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	<title>लेख Archives - Lok Dastak</title>
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	<description>Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, Breaking News in Hindi.Lok Dastak</description>
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	<title>लेख Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>Quick Comment : आज वेनेज़ुएला हिला, कल कौन होगा निशाने पर ?</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/25355</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 15:41:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Quick Comment]]></category>
		<category><![CDATA[word news]]></category>
		<category><![CDATA[निशाने]]></category>
		<category><![CDATA[वेनेज़ुएला]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; प्रस्तुति &#8211; प्रणय विक्रम सिंह इतिहास की सबसे खतरनाक साजिशें हमेशा खुले युद्ध से...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<h3><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; प्रणय विक्रम सिंह</strong></span></h3>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-25362" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot_20260106-210127_Facebook-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></p>
<p>इतिहास की सबसे खतरनाक साजिशें हमेशा खुले युद्ध से नहीं, अदृश्य तंत्रों से जन्म लेती हैं। वे तलवारों की टकराहट में नहीं, बल्कि संस्थाओं के भीतर, भरोसे के क्षरण में और निष्ठाओं की खरीद-फरोख़्त में आकार लेती हैं।</p>
<p>वेनेज़ुएला की घटना को यदि केवल एक तख़्तापलट कहा जाए, तो हम उसके असली अर्थ को खो देंगे। यह केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भीतर से निष्क्रिय कर देने की प्रक्रिया थी। इसके केंद्र में वह अवधारणा है जिसे आज की राजनीति में &#8216;डीप स्टेट&#8217; कहा जाता है। एक ऐसा छिपा हुआ शक्ति-जाल, जो चुनी हुई सरकारों से परे जाकर निर्णयों, नीतियों और परिणामों को नियंत्रित करता है।</p>
<p>डीप स्टेट कोई संस्था नहीं, बल्कि हितों का अदृश्य गठजोड़ है। खुफिया एजेंसियां, बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट, वित्तीय लॉबी, मीडिया नैरेटिव और तथाकथित मानवाधिकार मंच ये सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें किसी राष्ट्र की संप्रभुता बाहर से नहीं, भीतर से गलने लगती है।</p>
<p>वेनेज़ुएला में भी यही हुआ। यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि अमेरिकी कमांडो राष्ट्रपति भवन तक पहुंचे, बल्कि यह थी कि सेना और पुलिस की ओर से एक भी गोली नहीं चली। राष्ट्रपति अपने सुरक्षाबलों को देखते रहे। वे बल, जिन पर राष्ट्र की संप्रभुता टिकी होती है, मौन खड़े रहे।<img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-25358" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-4.jpeg" alt="" width="416" height="471" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-4.jpeg 416w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-4-265x300.jpeg 265w" sizes="(max-width: 416px) 100vw, 416px" /></p>
<p>यह किसी सशस्त्र विद्रोह का दृश्य नहीं था, यह राजनीतिक शक्ति के भीतर से निष्क्रिय कर दिए जाने का क्षण था। सत्ता का पतन बंदूक से नहीं, विश्वास के विघटन से हुआ। यही डीप स्टेट की सबसे भयावह सफलता होती है, जब प्रतिरोध बाहर नहीं दिखता, क्योंकि वह भीतर पहले ही मर चुका होता है। सेना टूटती नहीं, ठहर जाती है। सुरक्षा बल विद्रोह नहीं करते, बस मौन हो जाते हैं। और सत्ता, बिना लड़े, अकेली पड़ जाती है।</p>
<p>यह एक रूपकात्मक युद्ध था, जहां बंदूकें नहीं चलीं, बयान चले। जहां गोलियां नहीं बरसीं, ग्रांट्स और फंडिंग चलीं।अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति का यह नया चेहरा है प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं, प्रबंधित पतन।</p>
<p>पहले आर्थिक प्रतिबंधों से जनजीवन को थकाओ, फिर उसी थकान को सरकार-विरोध में ढालो। मीडिया से नैरेटिव गढ़ो, संस्थाओं में अविश्वास भरो और अंततः &#8216;लोकतंत्र की बहाली&#8217; के नाम पर सत्ता परिवर्तन को वैध ठहराओ। यह लोकतंत्र नहीं, लोकतंत्र का मुखौटा है। लक्ष्य है नियंत्रण, जहां प्रतिबंध से पीड़ा, प्रचार से प्रतिरोध और परिणाम में पराजय सुनिश्चित की जाती है।</p>
<p>यह पैटर्न नया नहीं है। महाभारत से लेकर आधुनिक काल तक सत्ता के भीतर से सत्ता को गिराने की कहानियां लिखी गईं। महाभारत में युद्ध भले कुरुक्षेत्र में हुआ, पर पराजय की पटकथा सभा में लिखी गई थी। युधिष्ठिर को हराने के लिए तलवार नहीं उठी, पासा फेंका गया। द्रौपदी का अपमान किसी शस्त्रबल से नहीं, बल्कि संस्थागत मौन और सामूहिक कायरता से संभव हुआ। वही सभा, जो न्याय की रक्षक होनी चाहिए थी, अन्याय की साक्षी बन गई। यही डीप स्टेट का शास्त्रीय रूप था, जहां निर्णायक क्षण रणभूमि में नहीं, सत्ता-सभाओं में तय होते हैं और युद्ध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।</p>
<p>इसी परंपरा की आधुनिक कड़ी प्लासी थी, जहां मीर जाफ़र ने चांदी के सिक्कों में आत्मा गिरवी रख दी। आज वही भूमिका डॉलर, फंडिंग और फेलोशिप निभा रही हैं। तब कंपनी थी, आज बहुराष्ट्रीय तंत्र है। फर्क बस इतना है कि अब साम्राज्य झंडे नहीं गाड़ते, नैरेटिव थोपते हैं, गवर्नर नहीं बैठाते, नीतियां लिखवाते हैं और यह चेतावनी केवल लैटिन अमेरिका के लिए नहीं है।</p>
<figure id="attachment_25359" aria-describedby="caption-attachment-25359" style="width: 474px" class="wp-caption alignnone"><img decoding="async" class="size-full wp-image-25359" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-3.jpeg" alt="" width="474" height="323" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-3.jpeg 474w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-3-300x204.jpeg 300w" sizes="(max-width: 474px) 100vw, 474px" /><figcaption id="caption-attachment-25359" class="wp-caption-text"></span></strong> <strong><span style="color: #ff6600">वेनेज़ुएला हमले की तस्वीर</span></strong></figcaption></figure>
<p>भारत में भी ऐसे संकेत दिखते हैं संस्थाओं पर अविश्वास, सेना-पुलिस की छवि पर प्रहार, न्यायिक प्रक्रियाओं पर संदेह, अर्थव्यवस्था को बदनाम करने की मुहिम और सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाला सतत प्रचार। उद्देश्य वही है लोकतंत्र को बचाने के नाम पर लोकतंत्र को अस्थिर करना।</p>
<p>भारत का सौभाग्य है कि उसकी सभ्यतागत स्मृति गहरी है और उसकी संस्थागत रीढ़ अभी मज़बूत है। पर सावधानी आवश्यक है, क्योंकि डीप स्टेट का हमला शोर नहीं करता, वह धीरे-धीरे भरोसे को खाता है। वह सेना नहीं तोड़ता, निष्ठाएं खरीदता है। वह चुनाव नहीं रोकता, परिणामों को संदिग्ध बनाता है।</p>
<p>इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि वेनेज़ुएला क्यों टूटा। प्रश्न यह है कि कौन-सी शक्तियां दुनिया को प्रयोगशाला समझकर राष्ट्रों पर प्रयोग कर रही हैं और उससे भी बड़ा प्रश्न यह कि कोई भी देश कब तक इस जाल से स्वयं को बचाए रख सकता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-25361 size-full aligncenter" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2026/01/images-1.jpeg" alt="" width="260" height="175" /></p>
<p>इतिहास का सबक स्पष्ट है, जो राष्ट्र अपनी संस्थाओं को बिकाऊ नहीं बनने देते, वही संप्रभु रहते हैं। जो समाज नैरेटिव से पहले प्रमाण, शोर से पहले सत्य और भावनाओं से पहले विवेक को चुनता है, वही डीप स्टेट के जाल से बच पाता है।</p>
<p>अंततः यही इतिहास का अटल सत्य है, साम्राज्य अब बाहर से हमला नहीं करते, वे भीतर से रास्ता बनाते हैं और जो राष्ट्र अपने भीतर की दीवारें मजबूत नहीं रखते, वे एक दिन बिना युद्ध के हारे हुए पाए जाते हैं।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>Malaviya Jayanti : राष्ट्रवाद के अपराजेय योद्धा थे मालवीय जी</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/25251</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Dec 2025 15:57:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Malaviya jayanti]]></category>
		<category><![CDATA[अपराजेय]]></category>
		<category><![CDATA[पंडित मदन मोहन मालवीय]]></category>
		<category><![CDATA[योद्धा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक (वरिष्ठ स्तम्भकार) पंडित मदनमोहन मालवीय जी की जयंती पर विशेष...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><strong style="color: #ff0000">प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक (वरिष्ठ स्तम्भकार)</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-11283" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<h4><strong>पंडित मदनमोहन मालवीय जी की जयंती पर विशेष आलेख</strong></h4>
<p>पंडित मदनमोहन मालवीय जी का संपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक जीवन स्वदेश के खोए गौरव को स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहा। जीवन-युद्ध में उतरने से पहले ही उन्होंने तय कर लिया था कि देश को आजाद कराना और सनातन संस्कृति की पुर्नस्थापना उनकी प्राथमिकता होगी। 1893 में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। बतौर वकील उनकी सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने चौरी-चौरा कांड के 151 अभियुक्तों को, जिन्हें सत्र न्यायाधीश ने फांसी की सजा दी थी, उच्च न्यायालय में पैरवी करके बचा लिया। उनकी इस सफलता ने आजादी के दिवानों में इंकलाब ला दिया।</p>
<p>उनका मकसद भी था कि देश के युवा आजादी की लड़ाई से जुड़े और भारतीय संस्कृति की पुर्नस्थापना के संवाहक बनें। इसी उद्देश्य से उन्होंने 4 फरवरी, 1916 को बसंत पंचमी के दिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना की। एक लोकश्रुति है कि पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प इलाहाबाद के कुंभ मेले में देश भर से आए श्रद्धालुओं के बीच जब व्यक्त किया तो उस समय एक वृद्धा ने उन्हें चंदे के रुप में एक पैसा दिया। इसके उपरांत मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के विकास के लिए चंदा इकठ्ठा करने के लिए देश भर की यात्रा की। कहा जाता है कि जब काशी नरेश गंगा से डुबकी लगाकर निकले तो सामने मालवीय जी खड़े थे। वे उनसे विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दान में जमीन मांग ली।</p>
