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	<title>SPECIAL ARTICLE Archives - Lok Dastak</title>
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	<description>Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, Breaking News in Hindi.Lok Dastak</description>
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	<title>SPECIAL ARTICLE Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>SPECIAL ARTICLE : भोजन की बर्बादी बनाम भूख से बेहाल जिंदगी</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/25042</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Oct 2025 16:18:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक आज विश्व खाद्य दिवस है। विश्व खाद्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h2><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति -अरविन्द जयतिलक</strong></span></h2>
<p>आज विश्व खाद्य दिवस है। विश्व खाद्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य भूख और कुपोषण को खत्म करने के लिए वैश्विक जागरुकता बढ़ाना, सभी के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भोजन सुनिश्चित करना और स्थायी खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देना है। लेकिन विडंबना है कि इस सार्थक उद्देश्य और पहल के बावजूद भी हर वर्ष करोड़ों टन भोजन बर्बाद हो रहा है। वहीं दूसरी ओर दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे हैं। विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (एसओएफआई) रिपोर्ट-2025 से उद्घाटित हुआ है कि वर्ष 2024 में 63.8 करोड़ से 72 करोड़ लोग जो वैश्विक जनसंख्या का क्रमशः 7.8 और 8.8 प्रतिशत है, भूख का सामना करेंगे।</p>
<p>इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कई देशों में बढ़ी हुई मुद्रास्फिति ने क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है जिसके कारण 2030 तक भूख और खाद्य असुरक्षा के उन्मूलन यानि एसडीजी लक्ष्य 2.1 बहुत दूर हो गया है। संयुक्त राष्ट्र की 2024 की ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 36 देशों में भूख का स्तर बेहद गंभीर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व स्तर पर 2025 तक 673 मिलियन लोग भूख का अनुभव करेंगे जो कुल जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत है। आंकड़ों के मुताबिक यह 2023 एवं 2022 की तुलना में थोड़ा कम है लेकिन चुनौती जस की तस बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र की 2024 की रिपोर्ट पर गौर करें तो विश्व में हर साल लगभग 1.05 अरब टन खाना बर्बाद होता है जो कि कुल खाद्य उत्पादन का 19 प्रतिशत है।</p>
<p>इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में हर दिन लगभग एक अरब से ज्यादा थालियां बर्बाद हो जाती है। खाने की बर्बादी के मामले में पहला स्थान चीन का है जहां हर साल 9.6 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। दूसरे स्थान पर भारत है जहां हर साल 6.7 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। यह प्रति व्यक्ति के हिसाब से 50 किलो ठहरता है। खाने की यह बर्बादी इस अर्थ में ज्यादा चिंतनीय है कि एक ओर जहां दुनिया भर के करोडों लोग भुखमरी के शिकार हैं वहीं करोड़ों टन खाना बर्बाद हो रहा है। याद होगा गत वर्ष पहले एसोचैम और एमआरएसएस इंडिया की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि भारत में हर वर्ष 440 अरब डॉलर के दूध, फल और सब्जियां बर्बाद होते हैं।</p>
<p>इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के एक बड़े उत्पादक देश होने के बावजूद भी भारत में कुल उत्पादन का करीब 40 से 50 फीसदी भाग जिसका मूल्य लगभग 440 अरब डॉलर के बराबर है, बर्बाद हो जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर साल उतना भोजन बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 2023-24 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 3322.98 लाख मिट्रिक टन था। लेकिन इसके बावजूद भी यह अन्न लोगों की भूख नहीं मिटा पा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह उत्पादित देश की आबादी के लिए कम है। लेकिन अन्न की बर्बादी के कारण करोड़ों लोगों को भूखे पेट रहना पड़ रहा है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना हजारों बच्चों की जान जाती है। वैश्विक भूख सूचकांक-2024 के मुताबिक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत दुनिया के 127 देशों में 105 वें स्थान पर रहा।</p>
