेंस) पर अलग से बयान जारी करते हुए वर्ष 2026 को ‘इंडो-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन’ घोषित किया। दोनों देशों ने संकल्प व्यक्त किया है कि वे एक फ्रेमवर्क बनाएंगे जिससे कि ऐसा जनरेटिव एआई विकसित हो जो भेदभाव रहित समानता पर आधारित हो। दोनों देशों ने स्कॉर्पीन सबमरीन निर्माण, मिसाइल हेलिकॉप्टर, जेट इंजन, एडवांस मॉड्यूल रिएक्टर, परमाणु उर्जा एवं शिक्षा के क्षेत्र में मिलकर काम करने के अलावा एकदूसरे को सहयोग का भरोसा दिया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के शहर मासेय में भारत के नए वाणिज्य दूतावास का शुभारंभ किया जिसका कि एक अरसे से जरुरत महसूस की जा रही थी। निःसंदेह इस पहल से दोनों देशों के आर्थिक कारोबार को नई ऊंचाई मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन भारतीय सैनिकों की शहादत को भी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी। प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अब दोनों देश विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों के जरिए एकदूसरे का स्वर बनेंगे। गौर करें तो विगत कुछ वर्षों के दरम्यान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक समझौते हुए हैं जिससे दोनों देशों के सामरिक-आर्थिक क्षेत्र को ऐतिहासिक मजबूती मिली है। इस समय दोनों देश रणनीतिक साझेदारी की 25 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।</p>
<p>अभी गत वर्ष ही दोनों देशों के बीच डिफेंस स्पेस पार्टनरशिप, सैटेलाइट लांच के लिए नए स्पेस इंडियन लिमिटेड और एरियन स्पेस के बीच एमओयू हुए। टाटा और एयरबस स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर 125 हेलीकॉप्टर बनाने पर सहमति बनी। दोनों देश विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य सेवा सहयोग, कृषि समेत पब्लिक एडमिनिस्टेªशन एंड रिफार्म्स के मसले पर भी कंधा जोड़े हुए हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रांे ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भारत के इरादे का समर्थन कर चुके हैं। गौर करें तो रक्षा सहयोग दोनों देशों के संबंधों का आधार है। गत वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस को ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण साझाीदार बताते हुए सुनिश्चित किया कि दोनों देश पनडुब्बी हो या नौसैनिक विमान सभी क्षेत्र में कंधा जोड़ आगे बढ़ने को तैयार हैं। तब दोनों देश ‘भारत-फ्रांस हिंद-प्रशांत रोडमैप’ जारी करते हुए रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक संतुलित और स्थिर व्यवस्था बनाने पर सहमति जाहिर की थी।</p>
<p>गौरतलब है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रीयूनियन द्वीप, न्यूकैलेडोनिया और फ्रेंच पोलिनेशिया जैसे क्षेत्रों में व्यापक उपस्थिति है। इस पहल से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागिरी पर रोक लगेगी। दोनों देशों के बीच कितना मधुर संबंध है इसी से समझा जा सकता है कि फ्रांस ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने देश का सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित कर चुका है। उस समय उन्होंने कहा था कि विश्व इतिहास में एक दिग्गज, भविष्य में एक निर्णायक भूमिका निभाने वाला, रणनीतिक साझेदार एक मित्र का स्वागत करने पर उन्हें गर्व है। याद होगा जब 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था तब उससे नाराज होकर दुनिया के ताकतवर मुल्क भारत पर प्रतिबंध थोपा था। तब फ्रांस ने भारत के साथ कंधा जोड़ते हुए रणनीतिक समझौते को व्यापक आयाम दिया।</p>