<p>कलकत्ता के दानवीरों ने उन्हें रथ पर बिठाया और घोड़ों की जगह खुद जुते। जब वे रामपुर के नवाब से विश्वविद्यालय के लिए धन मांगने गए तो उसने उनका तिरस्कार करते हुए अपनी जूती दान में दिया। लेकिन मालवीय जी इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने नवाब की जूती को उसका इज्जत बता नीलामी के लिए बाजार में बैठ गए। नवाब पानी-पानी हो गया। उसे मुंहमांगी बोली लगाकर मालवीय जी से जुतियां खरीदनी पड़ी। एक कहावत यह भी है कि उसी समय एक सेठ का निधन हुआ और मालवीय जी उसकी शव यात्रा में लुटाए जा रहे पैसों को बटोरना शुरु किया।</p>
<p>जब लोगों ने उनसे पूछा कि आप क्या कर रहे हैं तब उन्होंने कहा कि ‘निजाम का दान न सही, शव-विमान का ही सही।’ जब यह बात निजाम के कानों तक गयी तो वह बहुत शर्मिंदा हुआ और मालवीय जी को ढे़र धनराशि दी। मालवीय जी को विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है जब लोग सुशिक्षित होंगे। मालवीय जी ने शिक्षा संपूर्ण भारत में शिक्षा का प्रचार किया। उनका स्पष्ट मानना था कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों और अधिकारों का समुचित पालन तभी कर सकता है जब वह शिक्षित होगा। मालवीय जी 1919 से 1939 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे।</p>
<p>उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य प्रकट करते हुए एक दीक्षांत भाषण में कहा था कि ‘इस विश्वविद्यालय की स्थापना इसलिए की गयी कि यहां के छात्र विद्या अर्जित करें, देश व धर्म के सच्चे सेवक बनें, वीरता के साथ अन्याय का प्रतिकार करें।’ आजादी की लड़ाई और उसके बाद इस विश्वविद्यालय ने देश की जो सेवा की, वह सर्वविदित है। मालवीय जी सनातन हिंदू थे। वे तिलक लगाते थे और संध्यापूजन करते थे। जब वे गोलमेज परिषद में गए तो अपने साथ गंगाजल ले गए। 1923 और 1936 में दो बार हिंदू महासभा के प्रधान चुने गए। उनका कहना था ‘मैं चाहता हूं कि भारत के गांव-गांव में हिंदू सभाएं स्थापित हों और हिंदुओं के शक्तिशाली संगठन हों।’ लेकिन उनका हिंदुत्व संकीर्ण परिधि में सीमित नहीं था।</p>
<p>उन्होंने एक संस्था की स्थापना की थी जिसका काम उन अस्पृश्यों को हिंदू धर्म में दीक्षित करना था, जिन्हें ईसाई मिशनरियों ने ईसाई बना दिया था। मालवीय जी सनातन संस्कृति और भारतीय भाषा के पक्षधर थे। 1937-38 की एक घटना का खूब जिक्र होता है जब मालवीय जी को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दीक्षांत भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। विश्वविद्यालय के इतिहास में अभी तक दीक्षांत भाषण अंग्रेजी में ही दिए जाने की परंपरा रही। लेकिन मालवीय जी ने उस परंपरा को तोड़ हिंदी में भाषण देकर देशभक्ति का अनूठा उदाहरण पेश किया। ‘सर, स्पीक इन इंगलिश, वी कांट फॉलो योर हिंदी’ जैसे ही श्रोताओं के बीच से यह आवाज गूंजी तो पंडित मदन मोहन मालवीय जी का चेहरा तमतमा गया।</p>
<p>उन्होंने तपाक से जवाब दिया ‘महाशय, मुझे भी अंग्रेजी बोलना आता है। शायद हिंदी की अपेक्षा मैं अंग्रेजी में अपनी बात अधिक अच्छे ढंग से कह सकता हूं, लेकिन मैं एक पुरानी अस्वस्थ परंपरा को तोड़ना चाहता हूं।’ विदेशी हुकुमत की दृष्टि में देशभक्ति राष्ट्रद्रोह था। लेकिन मालवीय जी के रोम-रोम में देशभक्ति समायी हुई थी। उनका जीवन प्रतिक्षण राष्ट्र के लिए समर्पित था। गांधी जी उन्हें सबसे बड़ा देशभक्त मानते थे। एक बार कहा भी कि ‘मैं मालवीय जी की देशभक्ति की पूजा करता हूं।’ मालवीय जी के विशाल हृदय में समाज के सभी वर्गों के लिए सम्मान और प्रेम था। वे जाति-पांति और छुआछूत के धुर विरोधी थे। उन्होंने दलित नेता पीएन राजभोज के साथ सैकड़ों दलितों का मंदिर में प्रवेश कराया।</p>
<p>1932-33 में काशी में भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ। लोगों का घर से निकलना बंद हो गया। लोग भूख से तड़पने लगे। उनको सहायता पहुंचाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों की अलग-अलग कमेटियां बनी। मालवीय जी हिंदुओं की कमेटियों के अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में अनाज इकठ्ठा किया गया। तभी उन्हें जानकारी मिली कि मुसलमान मोहल्लों में मुसलमान भूख से बेहाल हैं। मालवीय जी इकठ्ठा किया गया संपूर्ण अनाज मुसलमानों के घरों में भिजवा दिया। मालवीय जी सिद्धांत के बड़े पक्के थे। उनका आचरण उच्चकोटि का था। उन्होंने ‘हिंदुस्तान’ का संपादन अपने हाथ में लिया तो उसके संचालक, जो मद्यपान के अभ्यस्त थे, से तय कर लिया था कि वे मद्यपान कर कभी नहीं बुलाएंगे।</p>
<p>एक दिन संचालक ने यह गलती कर बैठी। मालवीय जी तत्क्षण ही संपादक पद से इस्तीफा दे दिया। मालवीय जी स्वयं में पत्रकारिता के आदर्श मानदंड थे। उन्होंने 1907 में साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ और 1909 में दैनिक ‘लीडर’ अखबार निकालकर लोगों में राष्ट्रीय भावना का संचार किया। राजनीति के स्तर को भी उन्होंने ऊंचा उठाया। एक बार उनसे किसी ने कहा ‘राजनीति में अपनी उन्नति और दूसरे का विनाश अभिष्ट है।’ मालवीय जी ने उत्तर दिया ‘ऐसी राजनीति सच्ची राजनीति नहीं हो सकती। सच्ची राजनीति का उद्देश्य अपने साथ दूसरों की उन्नति के लिए प्रयत्न करना है।’</p>
<p>मालवीय जी इसी आदर्श पर जीवन भर चलते रहे। उनका संपूर्ण राजनीतिक जीवन मर्यादापूर्ण रहा। वे 24 साल की उम्र में कांग्रेस से जुड़ गए। 1901 में इलाहाबाद नगर निगम के उपाध्यक्ष चुने गए और दो वर्ष बाद प्रांतीय विधानसभा के सदस्य बने। असहयोग आंदोलन के आरंभ तक नरम दल के नेताओं के कांग्रेस छोड़ देने पर भी वे उसमें डटे रहे। कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित कर सम्मानित किया। मालवीय जी अपनी योग्यता के बल पर वायसराय की कौंसिल, इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल और सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के भी सदस्य बने।</p>
<p>उनमें निडरता, उदारता और सर्जनात्मक जिद्द कूट-कूटकर भरी थी। वे 1913 में हरिद्वार में गंगा पर बांध बनाने की अंग्रेजी योजना का तब तक विरोध किया जब तक कि शासन ने उन्हें भरोसा नहीं दिया कि गंगा को हिंदुओं की अनुमति के बिना बांधा नहीं जाएगा। शासन को यह भी वायदा करना पड़ा कि अंग्रेजी हुकुमत 40 प्रतिशत गंगाजल प्रयाग तक पहुंचाएगी। मालवीय जी जीवन भर समाज व राष्ट्र की सेवा की। वे सच्चे अर्थों में महामना थे।</p>
<p><span style="color: #993300"><strong>नोट &#8211; उपर्युक्त लेख में लेखक/स्तम्भकार के द्वारा प्रस्तुत विचार हैं।</strong></span></p>
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			</item>
		<item>
		<title>SPECIAL ARTICLE : भोजन की बर्बादी बनाम भूख से बेहाल जिंदगी</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/25042</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Oct 2025 16:18:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[जिंदगी]]></category>
		<category><![CDATA[बनाम]]></category>
		<category><![CDATA[भूख से बेहाल]]></category>
		<category><![CDATA[भोजन की बर्बादी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक आज विश्व खाद्य दिवस है। विश्व खाद्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h2><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक</strong></span></h2>
<p>आज विश्व खाद्य दिवस है। विश्व खाद्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य भूख और कुपोषण को खत्म करने के लिए वैश्विक जागरुकता बढ़ाना, सभी के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भोजन सुनिश्चित करना और स्थायी खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देना है। लेकिन विडंबना है कि इस सार्थक उद्देश्य और पहल के बावजूद भी हर वर्ष करोड़ों टन भोजन बर्बाद हो रहा है। वहीं दूसरी ओर दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे हैं। विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (एसओएफआई) रिपोर्ट-2025 से उद्घाटित हुआ है कि वर्ष 2024 में 63.8 करोड़ से 72 करोड़ लोग जो वैश्विक जनसंख्या का क्रमशः 7.8 और 8.8 प्रतिशत है, भूख का सामना करेंगे।</p>
<p>इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कई देशों में बढ़ी हुई मुद्रास्फिति ने क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है जिसके कारण 2030 तक भूख और खाद्य असुरक्षा के उन्मूलन यानि एसडीजी लक्ष्य 2.1 बहुत दूर हो गया है। संयुक्त राष्ट्र की 2024 की ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 36 देशों में भूख का स्तर बेहद गंभीर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व स्तर पर 2025 तक 673 मिलियन लोग भूख का अनुभव करेंगे जो कुल जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत है। आंकड़ों के मुताबिक यह 2023 एवं 2022 की तुलना में थोड़ा कम है लेकिन चुनौती जस की तस बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र की 2024 की रिपोर्ट पर गौर करें तो विश्व में हर साल लगभग 1.05 अरब टन खाना बर्बाद होता है जो कि कुल खाद्य उत्पादन का 19 प्रतिशत है।</p>
<p>इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में हर दिन लगभग एक अरब से ज्यादा थालियां बर्बाद हो जाती है। खाने की बर्बादी के मामले में पहला स्थान चीन का है जहां हर साल 9.6 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। दूसरे स्थान पर भारत है जहां हर साल 6.7 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। यह प्रति व्यक्ति के हिसाब से 50 किलो ठहरता है। खाने की यह बर्बादी इस अर्थ में ज्यादा चिंतनीय है कि एक ओर जहां दुनिया भर के करोडों लोग भुखमरी के शिकार हैं वहीं करोड़ों टन खाना बर्बाद हो रहा है। याद होगा गत वर्ष पहले एसोचैम और एमआरएसएस इंडिया की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि भारत में हर वर्ष 440 अरब डॉलर के दूध, फल और सब्जियां बर्बाद होते हैं।</p>
<p>इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के एक बड़े उत्पादक देश होने के बावजूद भी भारत में कुल उत्पादन का करीब 40 से 50 फीसदी भाग जिसका मूल्य लगभग 440 अरब डॉलर के बराबर है, बर्बाद हो जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर साल उतना भोजन बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 2023-24 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 3322.98 लाख मिट्रिक टन था। लेकिन इसके बावजूद भी यह अन्न लोगों की भूख नहीं मिटा पा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह उत्पादित देश की आबादी के लिए कम है। लेकिन अन्न की बर्बादी के कारण करोड़ों लोगों को भूखे पेट रहना पड़ रहा है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना हजारों बच्चों की जान जाती है। वैश्विक भूख सूचकांक-2024 के मुताबिक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत दुनिया के 127 देशों में 105 वें स्थान पर रहा।</p>