<p>भारत को इस सूचकांक में गंभीर श्रेणी में रखा गया है। भारत का स्कोर 27.3 है जो गत साल से थोड़ा बेहतर है। यहां ध्यान देना होगा कि बर्बाद भोजन को पैदा करने में 25 प्रतिशत स्वच्छ जल का इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषि के लिए जंगलों को भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है। बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। उसी का नतीजा है कि खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है।</p>
<p>खाद्य वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन की अधिकता से भोजन से पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान में प्रोटीन की कमी होने लगी है। आंकड़ों के मुताबिक चावल में 7.6 प्रतिशत, जौ में 14.1 प्रतिशत, गेहूं में 7.8 प्रतिशत और आलू में 6.4 प्रतिशत प्रोटीन की कमी दर्ज की गयी है। अगर कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया भर में 15 करोड़ लोग इस नई वजह के चलते प्रोटीन की कमी का शिकार हो जाएंगे। यह दावा हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने अपनी ताजा रिपोर्ट में किया है। यह शोध एनवायरमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव जर्नल में प्रकाशित हुआ। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारतीयों के प्रमुख खुराक से 5.3 प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जाएगा। इस कारण 5.3 करोड़ भारतीय प्रोटीन की कमी से जूझेंगे।</p>
<p>गौरतलब है कि प्रोटीन की कमी होने पर शरीर की कोशिकाएं उतकों से उर्जा प्रदान करने लगती हैं। चूंकि कोशिकाओं में प्रोटीन भी नहीं बनता है लिहाजा इससे उतक नष्ट होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और उसका शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आयी तो भारत के अलावा उप सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी यह स्थिति भयावह होगी। इसलिए और भी कि यहां लोग पहले से ही प्रोटीन की कमी और कुपोषण से जूझ रहे हैं। बढ़ते कार्बन डाई आक्साइड के प्रभाव से सिर्फ प्रोटीन ही नहीं आयरन कमी की समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया एवं उत्तर अफ्रीका समेत दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की संभावनाएं हैं।</p>
<p>इसके कारण उनके भोजन में 3.8 प्रतिशत आयरन कम हो जाएगा। फिर एनीमिया से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी। प्रोटीन की कमी से कई तरह की बीमारियों का खतरा उत्पन हो गया है। अभी गत वर्ष ही इफको की रिपोर्ट में कहा गया कि कुपोषण की वजह से देश के लोगों का शरीर कई तरह की बीमारियों का घर बनता जा रहा है। कुछ इसी तरह की चिंता ग्लोबर हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भी जताया गया है। हालांकि यूनाइटेड नेशन के फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के कारण अब भारत में पिछले एक दशक में भूखमरी की समस्या में तेजी से कमी हुई है जिससे कुपोषण का संकट घटा है। यहां ध्यान देना होगा कि दुनिया भर में सालाना जितना अन्न की वैश्विक बर्बादी हो रही है उसकी कीमत तकरीबन 1000 अरब डॉलर है।</p>