<p>फ्रांस लगातार भारतीय सेना को लडाकू जेट व पनडुब्बियों समेत साजो-सामान की आपूर्ति कर रहा है। 2018 के बाद से फ्रांस भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता देश बन चुका है। मौजूदा समय में भारत अपनी कुल रक्षा आयात का तकरीबन 29 फीसदी फ्रांस से करता है। दोनों देशों के बीच बढ़ती निकटता ने कारोबारी, रणनीतिक और सामरिक कुटनीति को नए क्षितिज पर पहुंचा दिया है। दोनों देश एकदूसरे के सैनिक अड्डे का इस्तेमाल और वहां अपने युद्धपोत रखने के अलावा उर्जा, तस्करी, आव्रजन, शिक्षा, रेलवे, पर्यावरण, परमाणु, आतंकवाद और अंतरिक्ष मामलों में मिलकर काम कर रहे हैं। फ्रांस आत्मनिर्भर भारत मुहिम का साझीदार बनने के साथ-साथ 2025 तक बीस हजार भारतीय छात्रों को अपने यहां पढ़ाई का सुअवसर उपलब्ध कराने का एलान कर चुका है। दोनों देशों के बीच यूपीआई को लेकर भी सहमति बन चुकी है।</p>
<p>विगत 25 वर्षों के दरम्यान दोनों देशों के बीच साझेदारी और समझदारी का ही परिणाम है कि आज भारत में विदेशी निवेश के लिहाज से फ्रांस तीसरा सबसे बड़ा निवेशक देश बन चुका है। भारत में 1000 से अधिक फ्रांस की कंपनियां काम कर रही हैं और सभी कंपनियों का संयुक्त टर्नओवर तकरीबन 30 अरब डॉलर से अधिक है। विगत ढ़ाई दशकों में भारत-फ्रांस संबंध को एक नया आयाम मिला है और दोनों देश राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक संबंधों में बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास किए हैं। फ्रांस के नेतृत्व के दृष्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ कुछ द्विपक्षीय बाध्यताओं ने भी दोनों देशों को एकदूसरे के निकट लाया है। यह तथ्य है कि चीन युद्ध के बाद भारत न केवल महाशक्तियों अपितु अफ्रीका व एशियाई देशों से भी अलग-थलग पड़ गया था।</p>
<p>भारत को एक ऐसे देश के प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक था जिससे उसका काई क्षेत्रीय विवाद न रहा हो। इसके अलावा 1962 में भारत व फ्रांस के बीच क्षेत्रों के हस्तांतरण संबंधी संधि के अनुमोदन ने दोनों देशों के संबंधों में मिठास घोला। तथ्य यह भी कि फ्रांस सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारतीय प्रयास का समर्थन करने वाले प्रथम देशों में से एक था। वह आज भी अपने पुराने रुख पर कायम है। दरअसल दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व में कई द्विपक्षीय तथा अंतर्राष्ट्रीय विषयों के संबंध में समान सोच है। हालांकि विदेश नीति के विरोधी अभिमुखन के कारण दोनों देशों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दों पर कई बार विरोधी रुख भी अपनाए हैं। मसलन हिंद-चीन क्षेत्र की स्वतंत्रता मुद्दे पर जहां भारत ने दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र की आजादी की बात पर बल देता है, वहीं फ्रांस लगातार औपनिवेशिक स्थिति बनाए रखने का पक्षधर रहा है।</p>