<p>भारत को इस सूचकांक में गंभीर श्रेणी में रखा गया है। भारत का स्कोर 27.3 है जो गत साल से थोड़ा बेहतर है। यहां ध्यान देना होगा कि बर्बाद भोजन को पैदा करने में 25 प्रतिशत स्वच्छ जल का इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषि के लिए जंगलों को भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है। बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। उसी का नतीजा है कि खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है।</p>
<p>खाद्य वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन की अधिकता से भोजन से पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान में प्रोटीन की कमी होने लगी है। आंकड़ों के मुताबिक चावल में 7.6 प्रतिशत, जौ में 14.1 प्रतिशत, गेहूं में 7.8 प्रतिशत और आलू में 6.4 प्रतिशत प्रोटीन की कमी दर्ज की गयी है। अगर कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया भर में 15 करोड़ लोग इस नई वजह के चलते प्रोटीन की कमी का शिकार हो जाएंगे। यह दावा हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने अपनी ताजा रिपोर्ट में किया है। यह शोध एनवायरमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव जर्नल में प्रकाशित हुआ। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारतीयों के प्रमुख खुराक से 5.3 प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जाएगा। इस कारण 5.3 करोड़ भारतीय प्रोटीन की कमी से जूझेंगे।</p>
<p>गौरतलब है कि प्रोटीन की कमी होने पर शरीर की कोशिकाएं उतकों से उर्जा प्रदान करने लगती हैं। चूंकि कोशिकाओं में प्रोटीन भी नहीं बनता है लिहाजा इससे उतक नष्ट होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और उसका शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आयी तो भारत के अलावा उप सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी यह स्थिति भयावह होगी। इसलिए और भी कि यहां लोग पहले से ही प्रोटीन की कमी और कुपोषण से जूझ रहे हैं। बढ़ते कार्बन डाई आक्साइड के प्रभाव से सिर्फ प्रोटीन ही नहीं आयरन कमी की समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया एवं उत्तर अफ्रीका समेत दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की संभावनाएं हैं।</p>
<p>इसके कारण उनके भोजन में 3.8 प्रतिशत आयरन कम हो जाएगा। फिर एनीमिया से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी। प्रोटीन की कमी से कई तरह की बीमारियों का खतरा उत्पन हो गया है। अभी गत वर्ष ही इफको की रिपोर्ट में कहा गया कि कुपोषण की वजह से देश के लोगों का शरीर कई तरह की बीमारियों का घर बनता जा रहा है। कुछ इसी तरह की चिंता ग्लोबर हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भी जताया गया है। हालांकि यूनाइटेड नेशन के फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के कारण अब भारत में पिछले एक दशक में भूखमरी की समस्या में तेजी से कमी हुई है जिससे कुपोषण का संकट घटा है। यहां ध्यान देना होगा कि दुनिया भर में सालाना जितना अन्न की वैश्विक बर्बादी हो रही है उसकी कीमत तकरीबन 1000 अरब डॉलर है।</p>
<p>दुनिया भर में अन्न की बर्बादी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यदि कुल बर्बाद भोजन को 20 घनमीटर आयतन वाले किसी कंटेनर में एक के बाद एक करके रखें और ऊंचाई में बढ़ाते जाएं तो 1.6 अरब टन भोजन से चांद तक जाकर आया जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों में अन्न की बर्बादी के कारण 680 अरब डॉलर और विकासशील देशों में 310 अबर डॉलर का नुकसान हो रहा है। ध्यान देने वाली बात यह कि अमीर देश भोजन के सदुपयोग के मामले में सबसे ज्यादा संवेदनहीन और लापरवाह हैं। इन देशों में सालाना 22 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। जबकि उप सहारा अफ्रीका में सालाना कुल 23 करोड़ टन अनाज पैदा किया जाता है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की ही बात करें तो यहां जितना अन्न खाया जाता है उससे कहीं अधिक बर्बाद होता है। आंकड़ों के मुताबिक केवल खुदरा कारोबारियों और उपभोक्ताओं के स्तर पर अमेरिका में हर साल 6 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। उचित होगा कि विश्व समाज के अग्रणी देश दुनिया भर में भूख और कुपोषण से बेहाल लोगों की सुध लें। करोड़ों टन जो भोजन बर्बाद हो रहा है उसे जरुरतमंदों तक पहुंचाने की महती व्यवस्था सुनिश्चित करें।</p>
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		<title>Story of Durga Bhabhi : असाधारण साहस और राष्ट्रप्रेम की प्रतीक थीं दुर्गा भाभी</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/24941</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Oct 2025 09:05:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Durga Bhabhi]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<h3><strong><span style="color: #ff0000">प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जय तिलक</span></strong></h3>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-11283" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>बात उन दिनों की है जब भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को पकड़ने के लिए ब्रिटिश हुकूमत जमीन-आसमान एक कर दी थी। भगत सिंह और उनके साथियों पर पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या का आरोप था। वह साण्डर्स जिसने साइमन कमीशन का विरोध कर रहे लाला लाजपत राय को इस हद तक पीटा की चंद दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी। क्रांतिकारियों ने ठान लिया कि वे लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेकर रहेंगे। फिर क्या था चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगत सिंह, राजगुरु और जयगोपाल ने लाहौर में एक पुलिस स्टेशन के सामने ही साण्डर्स को गोलियों से उड़ा दिया। देश सोए से जाग उठा।</p>
<p>साण्डर्स की मौत के दूसरे दिन ही लाहौर शहर के दीवारों पर पोस्टर लग गए और पर्चे बांटे गए, जिनपर लिखा था कि साण्डर्स मारा गया और लालाजी की शहादत का बदला ले लिया गया। पर क्रांतिकारियों के समक्ष मौंजू सवाल यह था कि आखिर भगत सिंह को लाहौर से बाहर कैसे निकाला जाए। इसकी जिम्मेदारी दुर्गा देवी वोहरा जिन्हें दुर्गा भाभी भी कहा जाता है, ने अपने कंधो पर ली। उन्होंने कमाल की योजना बनायी। जिसके मुताबिक भगत सिंह ने अपना केश कटवायी और सिर पर हैट लगाकर अंग्रेजी दा बन गए। उनको इस नई वेशभूशा में देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह वही भगत सिंह हैं। दुर्गा भाभी ने बड़ी दिलेरी से भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी बनकर लाहौर से कलकत्ता तक की सफर की और ब्रिटिश खुफिया तंत्र को इसकी हवा तक न लगी।</p>
<p>दुर्गा भाभी के साथ उनकी गोद से चिपका हुआ उनका तीन वर्षीय बेटा शची भी था। कलकत्ता पहुंचने पर उनके पति भगवती चरण बोहरा ने उनकी बहादुरी की जमकर दाद दी। 7 अक्टुबर 1907 को इलाहाबाद में जन्मी दुर्गा भाभी बचपन से ही असाधारण प्रतिभा की धनी थी। उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी थी। युवा होने पर उनका विवाह महान क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा से हुआ। भगवती चरण वोहरा आजादी के उन नायकों में से एक हैं जिनके जीवन का उद्देश्य देश को आजादी दिलाना था। कहा जाता है कि उन्हें बम बनाने में महारत हासिल था। 28 मई, 1930 को रावी नदी के तट पर बम परीक्षण के दौरान वे षहीद हो गए। उस समय दुर्गा महज 27 साल की थी।</p>
<p>लेकिन इस कठिन घड़ी में भी उन्होंने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने मन में ठान लिया कि वे अपने पति की शहादत और उनके मिशन को बेकार नहीं जाने देंगी। सो उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ कदमताल मिलाना शुरु कर दिया। दुर्गा भाभी की बहादुरी के किस्से भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। कलकत्ता में रहते हुए उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी का ताना-बाना बुनना शुरु कर दिया। इसी दरम्यान 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने संसद भवन में बम विस्फोट कर गुंगी-बहरी ब्रिटिश सरकार को अंदर से हिला दिया। कहा जाता है कि इस घटना को मूर्त रुप देने में दुर्गा भाभी का महान योगदान था। भगत सिंह चाहते तो संसद भवन से फरार हो सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी गिरफ्तारी देना ज्यादा जरुरी समझा।</p>
<p>क्रांतिकारियों ने भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की जुगत बनायी और योजना पर काम करना शुरु कर दिया। रणनीति के मुताबिक भगत सिंह को जबरदस्ती जेल से छुड़ाने के लिए बम विस्फोट की योजना बनी। लेकिन ईश्वर के विधान में कुछ और ही बदा था। दुर्गा भाभी के पति भगवती चरण बोहरा जो बम बनाने में दक्ष थे, बम परीक्षण के दौरान ही शहीद हो गए। दुर्गा भाभी पर विपत्ति का पहाड़ टुट पड़ा। लेकिन उन्होंने अपने आंसूओं को थाम लिया। वे लाहौर जाकर भगत सिंह से मिली और फिर दिल्ली वापस आकर गांधी जी से। गांधी जी ने भाभी को सुझाव दिया कि वे अपने आपको पुलिस के हवाले कर दे। लेकिन दुर्गा भाभी का मकसद तो कुछ और ही था।</p>
<p>उन्होंने गांधी जी से अपील की कि जिस तरह आप अन्य राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए प्रयास कर रहे हैं, उसी तरह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की रिहाई के लिए भी वायसराय पर दबाव डालें। लेकिन गांधी जी को क्रांतिकारियों के हिंसा दर्शन में विश्वास नहीं था। सो उन्होंने दुर्गा भाभी को मना कर दिया। लेकिन दुर्गा भी दुर्गा ठहरी। वह भला हार कैसे मान सकती थी। 9 अक्टुबर, 1930 को उन्होंने मुंबई में लेमिंग्टन रोड पर पृथ्वी सिंह आजाद उर्फ नाना साहब और सुखदेव राज से मिलकर गवर्नर पर गोलियां चला दी। लाख सिर पटकने के बाद भी पुलिस का खुफिया तंत्र इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया कि इस कांड के पीछे किसका हाथ है।</p>