<p>दुनिया भर में अन्न की बर्बादी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यदि कुल बर्बाद भोजन को 20 घनमीटर आयतन वाले किसी कंटेनर में एक के बाद एक करके रखें और ऊंचाई में बढ़ाते जाएं तो 1.6 अरब टन भोजन से चांद तक जाकर आया जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों में अन्न की बर्बादी के कारण 680 अरब डॉलर और विकासशील देशों में 310 अबर डॉलर का नुकसान हो रहा है। ध्यान देने वाली बात यह कि अमीर देश भोजन के सदुपयोग के मामले में सबसे ज्यादा संवेदनहीन और लापरवाह हैं। इन देशों में सालाना 22 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। जबकि उप सहारा अफ्रीका में सालाना कुल 23 करोड़ टन अनाज पैदा किया जाता है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की ही बात करें तो यहां जितना अन्न खाया जाता है उससे कहीं अधिक बर्बाद होता है। आंकड़ों के मुताबिक केवल खुदरा कारोबारियों और उपभोक्ताओं के स्तर पर अमेरिका में हर साल 6 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। उचित होगा कि विश्व समाज के अग्रणी देश दुनिया भर में भूख और कुपोषण से बेहाल लोगों की सुध लें। करोड़ों टन जो भोजन बर्बाद हो रहा है उसे जरुरतमंदों तक पहुंचाने की महती व्यवस्था सुनिश्चित करें।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>SPECIAL ARTICLE : भारत में &#8216;डॉल्फिन&#039;(Dolphin) का बढ़ता कुनबा ?</title>
		<link>https://www.lokdastak.com/archives/22624</link>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Mar 2025 16:28:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA['डॉल्फिन']]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY DR RAMESH THAKUR (SENIOR COLUMNIST) भारतीय नदियों में जलीय जीव ‘डॉल्फिन’ की संख्या...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left"><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY DR RAMESH THAKUR</strong></span></p>
<p><span style="color: #993300"><strong>(SENIOR COLUMNIST)</strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-22625" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot_20250311-215442_Facebook-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" /></p>
<p>भारतीय नदियों में जलीय जीव ‘डॉल्फिन’ की संख्या में दर्ज हुई वृद्धि की सु:खद खबर चर्चाओं में है। इससे उम्मीद जगी है कि लोग अब दुलर्भ डॉल्फिन को किताबों, टीवी और यूट्यूब के अलावा वास्तविक रूप से भारतीय नदियों में ही साक्षात दीदार कर सकेंगे। डॉल्फिन भारत की किन-किन नदियों में हैं उसे चिंहित कर लिया गया है। हिंदुस्तान के 8 राज्यों की 28 बड़ी नदियों में डॉल्फिन की संख्या के संबंध में कराए गए सर्वेक्षण-2024 से कुल 6327 डॉल्फिनों के होने का पता चला है, जिनमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश में आंकी गई। उत्तर प्रदेश की नदियों में इस वक्त 2397 डॉल्फिनों की मौजूदगी है। इसमें एक सुखद खबर ये है कि डॉल्फिनों की संपूर्ण संख्या में 20 प्रतिशत मादा डॉल्फिन बताई गई हैं जिनसे अगले एकाध वर्षों में डॉल्फिन की संख्याओं में और इजाफा होने की उम्मीद जगी है।</p>
<p>डॉल्फिन को सबसे सुंदर और आर्कषण जलीय जंतु कहा जाता है। इस दुलर्भ किस्म की मछली के दीदार को लोग विदेशों तक जाते हैं और बड़ी रकम देकर उसे देखते हैं। लेकिन, डॉल्फिन अब भारतीय नदियों में ही दिखाई दिया करेंगी। इसके लिए हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय वन्य बोर्ड की 7वीं बैठक हुई, जिसमें उन्होंने स्वयं डॉल्फिन जनगणना की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर ये सु;खद खबर देशवासियों से साक्षा की। डॉल्फिन की गणना के लिए 8,500 किलोमीटर से अधिक जलीय क्षेत्र का परीक्षण किया गया। इस कार्य में 3150 दिन लगे और वन्य बोर्ड के 1200 कर्मचारियां ने सहभागिता निभाई। 25 करोड़ रूपए का खर्च भी आया। डॉल्फिन की जनगणना भारत में पहली मर्तबा कराई गई है। ये कार्य आसान नहीं था, तमाम तरह की मुसिबतों का सामना वन्यजीव की टीमों को उठाना पड़ा। लेकिन आधुनिक तकनीकों ने मुसीबतों को किसी तरह आसान किया और डॉल्फिन की जनगणना समय से पूरी हो सकी।</p>