<p>दोनों देशों ने मोरक्को, तुनीसिया और अल्जीरिया की उपनिवेशिक स्थिति पर विरोधात्मक विचार प्रकट किए। 1956 में मिस्र द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर भी भारत ने बहुत सशक्त रुप से फ्रांस व ब्रिटेन के संयुक्त प्रयास का विरोध किया। इस संयुक्त हस्तक्षेप के विरोध में भारत ने मिस्र का साथ दिया। 1958 में डी गॉल के फ्रांस के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आना शुरु हो गया। 1959 में दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग विकसित करने की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। आर्थिक संबंधों में सुधार के कारण दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की कोशिश की तथा व्यापार के उचित आदान-प्रदान हेतु एक संयुक्त आयोग की स्थापना की।</p>
<p>1973 में फ्रांस के तत्कालीन अर्थव्यवस्था एवं वित्तमंत्री वेलेरी जिसकार्ड जो बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति भी बने, की पहल पर ‘भारत-फ्रांस अध्ययन समूह’ की स्थापना हुई। इस समूह की पहली बैठक फरवरी 1974 में फ्रांस में हुई तथा दूसरी बैठक मार्च 1975 में नई दिल्ली में हुई। इस समूह की सलाह पर दोनों देशों के मध्य समुद्री तेल उत्खनन, शक्ति उत्पादन व वितरण, कोयला उत्खनन व प्रयोग तथा तीसरे देश में संयुक्त उद्यम स्थापित करने संबंधित कई अहम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सबसे महत्वपूर्ण बात जो दोनों देशों के व्यापार में अहम है वह यह कि 1994 के बाद व्यापार संतुलन हमेशा भारत के पक्ष में बना हुआ है।</p>
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		<title>ARTICLE- Naxal problem : नक्सलियों से निपटने की चुनौती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jan 2025 05:52:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[Naxal problem]]></category>
		<category><![CDATA[चुनौती]]></category>
		<category><![CDATA[नक्सलियों]]></category>
		<category><![CDATA[नक्सली आतंक]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>RIPORT BY LOK REPORTER AMETHI NEWS। नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ राज्य के बीजापुर जिले में 8...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>RIPORT BY LOK REPORTER</strong></span></p>
<p><em><strong>AMETHI NEWS।</strong></em></p>
<p>नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ राज्य के बीजापुर जिले में 8 जवानों की हत्या कर फिर साबित किया है कि वे हद दर्जे के नीच, कायर और राष्ट्र विरोधी हैं। उन्होंने अपने कृत्यों से फिर ध्वनित किया है कि वे सामाजिक परिवर्तन के नुमाइंदे नहीं बल्कि राष्ट्रविरोधी ऐसे अराजक तत्व हैं जिनका राष्ट्र व समाज निर्माण से कुछ भी सरोकार नहीं है।</p>
<p>गौर करें तो नक्सलियों ने अपने इस कायराना कृत्य को तब अंजाम दिया जब जवान नक्सल विरोधी अभियान से लौट रहे थे। उन्होंने घात लगाकर जवानों की गाड़ी को आईईडी ब्लास्ट कर उनकी जान ले ली। गौर करें तो दंतेवाड़ा समेत सात जिलों में शामिल बस्तर अभी भी नक्सलियों का सबसे बड़ा पनाहगाह बना हुआ है।</p>
<p>यह पहली बार नहीं है जब नक्सलियों ने जवानों को निशाना बनाया हो। अभी गत वर्ष पहले दंतेवाड़ा जिले में उनके हमले में जिला रिजर्व गार्ड के 11 जवान शहीद हुए थे। याद होगा 3 अप्रैल 2021 को नक्सलियों ने सुकमा और बीजापुर जिलों की सीमा पर हमला कर 22 जवानों की जान ली थी।</p>
<p>इसी तरह 21 मार्च 2020 को सुकमा के मिनपा इलाके में हमला बोल 17 सुरक्षाकर्मियों की जान ली। 9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा में विस्फोट कर भाजपा विधायक भीमा मंडावी समेत चार सुरक्षाकर्मियों की हत्या की। 24 अप्रैल 2017 को सुकमा जिले में ही बुरकापाल में हमला कर सीआरपीएफ के दो दर्जन जवानों को मौत की नींद सुला दी।</p>