<p>पुलिस के हाथ सिर्फ यही सूत्र लगा कि गोली चलाने वालों में से एक लम्बे बाल वाला लड़का भी था। लेकिन एक षड़यंत्र के तहत दुर्गा भाभी को ब्रिटिश सरकार ने फरार घोषित कर दिया तकरीबन ढ़ाई वर्ष फरारी जीवन गुजारने के बाद उन्हें 12 सितंबर, 1931 को गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेज दिया गया। रिमाण्ड की 15 दिन की अवधि पूरा होने पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें रिहा तो कर दिया लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया। तकरीबन एक वर्ष तक वह नजरबंद रही। दिसंबर 1932 में वह रिहा की गयी। लेकिन उन्हें लाहौर की म्यूनिसिपल सीमा में तीन वर्ष तक नजरबंद रखा गया। 1935 ई0 में उन्हें पंजाब और दिल्ली की सीमा से बाहर जाने का आदेश दिया गया।</p>
<p>इस दरम्यान दुर्गा भाभी ने गाजियाबाद के एक स्कूल में बतौर शिक्षिका अध्यापन कार्य किया। 1937 में उन्हें दिल्ली प्रांतीय कमेटी का अध्यक्ष चुना गया। बाद में उन्होंने अपनी सदस्यता उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में स्थानांतरित करा ली। शिक्षा के प्रति उनका गहरा लगाव था। सो उन्होंने मद्रास के अड्यार में मांटेसरी शिक्षा पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त किया और जब वह 1940 में लखनऊ आयी तो कैण्ट रोड पर एक किराए के मकान में पांच बच्चों को लेकर ‘लखनऊ माण्टेसरी’ नामक एक शिक्षण संस्था की बुनियाद रखी। आज यह विद्यालय ‘लखनऊ माण्टेसरी इण्टर कालेज’ के नाम से जाना जाता है। दुर्गा भाभी इस विद्यालय को जीवन भर सींचा।</p>
<p>अब उनकी यादें भर शेष रह गयी हैं। आज से डेढ़ दशक पहले वह इस दुनिया से विदा हो चुकी हैं। आज भी देश उनकी असाधारण वीरता और राष्ट्रभक्ति पर गर्व करता है। हालांकि यह त्रासदी है कि आजादी के साढ़े सात दशक गुजर जाने के बाद भी दुर्गा भाभा के विचार और उनसे जुड़े दस्तावेज देश के आमजन तक नहीं पहुंच पाए हैं। नतीजा देश की युवा पीढ़ी उनके राष्ट्रवादी विचारों से पूरी तरह परिचित नहीं है। आज जरुरत है कि दुर्गा भाभी के विचार जन-जन तक पहुंचाया जाए। वैसे भी एक जिम्मेदार जनतांत्रिक राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह देश की आजादी के लिए मर मिटने वाले क्रांतिकारियों के स्मृति शेष को जीवित रखने के लिए अपनी आने वाली पीढ़ी को उनके इतिहास व विचारों से देश को सुपरिचित कराए।</p>
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		<title>Special on Vijayadashami : कर्तव्य और मर्यादा के आदर्श हैं श्रीराम</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/24876</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Oct 2025 11:49:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
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<h2><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक</strong></span></h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-11283 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>आज ही के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने असुरराज रावण का वध कर पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्त किया। प्रभु श्रीराम ने असुराज रावण को सत्य और धर्म के मार्ग पर लाने के लिए हरसंभव प्रयास किया। उसे समझाने के लिए अपने भक्त हनुमान और अंगद को उसके पास लंका भेजा। लेकिन दुष्ट स्वभाव वाले रावण को यह सब रास नहीं आया। स्वयं उसके भाई विभिषण ने माता सीता को प्रभु श्रीराम को सौंपने के लिए अनुनय-विनय किया। लेकिन रावण माता सीता को वापस करने के लिए तैयार नहीं हुआ। उल्टे उसने विभिषण को अपमानित कर लंका से निर्वासित कर दिया। विभिषण भगवान श्रीराम के शरणागत हुए।</p>
<p>फिर भगवान श्रीराम ने विभिषण को लंका का राज्य सौंपकर माता जानकी के साथ अयोध्या लौट आए। इन लीलाओं के जरिए भगवान श्रीराम ने एक पुत्र, पिता, पति, भाई और एक राजा के रुप में जगत को महान संदेश दिया कि एक आदर्श, निष्पक्ष और बंधुतापूर्ण आचरण के जरिए एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज का निर्माण किया जा सकता है। ऐसे विलक्षण आचरण के कारण ही संसार भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानता है। भगवान श्रीराम ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सत्य और मर्यादा का पालन करना नहीं छोड़ा। पिता का आदेश मान वन गए। मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता और यहां तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इसीलिए भगवान श्री राम को कर्तव्यपरायणता के कारण भारतीय सनातन परिवार का आदर्श प्रतिनिधि कहा जाता है।</p>
<p>राम रघुकुल में जन्में थे जिसकी परंपरा ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाई पर बचन न जाई’ की थी। इसीलिए पिता का वचन मानकर वे जंगल को गए। उन्होंने अपने पराक्रम से दण्डक वन को राछस विहिन किया और साधु-संतों की सेवा की। उन्होंने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार किया तथा पराई स्त्री पर कुदृष्टि रखने वाले बालि का संघार कर संसार को स्त्रियों के प्रति संवेदनशील होने की सीख दी। जंगल में रहने वाली शबरी माता को नवधा भक्ति का ज्ञान दिया। उन्होंने नवधा भक्ति के जरिए दुनिया को अपनी महिमा से सुपरिचित कराया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुझे वहीं प्रिय हैं जो संतों का संग करते हैं। मेरी कथा का रसपान करते हैं। जो इंद्रियों का निग्रह, शील, बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहते हैं। जगत को समभाव से मुझमें देखते हैं और संतों को मुझसे भी अधिक प्रिय समझते हैं।</p>
<p>उन्होंने शबरी को यह भी समझाया कि मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरुप को प्राप्त हो जाता है। भगवान श्रीराम सभी प्राणियों के लिए संवेदनशील थे। उन्होंने पंपापुर के वन्य जातियों को स्नेह से सीचिंत कर अपना मित्र बनाया। भगवान श्रीराम और वानरराज सुग्रीव की मित्रता आदर्श मित्रता का अनुपम उदाहरण है। पवनपुत्र हनुमान भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। उन्होंने कहा है कि-कुलीन न होते हुए भी भगवान श्रीराम ने मुझ जैसे सभी गुणों से हीन जीव को अपनाया। अधम प्राणी जटायु को पिता तुल्य स्नेह प्रदान कर जीव से जंतुओं के प्रति मानवीय आचरण को भलीभांति निरुपित किया। समुद्र पर सेतु बांधकर वैज्ञानिकता और तकनीकी का अनुपम मिसाल कायम की।</p>
<p>उन्होंने समुद्र के अनुनय-विनय पर निकट बसे खलमंडली का संघार किया। पत्नी सीता के हरण के बाद भी अपना धैर्य नहीं खोया। भगवान श्रीराम राजीव नयन धरें धनु सायक और भगत बिपति भंजन सुखदायक हैं। भक्तों के दुखों को हरने वाले राजीव नयन श्रीराम को शत-शत प्रणाम। भारत भूमि पर आई हर विपत्ति को हरने वाले दुखहरन प्रभु श्रीराम विष्णु के सातवें अवतार हैं। वाल्मीकि कृत रामायण और तुलसीकृत रामचरितमानस में भगवान श्रीराम की महिमा और उनके आदर्शों का खूब गुणगान किया गया है। उनके उपदेशों और आचरण को जगतकल्याण का मार्ग बताया गया है। वे दुष्टों के संधारक और संतों के रक्षक हैं।</p>
<p>श्री रामचरितमानस में उनके जन्म के बारे में कहा गया है कि-‘नौमि तिथि मधुमास पुनीता, शुकल पच्छ अभिजीत हरिप्रीता। मध्यदिवस अति सीत न घामा, पावन काल लोक विश्रामा।’ अर्थात पवित्र चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के नवमी तिथि के पावन दिन भगवान श्रीराम का अयोध्या में पा्रकट्य हुआ। उनके प्रकट होते ही निर्मल आकाश देवताओं के समूहों से भर गया और गन्धर्वों का दल भगवान के गुणों का गान करने लगा। आकाश में घमाघम नगाड़े बजने लगे और नाग, मुनि और देवता भगवान की स्तुति और आराधना में लग गए। महान संत तुलसीदास रचित रामचरितमानस में उद्घृत है कि ‘बिप्र धेनु सुर संत हित लिन्ह मनुज अवतार, निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।’ यानी पृथ्वी पर प्रभु श्रीराम का अवतार ब्राहमण, गौ, देवता, संतों और दीनजनों के कल्याण के लिए हुआ। उन्होंने दुष्टों का संघार कर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की और लोकमंगल के कार्य किए।</p>
<p>हिंदू सनातन शास्त्रों में भगवान श्रीराम को साक्षात परब्रह्म और ईश्वर कहा गया है। संसार के समस्त पदार्थों के बीज उनमें ही निहित है और वे संसार के सूत्रधार हैं। उन्हें वैदिक सनातन धर्म की आत्मा और परमात्मा कहा गया है। भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर मानव जाति को संदेश दिया कि सत्य और धर्म के मार्ग का अनुसरण कर जगत को आसुरी शक्तियों से मुक्त किया जा सकता है। सत्य के पर्याय भगवान श्रीराम सद्गुणों के भंडार हैं। इसीलिए भारतीय जनमानस उनके जीवन पद्धति को अपना उच्चतर आदर्श और पुनीत मार्ग मानता है। शास्त्रों में उद्घृत है कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ता है तब-तब भगवान धरा पर अवतरित होकर एवं मनुष्य रुप धारण कर दुष्टों का संघार करते हैं। भगवान श्री राम का जीवनकाल एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रुप में लिखा गया है।</p>
<p>महान संत तुलसीदास ने भी भगवान श्रीराम पर भक्ति काव्य रामचरितमानस की रचना की है जो केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों की कई भाषाओं में अनुदित है। संत तुलसीदास ने भगवान श्रीराम की महिमा का गान करते हुए कहा है कि भगवान श्रीराम भक्तों के मनरुपी वन में बसने वाले काम, क्रोध, और कलियुग के पापरुपी हाथियों के मारने के लिए सिंह के बच्चे सदृश हैं। वे शिवजी के परम पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं। दरिद्रता रुपी दावानल के बुझाने के लिए कामना पूर्ण करने वाले मेघ हैं। वे संपूर्ण पुण्यों के फल महान भोगों के समान हैं। जगत का छलरहित हित करने में साधु-संतो के समान हैं। सेवकों के मन रुपी मानसरोवर के लिए हंस के समान और पवित्र करने में गंगा जी की तरंगमालाओं के समान हैं।</p>
<p>श्रीराम के गुणों के समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दंभ और पाखंड के जलाने के लिए वैसे ही हैं जैसे ईंधन के लिए प्रचण्ड अग्नि होती है। श्रीराम पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणों के समान सबको शीतलता और सुख देने वाले हैं। श्रीराम क्षमा, दया और दम लताओं के मंडप हैं। संसार भी भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानता है। वे एक आदर्श भाई, आदर्श स्वामी और प्रजा के लिए नीति कुशल व न्यायप्रिय राजा हैं। भगवान श्रीराम का रामराज्य जगत प्रसिद्ध है। हिंदू सनातन संस्कृति में भगवान श्रीराम द्वारा किया गया आदर्श शासन ही रामराज्य के नाम से प्रसिद्ध है। रामचरित मानस में तुलसीदास ने रामराज्य पर भरपूर प्रकाश डाला है।</p>
<p>उन्होंने लिखा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सिंहासन पर आसीन होते ही सर्वत्र हर्ष व्याप्त हो गया। समस्त भय और शोक दूर हो गए। लोगों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गयी। रामराज्य में कोई भी अल्पमृत्यु और रोगपीड़ा से ग्रस्त नहीं था। सभी जन स्वस्थ, गुणी, बुद्धिमान, साक्षर, ज्ञानी और कृतज्ञ थे। वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग में स्वयं भरत जी भी रामराज्य के विलक्षण प्रभाव की बखान करते हैं। गौर करें तो वैश्विक स्तर पर रामराज्य की स्थापना गांधी जी की भी चाह थी। गांधी जी ने भारत में अंग्रेजी शासन से मुक्ति के बाद ग्राम स्वराज के रुप में रामराज्य की कल्पना की थी। आज भी शासन की विधा के तौर पर रामराज्य को ही संसार का सर्वश्रेष्ठ शासन माना जाता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>Durga Puja : &#8220;रामकृष्ण मठ निराला नगर में छः दिवसीय दुर्गा पूजनोत्सव का शुभारंभ&#8221;</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/24848</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Sep 2025 16:49:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्‍तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[लखनऊ]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Durga Puja]]></category>
		<category><![CDATA[छः दिवसीय]]></category>
		<category><![CDATA[दुर्गा पूजनोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[निराला नगर]]></category>
		<category><![CDATA[रामकृष्ण मठ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; &#160; रिपोर्ट- अमित चावला  लखनऊ, उप्र। रामकृष्ण मठ निराला नगर प्राचीन परमपरा के अन्तर्गत...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
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<h3><strong><span style="color: #ff0000">रिपोर्ट- अमित चावला</span></strong></h3>
<h3><strong> लखनऊ, उप्र।</strong></h3>
<p>रामकृष्ण मठ निराला नगर प्राचीन परमपरा के अन्तर्गत अपने वृहद प्रांगण में छः दिवसीय श्री श्री दुर्गा पूजनोत्सव का आयोजन 27 सितम्बर से 02 अक्टूबर तक पारम्परिक धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार मना रहा है .इस पूजनोत्सव के उद्घाटन के प्रथम दिन सुबह 4.30 बजे मंगल आरती के पश्चात स्वामी मुक्तिनाथानंन्द महाराज द्वारा एक धार्मिक प्रवचन दिया गया.शाम 6ः30 बजे से बोधन का आयोजन किया गया.</p>
<p>बोधन एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें देवता का स्वागत समारोह या यू कहे कि एक तरह से देवी की प्रतिमा में उनका आहवाह्न करने की क्रिया होती है जिसमे देवी दुर्गा अपने पूरे परिवार जिसमें उनकी दो बेटियां, देवी लक्ष्मी और सरस्वती, क्रमशः धन और ज्ञान की देवी, साथ ही साथ उनके दो बेटे गणेश और कार्तिक सफलता और शक्ति के देवता हैं.पंचमी की संध्या पर देवी जी का बोधन (आवाहन) नौ प्रकार के पौधों से किया गया यथा : केला, काला घुईयॉ, हल्दी, जयन्ती, मन घुईयॉ, अशोक, धान, अनार एवं बेल इत्यादि.</p>
<p>बोधन का पूजन रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, मायलापुर, चेन्नई के स्वामी सत्यविदानन्दकी देखरेख में तथा रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन, सिकरा-कुलिग्रम के ब्रह्मचारी हीमाद्री द्वारा पूजा की गई. जिसमें सपरिवार देवी दूर्गा को अनुष्ठानिक स्वागत हुआ.पूजा के प्रांगण में अनेक श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित थे.</p>
<p>रामकृष्ण मठ, लखनऊ के सन्यासी एवं भक्तों द्वारा प्राचीन परम्परा के अनुसार आगमणि गीत समूह में रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द के नेतृत्व में रामकृष्ण मठ, लखनऊ के सन्यासीवृन्द व ब्रह्मचारियों द्वारा प्रस्तुति दी गयी. देवी की सजावट व पुष्पाहार आदि कलकत्ता से आए भक्तों ने किया.देवी पूजा के साथ-साथ पूजा के अधिष्ठातृ देवता श्री श्री नारायण को शालीग्राम शिला के माध्यम से आराधना किया गया.पूजा के उपरान्त उपस्थित भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया.</p>
<p>28 सितम्बर को सुबह 6ः15 बजे षष्ठी पूजा आध्यात्मिक निषेधाज्ञा के अनुसार शुरू होगी और षष्ठ्यादि कल्पारम्भ पूजा, चण्डी (चण्डी पाठ), आमन्त्रण एवं अधिवास एवं आगमणि गीत गायन हुआ.</p>
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		<title>Bhagat Singh&#8217;s Birth Anniversary : भारत राष्ट्र के क्रांतिनायक भगत सिंह</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/24845</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Sep 2025 05:48:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Anniversary]]></category>
		<category><![CDATA[Bhagat Singh's]]></category>
		<category><![CDATA[Birth]]></category>
		<category><![CDATA[क्रांतिनायक]]></category>
		<category><![CDATA[भगत सिंह]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्र]]></category>
		<category><![CDATA[शहीद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक युवाओं के क्रांतिनायक भगत सिंह के जीवन की अनेक ऐसी बातें...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h2><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक</strong></span></h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-11283 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>युवाओं के क्रांतिनायक भगत सिंह के जीवन की अनेक ऐसी बातें हैं जो देश के युवाओं को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा से भर देती है। 23 वर्ष की उम्र में ही भगत सिंह ने अपने लेखन और राष्ट्रभक्ति के बरक्स एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया जिससे दशकों तक भारत की युवा पीढ़ी प्रेरणा लेती रहेगी। भगत सिंह ने अपनी गरिमामय शहादत और आंदोलित विचारों से देश-दुनिया को संदेश दिया कि क्रांतिकारी आंदोलन के पीछे उनका मकसद अंध राष्ट्रवाद नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना थी। हालांकि यह त्रासदी है कि आजादी के चार दशक बाद तक भगत सिंह के विचार और उनसे जुड़े दस्तावेज देश के आमजन तक नहीं पहुंच पाए और देश की युवा पीढ़ी उनके आंदोलित व राष्ट्रवादी विचारों से अपरिचित रही।</p>
<p>भगत सिंह के विचारों और क्रांतिकारिता को समझने के लिए जेल के दिनों में उनके लिखे खतों और लेखों को पढ़ना-समझना आवश्यक है। उन खतों और लेखों के माध्यम से समझा जा सकता है कि भगत सिंह रक्तपात के कतई पक्षधर नहीं थे। वे और उनके साथियों ने पुलिस सुपरिटेण्डेंट स्कॉट को निशाना तब बनाया जब 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों पर ब्रिटिश हुकुमत ने लाठियां बरसायी जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हुए और अंततः मृत्यु को प्राप्त हुए। भगत सिंह समाजवाद और मानववाद के पोषक थे और इसी कारण उन्होंने ब्रिटिश हुकुमत की भारतीयों के प्रति शोषण की नीति का विरोध किया।</p>
<p>भारतीयों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध लाजिमी था ठीक उसी तरह जिस तरह एक महान देशभक्त का होता है। भगत सिंह कतई नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश संसद से मजदूर विरोधी नीतियां पारित हो। उनकी सोच थी कि अंग्रेजों को पता चलना चाहिए कि हिंदुस्तानी जाग चुके हैं और वे अधिक दिनों तक गुलामी के चंगुल में नहीं रह सकते। उन्होंने अपने विचारों से अंग्रेजों को यह बात समझानी चाही लेकिन अंग्रेज समझने को तैयार नहीं थे। तब उन्होंने अपनी बात उन तक पहुंचाने के लिए 8 अप्रैल, 1929 को अपने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त से मिलकर ब्रिटिश सरकार की केंद्रीय असेंबली में बम फेंका। उन्होंने यह बम खाली स्थान पर फेंका ताकि किसी को नुकसान न पहुंचे। बम फेंकने के बाद उन्होंने इंकलाब-जिंदाबाद के नारे लगाए और पर्चे फेंके। बम फेंकने का मकसद खून-खराबा करना नहीं था।</p>
<p>उन्होंने कहा भी कि ‘यदि बहरों को सुनना है तो आवाज को बहुत जोरदार होना होगा, जब हमने बम गिराया तो हमारा ध्येय किसी को मारना नहीं था, हमने अंग्रेजी हुकुमत पर बम गिराया था, अंग्रेजों को भारत छोड़ना चाहिए और उसे आजाद करना चाहिए।’ उल्लेखनीय तथ्य यह कि बम गिराने के बाद वे चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने भागना स्वीकार नहीं किया। बल्कि बहादुरी से गिरफ्तारी दी। सच कहें तो भगत सिंह ने यह साहस दिखाकर अंग्रेजों को समझा दिया कि एक हिंदुस्तानी क्या-क्या कर सकता है। उनका यह साहस दर्शाता है कि वे शांति के पैरोकार थे और हिंसा में उनका विश्वास रंचमात्र भी नहीं था। उन्होंने अपनी क्रांतिकारिता को रेखांकित करते हुए कहा भी है कि ‘जरुरी नहीं था कि क्रांति में अभिशप्त संघर्ष शामिल हो। यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं था।’</p>
<p>भगत सिंह का अहिंसा में कितना अधिक विश्वास था वह इसी से समझा जा सकता है कि एक स्थान पर उन्होंने कहा कि ‘अहिंसा को आत्मबल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमें अंततः प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है, लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाए? तभी हमें आत्मबल को शारीरिक बल से जोड़ने की जरुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रुर दुश्मन के रहमोंकरम पर ना निर्भर करें।’ क्या ऐसे विचार वाले एक महान क्रांतिकारी को हिंसावादी कहना उचित होगा? कतई नहीं। ध्यान देना होगा कि 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तो भगत सिंह का खून खौल उठा था। लेकिन उन्होंने हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के बजाए महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदालन का समर्थन किया।</p>
<p>जेल में भगत सिंह ने बहुत यातनाएं सही। न तो उन्हें अच्छा खाना दिया जाता था और न ही पहनने को साफ-सुथरे कपड़े दिए जाते थे। उन्हें बुरी तरह पीटा जाता था और गालियां दी जाती थी। लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने जेल में रहते हुए ही अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया। भगत सिंह की जनमानस में व्याप्त लोकप्रियता से अंग्रेज इस कदर डरे हुए थे कि 24 मार्च, 1931 को उन्हें फांसी पर लटकाने के बाद उनके मृत शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिए। उन्हें भय था कि अगर उनके मृत शरीर को उनके परिजनों को सौंपा गया तो देश में क्रांति की ज्चाला भड़क उठेगी जिसे संभालना मुश्किल होगा। भगत सिंह ने क्रांति के बारे में स्पष्ट कहा है कि ‘किसी को क्रांति शब्द की व्याख्या शाब्दिक अर्थ में नहीं करनी चाहिए, जो लोग इस शब्द का उपयोग या दुरुपयोग करते हैं उनके फायदे के हिसाब से इसे अलग-अलग अर्थ और अभिप्राय दिए जाते हैं।’</p>