<p>यह बेहद चिंता का विषय है कि छत्तीसगढ़ राज्य के घने जंगलों में पिछले चार दशक से नक्सली अपनी जड़ जमाए हुए हैं और उन्हें अभी तक खत्म नहीं किया जा सका है। तमाशा यह कि एक ओर नक्सली सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव देते रहते हैं वहीं दूसरी ओर आतंकियों जैसी गतिविधियां चलाकर जवानों की जान ले रहे हैं।</p>
<p>सवाल लाजिमी है कि आखिर उन पर किस तरह भरोसा किया जाए? आंकड़ों पर गौर करें तो विगत छः वर्षों में नक्सली हिंसा की लगभग 6000 से अधिक घटनाएं हो चुकी है। इन घटनाओं में तकरीबन 1300 नागरिक और तकरीबन 600 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। हां, यह सही है कि जवानों की सतर्कता के कारण पिछले कुछ समय से नक्सलियों पर नकेल कसा है और उनकी आक्रामकता कुंद हुई है। पिछले कई मुठभेड़ों के दौरान वे भारी संख्या में मारे भी गए हैं।</p>
<p>लेकिन उनके कृत्यों से साफ हैं कि उनका हौसला अभी टूटा नहीं है। हालांकि गौर करें तो जवानों की सतर्कता के कारण छत्तीसगढ़ को छोड़ नक्सल प्रभावित 10 राज्यों में नक्सली घटनाओं में कमी आयी है। नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई में तकरीबन दो दर्जन से अधिक शीर्ष नक्सली मारे जा चुके हैं। गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस साल नक्सली हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई।</p>
<p>इसी तरह बिहार में भी कम हिंसक घटनाएं दर्ज हुई हैं। लेकिन मौजूदा घटनाओं से साफ है कि उनके फन को पूरी तरह कूचला नहीं जा सका है। वे अभी भी देश के कई राज्यों में अपहरण और फिरौती जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। घातक हथियार खरीद रहे हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्राकृतिक संसाधनों वाले राज्यों में काम करने वाली कंपनियों से रंगदारी वसूल रहे हैं। यही नहीं वे इन क्षेत्रों में चलने वाली केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा भी हड़प रहे हैं।</p>
<p>नक्सल प्रभावित जनता नक्सलियों की जबरन वसूली से तंग आ चुकी है। अब जब सरकार द्वारा हाशिए पर पड़े लोगों को रोजगार कार्यक्रमों के जरिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम किया जा रहा है तो यह उन्हें रास नहीं आ रहा है। दरअसल नक्सली एक खास रणनीति के तहत सरकारी योजनाओं में बाधा डाल रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जनता का रोजगारपरक सरकारी कार्यक्रमों पर भरोसा बढ़े।</p>
<p>उन्हें डर है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं फलीभूत हुई तो आदिवासी नौजवानों को रोजगार मिलेगा और वे नक्सली संगठनों का हिस्सा नहीं बनेंगे। यही वजह है कि नक्सली समूह सरकारी योजनाओं में रोड़ा डाल बेरोजगार आदिवासी नवयुवकों को अपने पाले में लाने के लिए किस्म-किस्म के लालच परोस रहे हैं। अकसर सुना जाता है कि वे अपने संगठन से जुड़ने वाले युवकों और युवतियों को सरकारी नौकरी की तरह नाना प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराने का एलान करते हैं।</p>
<p>नक्सली आतंक की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब वे कंप्युटर शिक्षा प्राप्त ऐसे नवयुवकों की तलाश कर रहे हैं, जो आतंकियों की तरह हाईटेक होकर उनके विध्वंसक कारनामों को अंजाम दे सके। नक्सली अब परंपरागत लड़ाई को छोड़ आतंकी संगठनों की राह पकड़ लिए हैं। अगर शीध्र ही सरकार उनके खतरनाक विध्वंसक प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगायी तो उनके कंप्युटराइज्ड और शिक्षित गिरोहबंद लोग जंगल से निकलकर शहर की ओर रुख करेंगे।</p>