<p>बिडंबना यह है कि भगत सिंह को कुछ इसी तरह के फ्रेम में फिट कर उनके क्रांतिकारी विचारों की व्याख्या की गयी है जो एक किस्म से उनकी अहिंसक विचारधारा के साथ छल है। बिडंबना यह भी कि इतिहास के पन्नों में भी उनके जीवन और बलिदान को सही रुप में दिखाने के बजाए विकृत करने की कोशिश की गयी। उदाहरण के तौर पर देश के जाने-माने इतिहासकार विपिन चंद्रा और मृदुला मुखर्जी की किताब में शहीद भगत सिंह को कथित रुप से क्रांतिकारी आतंकवादी के तौर पर उद्घृत किया गया है। यह न सिर्फ एक महान क्रांतिकारी का अपमान भर है बल्कि विकृत इतिहास लेखन की परंपरा का एक शर्मनाक बानगी भी है। विकृत इतिहास लेखन की ऐसी शरारतपूर्ण बानगियां इतिहास में और भी दर्ज हैं जिससे भारतीय इतिहास के नायकों की छवि धूमिल हुई है। महान लेखक और राजनीतिज्ञ सिसरो ने इतिहास के बारे में कहा था कि इतिहास समय के व्यतीत होने का साक्षी होता है।</p>
<p>वह वास्तविकताओं को रोशन करता है और स्मृतियों को जिंदा रखता है। देश जानना चाहता है कि औपनिवेशिक गुलामी और शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह किस तरह क्रांतिकारी आतंकवादी थे और इतिहास का यह विकृतिकरण किस तरह विद्यार्थियों के लिए पठनीय है। कोई भी इतिहासकार या विचारक अपने युग की उपज होता है। उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी लेखनी से कालखंड की सच्चाई का ईमानदारी से दुनिया के सामने रखे। राष्ट्र को सुपरिचित कराए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण कि अंग्रेज और मार्क्सवादी इतिहासकार भारतीय इतिहास लेखन की मूल चेतना को समझ नहीं सके और भारतीय इतिहास के सच की हत्या कर दी।</p>
<p>अगर भारतीय इतिहास को भारतीय चेतना व मानस के प्रकाश में लिखा गया होता तो आज भगत सिंह को क्रांतिकारी आतंकवादी या शिवाजी को पहाड़ी चूहिया अथवा चंद्रगुप्त मौर्य की सेना को डाकुओं का गिरोह नहीं कहा जाता। विलियम कैरे, अलेक्जेंडर डफ, जॉन मुअर, और चार्ल्स ग्रांट जैसे इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिंदू धर्म को पाखंड और झूठ का पर्याय कहा। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के जनक और ईसाई धर्म को बढ़ावा देने वाले मैकाले ने तो यहां तक कहा कि भारत और अरब के संपूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपिय पुस्तकालय की एक आलमारी ही काफी है।</p>
<p>1834 में भारत के शिक्षा प्रमुख बने लार्ड मैकाले ने भारतीयों को शिक्षा देने के लिए बनायी अपनी नीति के संदर्भ में अपने पिता को एक पत्र लिखा जिसमें कहा कि मेरी बनायी शिक्षा पद्धति से भारत में यदि शिक्षा क्रम चलता रहा तो आगामी 30 वर्षों में एक भी आस्थावान हिंदू नहीं बचेगा। या तो वे ईसाई बन जाएंगे या नाम मात्र के हिंदू रह जाएंगे। समझा जा सकता है कि इतिहास लेखन की आड़ में अंग्रेजी इतिहासकारों और उनसे प्रभावित भारतीय इतिहासकारों के मन में क्या था।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>नोट &#8211; लेखक एक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं।</strong></p>
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		<title>HINDI DAY : वैश्विक क्षितिज पर हिन्दी का परचम</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/24704</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Sep 2025 06:27:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Day]]></category>
		<category><![CDATA[क्षितिज]]></category>
		<category><![CDATA[परचम]]></category>
		<category><![CDATA[मातृभाषा]]></category>
		<category><![CDATA[वैश्विक]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी दिवस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक किसी भी राष्ट्र की जीवंतता और पहचान उसकी भाषा और...</p>
<p>The post <a href="https://www.lokdastak.com/archives/24704">HINDI DAY : वैश्विक क्षितिज पर हिन्दी का परचम</a> appeared first on <a href="https://www.lokdastak.com">Lok Dastak</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<h3><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक</strong></span></h3>
<p>किसी भी राष्ट्र की जीवंतता और पहचान उसकी भाषा और संस्कृति है। इसके बिना राष्ट्र रुपी शरीर का अस्तित्व, चिंतन और दर्शन सभी कुछ बेमानी है। राष्ट्र के नागरिक निज भाषा से संस्कारित होकर ही अपने मूल्यों, विचारों, आदर्शों और प्रतिमानों को जीते हैं। कहा भी जाता है कि राष्ट्र के विचारों को गढ़ने-बुनने, संजोने-संवारने और उसे प्राणवान बनाने में भाषा की अहम भूमिका होती है। हिन्दी भाषा उन्हीं भाषाओं में से एक है जो भारत की कालजयी सभ्यता-संस्कृति, आचार-विचार, विज्ञान-दर्शन और इतिहास को आलोकित-प्रकाशित करती है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जहां एक ओर भाषाएं दम तोड़ रही हैं वहीं हिन्दी भाषा अपनी स्वीकार्यता और प्रासंगिकता का लोहा मनवा रही है। आज समूचे विश्व में हिन्दी भाषा की गूंज है।</p>
<p>विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दी भाषा का सम्मान बढ़ रहा है। नतीजा, आज हिन्दी भाषा न सिर्फ भारत राष्ट्र की भाषा भर है बल्कि समूचे विश्व के लोगों के सांस्कृतिक जुड़ाव, विचारों के आदान-प्रदान और विकास का जरिया बन रही है। आंकडों के लिहाज से देखें तो दुनिया भर में तकरीबन 61.5 करोड़ लोग हिन्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। इथोनोलॉज के आंकड़ों के मुताबिक अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 113 करोड़ और चीनी भाषा मंडारिन की संख्या 112 करोड़ है। लेकिन जिस गति से हिन्दी भाषा की स्वीकार्यता व लोकप्रियता आसमान छू रही है उससे साफ है कि आने वाले दिनों में हिन्दी भाषा अंग्रेजी और मंडारिन भाषा को पछाड़कर शीर्ष स्थान पर विराजमान हो जाएगी।</p>
<p>वैश्विक स्तर पर यूजर्स के लिहाज से 1952 में हिन्दी भाषा पांचवे पायदान पर थी जो 1980 के दशक में चीनी और अंग्रेजी भाषा के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच गयी। लेकिन विगत दशकों में विकासशील भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक आर्थिक-व्यापारिक आकर्षण ने सभी के लिए हिन्दी भाषा को बोलने-समझने की अनिवार्यता सुनिश्चित कर दी। गौर करें तो एक भाषा के तौर पर हिन्दी का जितना अधिक अंतर्राष्ट्रीय विकास हुआ है, विश्व में शायद ही किसी अन्य भाषा का उतना हुआ हो। वे सभी संस्थाएं, सरकारी मशीनरी और छोटे-बड़े समूह बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हिन्दी को इस ऊंचाई पर पहुंचाया है।</p>
<p>1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर बैठक में टोकियो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होजुमि तनाका द्वारा पेश नए भाषायी आंकड़ों के मुताबिक अब चीनी भाषा के बाद हिन्दी का स्थान है। यानि अंग्रेजी भाषा पीछे छूट गयी है। गौर करें तो आज दुनिया के तकरीबन 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई हो रही है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में हिन्दी की धूम मची है। यहां 30 से अधिक विश्वविद्यालयों में भाषायी पाठ्यक्रम में हिन्दी को महत्वपूर्ण दर्जा हासिल है। अमेरिका के अलावा यूरोपिय देशों में भी हिन्दी का तेजी से विकास हो रहा है। इंग्लैण्ड के लंदन, कैम्ब्रिज और यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी को चाहने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। जर्मनी के हीडलबर्ग, लोअर सेक्सोनी के लाइपजिंग, बर्लिन के हम्बोलडिट और बॉन विश्वविद्यालय में भी हिन्दी भाषा को पाठ्यक्रम के रुप में शामिल किया गया है।</p>
<p>एक दशक से रुस के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य पर शोध हो रहे हैं। यहां हिंदी का बोलबाला बढ़ा है। हिन्दी का जलवा सिर्फ जर्मनी ही नहीं बल्कि रुस में भी कायम है। विगत दशकों में अनेक रुसी विद्वानों ने हिंदी साहित्य का अनुवाद किया है। इनमें से एक तुलसीकृत रामचरित मानस भी है जिसका अनुवाद प्रसिद्ध विद्वान वारान्निकोव द्वारा किया गया है। मॉस्को राजकीय विश्वविद्यालय और कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में एक अलग पूर्वी भाषाओं के विभाग को बनाया गया है जहां पर हिन्दी की शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। रुसी कवियों ने सबसे पहले जिस भारतीय कवि की रचनाओं का अनुवाद किया, वे कालिदास हैं।</p>
<p>प्रसिद्ध रुसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन के पूर्ववर्ती कवि वसीली झुकोवस्की ने सबसे पहले कालिदास की रचना ‘नल और दमयंती’ का रुसी भाषा में अनुवाद किया। उनके बाद कालिदास की रचना ‘शकुंतला’ का अनुवाद कंस्तांतिन बालमंत ने किया। हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता का ही आलम है कि वेस्टइंडीज के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठ की स्थापना की गयी है। एशियाई देश जापान में हिन्दी भाषा का बहुत अधिक सम्मान है। प्रोफेसर दोई ने टोकियो विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना की है। रुस की तरह जापान में भी हिन्दी साहित्य का अनुवाद हुआ है। प्रोफेसर तोबियोतनाका ने भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का जापानी भाषा में अनुवाद किया है। प्रोफेसर कोगा ने ‘जापानी-हिन्दी कोष’ की रचना की है।</p>
<p>उन्होंने गांधी जी की आत्मकथा का भी जापानी में अनुवाद किया है। प्रोफेसर मोजोकामी हर वर्ष हिन्दी का एक नाटक तैयार करते हैं और उसका मंचन भारत में करते हैं। गुयाना और मॉरिशस में भी हिन्दी भाषा को लेकर जबरदस्त उत्साह है। दरअसल यहां भारतीय मूल के लोगों की संख्या सर्वाधिक है। यहां प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातक स्तर पर हिन्दी के पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था है। मॉरिशस में अंग्रेजी राजभाषा है। फ्रेंच बोलने वालों की तादाद भी बहुत अच्छी है। लेकिन हिन्दी की लोकप्रियता में तनिक भी कमी नहीं है। यहां बहुत पहले हिन्दी सचिवालय की स्थापना हो चुकी है। आज ढेरों हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है।</p>
<p>मॉरिशस में भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या कुल आबादी की आधे से अधिक है। लिहाजा यहां हिन्दी का एक सशक्त भाषा के रुप में स्थापित होना लाजिमी है। यहां हिन्दी भाषा में खूब पत्र-पत्रिकाओं तथा साहित्य का प्रकाशन हो रहा है। मॉरिशस की तरह फिजी, नेपाल, भूटान, मालदीव और श्रीलंका में भी हिन्दी का जलवा कायम है। फिजी में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा हिन्दी है। इसे फिजियन हिन्दी या फिजियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। यह फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। नेपाल में भी हिन्दी बोलने व समझने वाले लोगों की तादाद अच्छी है। नेपाल में भारतीय टेलिविजन और सिनेमा अति लोकप्रिय है जिसके कारण हिन्दी बोलने-समझने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है।</p>
<p>इसी तरह खाड़ी देशों में भी हिन्दी का तेजी से प्रचार-प्रसार हर रहा है। यहां के सोशल मीडिया में भी हिन्दी का दखल बढ़ा है। आज कई पत्र-पत्रिकाओं को ऑनलाइन पढ़ा जा रहा है। संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दी एफएम चैनल लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। नए-पुराने हिन्दी गीतों को चाव से सुना जा रहा है। हिन्दी फिल्मों ने भी यहां धूम मचा रखी है। पिछले कुछ वर्षों से दुबई में लगातार हिन्दी कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है जो अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है। हिन्दी भाषा की यह असाधारण उपलब्धि कही जाएगी कि जिन देशों में भाषा को विचारों की पोषाक और राष्ट्र का जीवन समझा जाता है वहां भी हिन्दी तेजी से अपना पांव पसार रही है।</p>
<p>हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया स्विटजरलैंड, स्वीडन, फ्रांस, नार्वे, जापान, इटली, मिस्र, कजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, कतर और अफगानिस्तान, रुस और जर्मनी अपनी भाषा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। वे इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इन दशों में हिन्दी को भरपूर स्नेह और सम्मान मिल रहा है। यह हिन्दी भाषा के लिए बड़ी उपलब्धि है। आज दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं जहां भारतीयों की उपस्थिति न हो और वहां हिन्दी का तेजी विस्तार न हो रहा हो। एक आंकड़ें के मुताबिक दुनिया भर में ढ़ाई करोड़ से अधिक अप्रवासी भारतीय 160 से अधिक देशों में रहते हैं। यह सुखद है कि वह अपनी भाषा व संस्कृति से जुड़े हैं और हिन्दी के फैलाव में योगदान कर रहे हैं।</p>
<p>गौर करें तो बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियां भी अपने-अपने देशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारों पर दबाव बना रही हैं। दरअसल उनका मकसद हिन्दी के जरिए एशियाई देशों में अपनी व्यपारिक गतिविधियों को बढ़ाना है। यह स्वीकारने में हिचक नहीं कि बाजार ने भी हिन्दी की स्वीकार्यता को नई उंचाई दी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की चमक प्रमाणित करती है कि संसार में उसकी प्रतिष्ठा और उपादेयता बढ़ी है। वह तेजी से वैश्विक भाषा बन रही है।</p>
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<p><span style="color: #993366"><strong>नोट &#8211; लेखक एक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं </strong></span></p>
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		<title>Death Anniversary of Avaidyanath : श्री राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ जी का योगदान</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Sep 2025 15:34:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Avaidyanath]]></category>
		<category><![CDATA[Death Anniversary]]></category>
		<category><![CDATA[अवैद्यनाथ]]></category>
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		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक आज गोरक्षनाथ पीठ के महंत और भगवान श्री राम मंदिर...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<h3><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति &#8211; अरविन्द जयतिलक</strong></span></h3>
<p>आज गोरक्षनाथ पीठ के महंत और भगवान श्री राम मंदिर आंदोलन के सूत्रधार अवैद्यनाथ जी की पुण्ंयतिथि है। समाज और राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान कालजयी है। कालखंड पर नजर दौड़ाएं तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ और उनके भी गुरु महंत दिग्विजय नाथ मंदिर आंदोलन के सूत्रधारों और प्रणेताओं में प्रमुख रहे हैं। ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ के गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की अगुवाई में ही आजादी से पहले गोरक्षपीठ मठ के जरिए राजन्मभूमि आंदोलन को धार दी गयी। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की अगुवाई में ही 1934 से 1949 तक राम जन्मभूमि आंदोलन चला। उनके नेतृत्व में 22 दिसंबर, 1949 को विवादित ढांचे के भीतर भगवानी श्रीरामलला की प्रतिमा रखी गयी।</p>
<p>गौर करें तो जब विवादित ढांचे में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का प्रकटीकरण हुआ उस समय महंत दिग्विजय नाथ गोरखनाथ मंदिर में संत समाज के साथ एक संकीर्तन में भाग ले रहे थे। भगवान श्रीराम के प्राक्टय के बाद मूर्ति न हटने देने में जहां महंत दिग्विजय नाथ ने कालजयी भूमिका निभायी वहीं उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ ने गोरक्षपीठाधीश्वर रहते हुए गोरक्षनाथ पीठ को मंदिर आंदोलन का केंद्र बना दिया। यह तथ्य है कि महंत दिग्विजय नाथ और उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ ने विवादित ढांचे को मंदिर में बदलने की कल्पना को आकार दिया। उल्लेखनीय है कि उस समय हिंदू महासभा के वीडी सावरकर के साथ दिग्विजयनाथ ही थे जिनके हाथ में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की कमान थी। हिंदू महासभा के सदस्यों ने तब अयोध्या में इस पुनीत काम को अंजाम दिया उस समय दोनों लोग अखिल भारतीय रामायण महसभा के सदस्य थे।</p>
<p>ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ का 1969 में निधन के बाद उनके शिष्य ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ ने आंदोलन को धार दी और वे आजीवन श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष रहे। कहा जाता है कि हिमालय और कैलाश मानसरोवर की यात्रा और साधना से गहरे प्रभावित श्री महंत जी पहली बार 1940 में गोरक्षनाथ पीठ के महंत दिग्विजय नाथ से मिले और 8 फरवरी, 1942 को महज 23 साल की अवस्था में गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बन गए। वे अपने गुरु महंत दिग्विजय नाथ की ही तरह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में जुट गए। इतिहस गवाह है कि वे 1983-84 से शुरु राम जन्मभूमि आंदोलन के शीर्ष नेतृत्वकर्ताओं में से एक थे। वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष के अलावा राम जन्मभूमि न्यास समिति के भी अध्यक्ष थे। 80 और 90 के दशक में अशोक सिंहल, महंत रामचंद्र परमहंस और महंत अवैद्यनाथ की तिकड़ी जो आंदोलन की रणनीतिकार और सूत्रधार बनकर उभरी उसका खाका गोरक्षनाथ पीठ में ही खींची गयी। उस दौरान मंदिर आंदोलन को लेकर होने वाली सभी बैठकें गोरक्षनाथ पीठ में ही हुआ करती थी। उन दिनों महंत अवैद्यनाथ हिंदू महासभा में थे।</p>
<p>1989 का चुनाव भी उन्होंने रामजन्म भूमि के मुद्दे पर हिंदू महासभा से लड़ा और विजयी हुए। 1986 में जब फैजाबाद के जिलाधिकारी ने हिंदुओं को पूजा करने के लिए विवादित ढांचा खोलने का आदेश दिया, उस दरम्यान महंत अवैद्यनाथ वहां मौजुद थे। योग और दर्शन के मर्मज्ञ महंत अवैद्यनाथ के राजनीति में आने का उद्देश्य ही भगवान श्रीराम के उदात्त चरित्र के जरिए हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुराईयों को दूर करना और राम मंदिर आंदोलन को गति व उर्जा देना था। हिंदू धर्म में व्याप्त भेदभाव को दूर करने के लिए उन्होंने लगातार सहभोज का आयोजन किया। इसके लिए उन्होंने बनारस में डोमराज के यहां जाकर भोजन कर समाज की एकजुटता का संदेश दिया। 19 फरवरी, 1981 को मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण की घटना के बाद उन्होंने देश भर में सामाजिक समरसता का अभियान चलाया।</p>
<p>महंत अवैद्यनाथ का दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस से भी बेहद घनिष्ठ संबंध था। महंत रामचंद्र परमहंस राम जन्मभूमि न्यास के पहले अध्यक्ष थे, जिसे मंदिर निर्माण के लिए गठित किया गया। भगवान श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रति महंत अवैद्यनाथ का कितना लगाव था, वह इसी से समझा जा सकता है कि 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढ़हाए जाने का रोडमैप उनकी ही देखरेख में तैयार हुआ। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए विश्व हिंदू परिषद ने प्रयागराज में 1989 में जिस धर्मसंसद का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन को उर्जा से सराबोर किया और धर्मसंसद के तीन साल बाद ही 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा ढ़हा दिया गया। महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद गोरक्षपीठ के गुरुत्तर संचालन और श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को सारगर्भित उर्जा देने की जिम्मेदारी योगी आदित्यनाथ के कंधों पर आन पड़ी।</p>
<p>योगी आदित्यनाथ ने अपने गुरु के सपने को फलीभूत करने और श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को धार देने के उद्देश्य से वे राजनीति के अखाड़े में उतरे और संत व नागर समाज के सरोकारों से खुद को जोड़ा। उल्लेखनीय है कि महंत अवैद्यनाथ ने 1994 में योगी आदित्यनाथ को गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया। तब से लेकर आज तक योगी आदित्यनाथ प्रारंभ हिंदू समाज और हिंदुत्व की राजनीति को अपनी विचारधारा की धुरी बनाए रखा। वे अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ व महंत दिग्विजयनाथ की ही तरह श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को मुकाम पर पहुंचाने के लिए हरसंभव समर्पण भाव दिखाया और नतीजा सामने है। अब भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर को साकार करने की जिम्मेदारी भी गोरक्षनाथ पीठ के महंत व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कंधों पर है। शायद कालखंड ने ही सुनिश्चित कर रखा है कि जिस गोरक्षनाथ पीठ में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का सपना गढ़ा गया उसे पूरा करने का उत्तरदायित्व भी गोरक्षनाथ पीठ के एक महंत के हाथों रहा है।</p>
<p>याद होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा श्रीराम जन्मभूमि विवाद मामले में 9 नवंबर को फैसला आने के बाद अब अयोध्या में भगवान श्री राम भव्य मंदिर का निर्माण काम लगभग पूरा हो चुका है । अब तक देश-दुनिया के करोड़ों लोग भगवान श्रीराम का दर्षन कर चुके हैं। इसका पूरा श्रेय भारतीय जनमानस, संतसमाज और धार्मिक संगठनों को जाता है जिन्होंने मर्यादा और कानून के दायरे में रहकर भगवान श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को उर्जा दी। 500 वर्ष की लंबी लड़ाई और अदालती कार्रवाई के सुखद अंजाम से देश आह्लादित है और समाज में समरसता-एकता की भावना मजबूत हुई है। देश उन साधु-संतो और मठों-अखाड़ों का ऋणी है जो प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच रामनाम का अलख जगाए रखा और देश को आस्था की चैतन्यता से लबरेज किया। उसका एक बड़ा श्रेय गोरक्षनाथ पीठ को जाता है जिसने अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के बीज को अंकुरित किया और उसके महंतों ने मंदिर आंदोलन को गतिशील बनाया।</p>