<p>ऐसी स्थिति में उनसे निपटना आसान नहीं होगा। पर अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रही है। उन्हें विश्वास में ले रही है। लेकिन नक्सली अपनी बंदूक का मुंह नीचे करने को तैयार नहीं हैं। खतरनाक बात यह कि नक्सलियों का संबंध आतंकियों से भी जुड़ने की खबरें उजागर होती रहती हैं। याद होगा गत वर्ष पहले पूर्वोत्तर के आतंकियों से उनके रिश्ते-नाते उजागर हुए थे।</p>
<p>गत वर्ष पहले आंध्र प्रदेश पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने एक संयुक्त कार्रवाई में आधा दर्जन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया था जो नक्सलियों को लाखों रुपए मदद दिए थे। खबर तो यहां तक थी कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ नक्सलियों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए अंडवर्ल्ड की मदद से उन्हें आर्थिक मदद पहुंचा रही है। यह तथ्य है कि नक्सलियों के राष्ट्रविरोधी कृत्यों में नेपाली माओवादियों से लेकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन भी रुचि ले रहे हैं।</p>
<p>गत वर्ष पहले आईएसआई और नक्सलियों का नागपुर कनेक्शन देश के सामने उजागर हो चुका है। नक्सलियों के पास मौजूद विदेशी हथियारों और गोला बारुदों से साफ है कि उनका संबंध भारत विरोधी शक्तियों से है। आज की तारीख में नक्सलियों के पास रुस-चीन निर्मित अत्याधुनिक घातक हथियार मसलन एके छप्पन, एके सैतालिस एवं थामसन बंदूकें उपलब्ध हैं। इसके अलावा उनके पास बहुतायत संख्या में एसएलआर जैसे घातक हथियार भी हैं।</p>
<p>याद होगा कुछ साल पहले नक्सलियों ने बिहार राज्य के रोहतास जिले में बीएसएफ के शिविर पर राकेट लांचरों से हमला किया था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर नक्सलियों को ऐसे खतरनाक देशी-विदेशी हथियारों की आपूर्ति कौन कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के तथाकथित अर्बन बुद्धिजीवी ही उनकी मदद कर रहे हैं? इससे इंकार नहीं किया जा सकता।</p>
<p>ऐसा इसलिए कि इन बुद्धिजीवियों द्वारा अकसर दलील दिया जाता है कि नक्सलियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को रोककर ही नक्सल समस्या का अंत किया जा सकता है। पर वे यह नहीं बता पाते हैं कि जब सरकार द्वारा बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाता है तो वे सकारात्मक रुख क्यों नहीं दिखाते? विडंबना यह भी कि नक्सली समर्थक बुद्धिजीवी जमात नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने के प्रयास के बजाए इस बात पर ज्यादा बहस चलाने की कोशिश करता है कि नक्सलियों के साथ सरकार अमानवीय व्यवहार कर रही है।</p>
<p>यही नहीं वे नक्सली आतंक को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बताने से भी नहीं चूकते हैं। दुखद यह है कि इन बौद्धिक जुगालीकारों को विद्रुप, असैद्धांतिक और तर्कहीन नक्सली पीड़ा तो समझ में आती है लेकिन नक्सलियों द्वारा बहाए जा रहे निर्दोष जवानों के खून और हजारों करोड़ की संपत्ति का नुकसान उनकी समझ में क्यों नहीं आता है। जब भी अर्द्धसैनिक बलों द्वारा नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया जाता है तो इस जमात द्वारा अपनी छाती धुनना शुरु कर दिया जाता है।</p>
<p>वे न सिर्फ मुठभेड़ को फर्जी ठहराने की कोशिश करते हैं बल्कि सुरक्षाबलों की शहादत का भी अपमान करते हैं। यह कृत्य देश के विरुद्ध है। उचित होगा कि केंद्र व छत्तीसगढ़ राज्य की सरकार नक्सलियों का फन तो कुचले ही साथ ऐसे लोगों के विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई करे जो नक्सली हिंसा का समर्थन करते हैं।</p>
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		<title>MEMORIES : आँखों से आंखों का वह आखिरी संवाद..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Dec 2024 16:03:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Article]]></category>
		<category><![CDATA[memories]]></category>
		<category><![CDATA[stories स्मृति शेष]]></category>
		<category><![CDATA[आँखों]]></category>
		<category><![CDATA[यादें]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY GAURAV AWASTHI स्मृतिशेष पंडित सरयू प्रसाद द्विवेदी स्मृति उत्तर प्रदेश के रायबरेली...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY GAURAV AWASTHI</strong></span></p>
<p><span style="color: #993300"><strong>स्मृतिशेष पंडित सरयू प्रसाद द्विवेदी स्मृति</strong></span></p>
<figure id="attachment_19981" aria-describedby="caption-attachment-19981" style="width: 150px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-19981 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/08/फोटो-06-1.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" /><figcaption id="caption-attachment-19981" class="wp-caption-text"> </figcaption></figure>
<p>उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के एक प्राइवेट अस्पताल के HDU वार्ड में लगीं मशीनें कमजोर होते शरीर, उखड़ती सांसों की गवाही दे रही थी। BP और Oxygen लेबल क्षण-क्षण fluctuate कर रहा था। Pulse नॉर्मल से दो गुना अधिक लेकिन सदैव गतिशील रहने वाले सत्य के अजेय योद्धा पंडित सरयू प्रसाद द्विवेदी (बाबूजी) अंतिम पहर में भी मौत के चक्रव्यूह को भेद कर बाहर निकलने की कोशिश में थे।</p>
<p>आंखें मुंदने और अंतिम सांस लेने के 24 घंटे पहले की बात थी। आंखों से उनका संवाद जारी था। भर आंखों से वह देखते जा रहे थे। उनके इस देखने में भी जैसे आदर्श जीवन की रीति-नीति, आचार-विचार, सिद्धांत और सत्य के संदेश प्रवाहित थे। वह आंखों से कहते जा रहे थे और हमारी आंसुओं में डबडबाई आंखें उस संदेश को पढ़ने की समझ बढ़ाने की कोशिश में।</p>
<p>इस बीच उन्होंने कुछ बोलने क्या पानी मांगने जैसी कोई आवाज निकालनी चाही पर हम असहाय!!! सिस्टर की सख्त ताकीद थी कि oral कुछ भी नहीं दिया जा सकता। ऑक्सीजन मास्क हटा नहीं कि सांसो का संकट बढ़ा। दो जोड़ी आंखों के कहने-सुनने का य़ह क्रम करीब डेढ़-दो घंटे तब तक चला जब तक कोई दूसरा तीमारदारी में आ नहीं गया। सत्यवादी बाबूजी से यही आखिरी मुलाकात थी।</p>
<p>दूसरे दिन वह उस यात्रा के लिए महाप्रस्थान कर गए, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। बाबूजी ने अभी 7 दिसंबर को ही जीवन के 84 वर्ष पूर्ण करके 85वे में प्रवेश किया था। 1008 महीने और 30670 दिनों का जीवन जीकर अनंत यात्रा पर निकले बाबुजी द्वारा आंखों से दिया गया य़ह आशीर्वाद अब हमारे जीवन की अमूल्य थाती है।</p>