<p>यह अद्भुत संयोग ही है कि अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि मामले में जब भी कोई महत्वूर्ण क्षण आया उसका संबंध गोरक्षनाथ पीठ से जुड़ा। सर्वोच्च अदालत का भी फैसला आया तो गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। यह संयोग प्रतीत कराता है मानों समय ने पहले ही निर्धारित कर रखा कि जिस गोरक्षपीठ के प्रांगण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के सपने को गढ़ा-बुना गया उस सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी भी गोरक्षपीठ के किसी पीठाधीश्वर के हाथों होगी। ऐसा ही होता हुआ देखा भी गया। सच कहें तो अयोध्या में निर्मित भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण में गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो चुकी है।</p>
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		<title>Sports Day : सुविधाएं और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर की जरुरत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Aug 2025 13:16:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक आज खेल दिवस है। आज भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मन पद्मभूषण से...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h3><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक</strong></span></h3>
<p>आज खेल दिवस है। आज भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मन पद्मभूषण से सम्मानित मेजर ध्यानचंद जी का जन्मदिन है। खेल में उनके महत्वपूर्ण योगदान के सम्मान में उनके जन्मदिन को भारत में खेल दिवस के रुप में मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद विश्व हॉकी में शुमार महानतम खिलाड़ियों में से एक अद्भुत खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा व लगन से देश का मस्तक गौरान्वित किया। अच्छी बात है कि देश के खिलाड़ी उनसे प्रेरणा लेकर अपने खेल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। अभी पिछले वर्ष ही संपन्न पेरिस 2024 ओलंपिक में भारत ने छः पदक जीते थे। इसमें एक रजत और पांच कांस्य पदक शामिल है। गत वर्ष पहले संपन्न कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत अपने खिलाड़ियों के श्रेष्ठ प्रदर्शन से गौरान्वित हो चुका है।तब भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में पदकों की झड़ी लगाते हुए कुल 61 मेडल हासिल किए थे। इसमें 22 गोल्ड, 16 सिल्वर और 23 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। इस शानदार प्रदर्शन से भारत ने चौथा स्थान हासिल किया जिससे देश का मस्तक स्वाभिमान से दमक उठा।</p>
<p>कॉमनवेल्थ गेम्स की तरह ही टोक्यो ओलंपिक में भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल का शानदार प्रदर्शन किया। भारत के खाते में एक गोल्ड, दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज समेत कुल सात पदक आए थे। पेरिस और टोक्यो दोनों ओलंपिक पर नजर दौड़ाएं तो नीरज चोपड़ा, मनु भाकर, सरबजोत सिंह, स्वप्निल कुसाले, अमन सहरावत, विनेश फोगाट, मीराबाई चानू, रवि दहिया, पीवी सिंधु, लवनीना बोरगेहेन, बजरंग पुनिया समेत भारतीय पुरुष हॉकी टीम के खिलाड़ी अपना जलवा बिखेरते देखे गए। उम्मीद किया जाना चाहिए कि अब अगले कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक में भारत एक नया कीर्तिमान रचेगा। यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिभा खेलों में उसकी उत्कृष्टता और हासिल होने वाले पदकों से जुड़ा होता है। अच्छा प्रदर्शन केवल पदक जीतने तक ही सीमित नहीं होता बल्कि राष्ट्र के स्वास्थ्य, मानसिक अवस्था एवं लक्ष्य के प्रति सतर्कता व जागरुकता को भी रेखांकित करता है।</p>
<p>दो राय नहीं कि कॉमनवेल्थ और पेरिस ओलंपिक में मिली उपलब्ध्यिं ने देश को गौरान्वित किया है। लेकिन एक सच यह भी है कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश को इससे बड़ी उपलब्धि की दरकार है। ऐसा तभी संभव होगा जब देश में उत्कृष्ट खिलाड़ियों, अकादमियों और प्रशिक्षकों को बढ़ावा मिलेगा। एक आंकड़े के मुताबिक देश में सिर्फ पंद्रह प्रतिशत लोग ही खेलों में अभिरुचि रखते हैं। यह आंकड़ा निराश करने वाला है। विचार करें तो इसके लिए भारतीय समाज का नजरिया और सरकार की नीतियां दोनों जिम्मेदार हैं। समाज में यह धारणा है कि खेलकूद के जरिए नौकरी या रोजी-रोजगार हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए। नतीजा सामने है। बच्चों में खेल के प्रति लगन और उत्सुकता में कमी है। चिंता की बात यह भी कि सरकारें भी खेल के विकास का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के बजाए राष्ट्रीय खेल अकादमियों का अध्यक्ष व सदस्य कौन होगा उस पर ज्यादा फोकस करती देखी जाती हैं। भला ऐसे माहौल में खेल का विकास कैसे होगा?</p>
<p>खेलों के विकास के लिए आवश्यक है कि सरकार की खेलनीति स्पष्ट व ईमानदार हो। स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों व खेल अकादमियों में बुनियादी ढांचे के विकास की गति तेज हो। बेहतर होगा कि सरकारें स्कूल स्तर से ही खेल को बढ़ावा देने का मिशन चलाए। स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा एवं विभिन्न खेलों में उनकी अभिरुचि को ध्यान में रखकर उन्हें विभिन्न किस्म के खेलों में समायोजित कर उनके उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था करे। ऐसा करने से उनकी प्रतिभा का सार्थक इस्तेमाल होगा और खेल को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन देखें तो स्कूलों में खेल के प्रति घोर उदासीनता है। इसका मूल कारण खेल संबंधी संसाधनों की भारी कमी और खेल से जुड़े योग्य शिक्षकों-प्रशिक्षकों का अभाव है। अगर प्राथमिक स्कूलों से इतर माध्यमिक विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की बात करें तो यहां भी स्थिति कमोवेश वैसी ही है। यहां संसाधन तो हैं लेकिन इच्छाशक्ति और प्रशिक्षण के अभाव में खेलों के प्रति रुझान नहीं बढ़ रहा है।</p>
<p>उचित होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें खेलों में सुधार के लिए पटियाला में स्थापित खेल संस्थान की तरह देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के संस्थान खोलें। ऐसा इसलिए कि उचित प्रशिक्षण के जरिए ही देश में खेलों का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है। यहां यह भी समझना होगा कि जब तक खेलों को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक खेल प्रतिभागियों में स्पर्धा का वातावरण निर्मित नहीं होगा। अगर खेलों में नौजवानों को अपना भविष्य सुनिश्चित नजर नहीं आएगा तो स्वाभिवक है कि वे वे खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लेंगे। खेलों में भविष्य सुरक्षित न होने के कारण ही नौजवानों में उदासीनता है और खेल के क्षेत्र में भारत फिसड्डी देशों में शामिल है। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि खेलों में खराब स्थिति के लिए एकमात्र सरकार की उदासीनता ही जिम्मेदार नहीं है। बल्कि खेल से विमुखता के लिए काफी हद तक समाज का नजरिया भी जिम्मेदार है। आज भी देश में एक कहावत खूब प्रचलित है कि ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’। अब इस कहावत को बदलने की जरुरत है।</p>
<p>अकसर देखा जाता है कि माता-पिता के माथे पर तब चिंता की लकीरें उभर आती हैं जब उनका बच्चा खेल में कुछ ज्यादा ही अभिरुचि दिखाने लगता है। तब उन्हें डर सताने लगता है कि कहीं उनका बच्चा खेल में अपनी उर्जा खर्च कर अपना भविष्य न चौपट कर ले। स्कूलों में भी गुरुजनों द्वारा अकसर बच्चों से कहते सुना जाता है कि दिन भर खेलोगे तो पढ़ोगे कब। इस तरह की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। बच्चों को खेलने के लिए उत्साहित करना चाहिए। अगर सरकार की नीतियों में खेल से रोजगार का जुड़ाव हो तो फिर माता-पिता के मन में भी बच्चे के भविष्य को लेकर किसी तरह की आशंका-चिंता नहीं रहेगी। खेल के प्रति उत्साहजनक वातावरण निर्मित न होने के कारण ही आज देश अंतर्राष्ट्रीय खेल पदकों की फेहरिस्त में निचले पायदान पर रहता है। हां, यह सही है कि अब पहले के मुकाबले कॉमनवेल्थ, ओलंपिक और एशियाड खेलों में भारत के खिलाड़ी उत्तम प्रदर्शन कर रहे हैं। वे पदक जीतकर देश का मान बढ़ा रहे हैं। लेकिन सच यह भी है कि आज की तारीख में देश में खेल का मतलब क्रिकेट तक सीमित रह गया है। बाकी खेल दोयम दर्जे की स्थिति में हैं।</p>
<p>फुटबाल, कबड्डी, तीरंदाजी, जिमनास्टिक जैसे खेलों के खिलाड़ियों को उस तरह का सम्मान और पैसा नहीं मिल रहा है जितना कि क्रिकेटरों को मिलता है। यहां तक कि विज्ञापनों में भी क्रिकेटर ही छाए रहते हैं। यह ठीक नहीं है। भारत को अपने पड़ोसी देश चीन से सबक लेना चाहिए कि 1949 में आजाद होने के बाद 1952 के ओलंपिक में एक भी पदक नहीं जीता। लेकिन 32 वर्ष बाद 1984 के ओलंपिक में 15 स्वर्ण पदक झटक लिए। आज चीन हर ओलंपिक खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर दुनिया को अचंभित कर रहा है। उसके ओलंपिक पदकधारकों में महिलाओं की तादाद भी अच्छी रहती है। अच्छी बात है कि अब भारत में भी खेलों को लेकर उत्साह बढ़ा है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है।</p>
<p>उचित होगा कि भारत भी चीन की तरह खेल को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में शामिल कर अपनी नीतियों को उसी अनुरुप ढ़ाले। इससे अपेक्षित परिणाम मिलना तय हैं। इसके लिए भारत को गांवों से लेकर नगरों तक के खेल की बुनियादी ढांचे में आमुलचूल परिवर्तन करना होगा। उसे खेल प्रशिक्षण की आधुनिक अकादमियों की स्थापना के साथ-साथ समुचित प्रशिक्षण, खेल धनराशि में वृद्धि तथा प्रतियोगिताओं का आयोजन करना होगा। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों को सम्मानित करना होगा। अच्छी बात है कि भारत की मौजूदा सरकार इस दिशा में ठोस पहल कर रही है। खेल मंत्रालय खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाओं के साथ विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। उचित यह भी होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें खेल के विकास के लिए ईमानदार और स्पष्ट नीति को लागू कर उसका क्रियान्वयन और अनुपालन कराए।</p>
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