<p>लंबा कद, सुगठित-गौरांग शरीर, सन जैसे सफेद बाल, बढ़ी दाढ़ी, मध्य शिखा, त्रिपुण्ड युक्त दिव्य ललाट उनके संत प्रकृति का प्राकट्य था। अंदर कोमल-बाहर कठोर, प्रखर वक्ता-स्पष्ट सोच वाले गांधीवादी बाबूजी का विराट व्यक्तित्व इस युग में ब्राह्मणत्व का परिचय था। परचम था। ज्ञान लबालब। घमंड शून्य। धर्म की पालना भी। कर्म का उद्योग भी। पद-पैसे की लिप्सा नहीं। सम्मान-अभिमान से दूर उनका जीवन संघर्ष की आंच में ढला था। पका था।</p>
<p>रायबरेली-उन्नाव की सीमा पर बसे बैसवारे के छोटे से गांव शांति खेड़ा (चहोतर) से निकलकर पहले प्रयागराज, खंडवा और फिर पिता की इच्छा के अनुरूप रायबरेली में 40 साल पहले अपना स्थाई आशियाना बनाने के लिए संघर्ष किया लेकिन सत्य का साथ नहीं छोड़ा। नियम-संयम नहीं तोड़ा। सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। स्पष्टता जीवन की का ईष्ट अंत तक बनी रही। चेहरा देखकर बातें करने से उन्हें गुरेज था। सच को सच कहने का साहस उनकी विशेषता थी।</p>
<p>इतने विशेषणों से भी उनके जीवन पर विराम नहीं लगता। वह हर किसी के जीवन को सवारने, सुधारने और आगे बढ़ाने के लिए हर वक्त संकल्पित थे। जीवन की हर समस्या का हल या आगे बढ़ने का सूत्र वह किसी मंत्र, चौपाई और दोहे के उदाहरण से क्षण भर में पकड़ा देते थे। उनके संपर्क में आने वाला इस आशीर्वाद से कभी वंचित नहीं रहा। अपने ज्ञान का उन्होंने सदैव सार्थक उपयोग समाज, परिवार, व्यक्ति के हित में जरूर किया। यह उनके स्वभाव का अहम हिस्सा था और संस्कार भी। यही छाप आप उनके सुपुत्र में भी देख-सुन और महसूस कर सकते हैं।</p>
<p>हमें भी यह सौभाग्य 1996 में रायबरेली आने के तत्काल बाद उनके सुपुत्र विनय के ठीक-ठाक संपर्क में आने के बाद मिलने लगा। हमारे सुव्यवस्थित जीवन के असली सूत्रधार बाबूजी ही थे। स्वभाववश जब कहीं अटके-भटके तब बाबूजी ने ही कभी उंगली पकड़कर, कभी डांट-फटकारकर, कभी रामचरितमानस, गीता, शास्त्र, उपनिषद में समाहित सूत्रों के आधार पर हमारे जीवन को सही राह पर चलाया। जीवन के अच्छे-सच्चे का सारा श्रेय बाबूजी को ही। कमी-ख़राबी हमारी अपनी।</p>
<p>हमारा और हमारे परिवार का जो कुछ भी है, वह सब उन्हीं का दिया हुआ है। वह हमारे धर्म पिता थे। लोकल गार्जियन थे। इस सबसे अलग वह सब कुछ थे। पराये शहर में दूसरा घर मिल जाना सरल है पर दूसरे माता-पिता का मिलना लाख सौभाग्य। यह हमारा सौभाग्य था कि हमें घर से दूर एक दूसरे पिता के रूप में बाबूजी मिले। अम्मा मिलीं। अम्मा का मातृवत प्रेम और कड़क बाबूजी की वज़ह से रायबरेली में हमें मम्मी और पिताजी की कमी कभी महसूस ही नहीं हुई। अब जो कमी शेष जीवन में सालेगी, वह उचित मार्गदर्शन और ठोक- पीट कर सही रास्ते पर लाने वाले की रहेगी।</p>
<p>कौन बताएगा? कौन समझायेगा? जीवन जीने की उन गूढ़ बातों को!!! गलतियों में कौन सुधार कराकर सही राह पर लाएगा????<br />
ऐसे बाबूजी को कैसे अपने जीवन से विदा किया जा सकता है? धर्मपुत्र होने के नाते आपसे जो पाया, जो सीखा (सब तो असंभव), उसे सहेजकर भावी पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अब हमारी। इस जिम्मेदारी का निर्वहन ही आपके न होकर भी होने का अहसास कराता रहेगा।<br />
ईश्वर के श्रीचरणों में स्थान पाने के आप सौ फीसदी सुपात्र हैं तो ऐसी प्रार्थना याचना बेमतलब ही। बाबूजी आप सदा स्मृतियों में थे, हैं और रहेंगे..आपकी चिर स्मृति को स्थिर प्रणाम I</p>
<p><span style="color: #00ffff"><strong>( नोट-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )</strong></span></p>
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