<p>भारत सरकार ने सन् 2009 में डॉल्फिन को ‘राष्ट्रीय जलीय जीव’ घोषित किया था। असंतुलित पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए जलीय जंतुओं की गणना कर उनका संरक्षण करना सदैव हुकूमतों के लिए चुनौती ही रहा? क्योंकि बीते कुछ दशकों से नदियों में जिस हिसाब से प्रदूषण फैला है उससे कहीं अधिक जल क्षेत्र प्रदूषित हुआ, जिसकी मार जलजीव लगातार झेल रहे हैं। नदियों में बेहताशा कचरा फैलाया जा रहा है, जिससे अनगिनत जल जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। उन्हीं को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने ये कदम उठाया। रिपोर्ट ये भी बताती है कि अगर भारतीय नदियां साफ-सुथरी रहें। तो सामान्य नदियों में भी डॉल्फिन आ सकती है। डॉल्फिन को साफ पानी पसंद है। जिन 28 नदियों में डॉल्फिन पाई गई हैं, उनका पानी फिलहाल अच्छा है। पर, उतना भी नहीं, जितना होना चाहिए? नदियों का पानी साफ हो, इसके लिए प्रयास और तेज करने होंगे?</p>
<p>डॉल्फिन सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार में बहने वाली नदियों में भी 2220 डॉल्फिन की मौजूदगी मिली है। वहीं, पश्चिम बंगाल में 815 तो असम में 635 डॉल्फिन मौजूद हैं। प्रयागराज में हाल में संपन्न हुए महाकुंभ के दौरान भी कई स्नानियों को डॉल्फिन के दर्शन हुए। क्योंकि गणना में त्रिवेणी संगम में करीब 96 डॉल्फिन बताई गई हैं। इसके अलावा कम संख्या में बाकी नदियों में भी डॉल्फिनों की संख्या सामने आई है। डॉल्फिन सर्वेक्षण का दूसरा चरण अभी होना बाकी है। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक डॉल्फिन मिलने पर केंद्र सरकार ने राज्य को ‘गांगेय डॉल्फिन’ घोषित किया है। मुंबई के समुद्र में डॉल्फिनों की संख्या अच्छी हुआ करती थी, लेकिन गणना में संख्या उतनी नहीं आई जितने की उम्मीद थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां डॉल्फिनों का अवैध शिकार सबसे ज्यादा किया जाता है। तस्कर डॉल्फिनों को चुन चुन कर निशाना बनाते हैं।</p>
<p>डॉल्फिन जहां होती हैं, वहां स्वयं का दीदार लोगों को आसानी से करवाती हैं। दरअसल, ये एक ऐसी स्तनपायी जीव है,जो ज्यादा वक्त तक पानी में सांस नहीं ले सकती। सांस के लिए कुछ समय बाद उसे पानी से बाहर आना ही होता है। डॉल्फिन जब पानी से बाहर आती है तो 7 फिट उंची लंबी छलांग लगाती है। वह दृश्य देखने लायक होता है। डॉल्फ़िन की भारतीय बैराइटी को ‘सूंस’ कहते हैं,जो अधिकांश भारत, नेपाल और बांग्लादेश की नदियों में पाई जाती हैं जिसकी लंबाई सामान्य डॉल्फिन के मुकाबले कुछ कम होती है। 1965 में भारत की नदियों में वास करने वाली डॉल्फिनों को ‘गंगा डॉल्फिन’ का नाम दिया गया। डॉल्फिन अधिकतर मीठे पानी में रहना पसंद करती हैं। इस लिहाज से भारत की नदियां का पानी हमेशा से मीठा रहा है। पर, बढ़ते कचरे ने मीठे पानी को अब कड़वा कर दिया है। डॉल्फिन के संरक्षण के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने असम से पिछले वर्ष दिसंबर-2024 से डॉल्फिन की टैगिंग का अभियान शुरू किया था,जो 10 फरवरी 2025 में संपन्न हुआ।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-22628 size-full" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2025/03/licensed-image.jpeg" alt="" width="396" height="223" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2025/03/licensed-image.jpeg 396w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2025/03/licensed-image-300x169.jpeg 300w" sizes="(max-width: 396px) 100vw, 396px" /></p>
<p>भारत में 20वीं सदी के दरम्यान डॉल्फिनों की संख्या बहुत अच्छी हुआ करती थी। उसके बाद संख्या में तेजी से गिरावट बाई। संख्या कम होने के कारण कई हैं। सबसे पहले डॉल्फिन के तस्करों पर अंकुश लगाना होगा। मछुआरे भी डॉल्फिनों को खतरा पहुंचाते हैं। मछली पकड़ने के दौरान उनके जाल में कई बार डॉल्फिन फंसकर मर जाती हैं। वहीं, तस्कर डॉल्फिन का शिकार उसके तेल के लिए करते हैं जिसकी डिमांड राष्ट्र से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खूब रहती है। इसके अलावा बांध, तटबंधों के निर्माण जैसी विकास परियोजनाएं भी डॉल्फिन के लिए खतरा बनी हैं। घाघरा, गंडक, कोसी और सोन जैसी सहायक नदियों में पानी की गहराई की वजह से अधिकांश हिस्सों में डॉल्फिन की आबादी वृद्धि हुई है। ये वृद्वि यथावत रहे, इसके लिए इस जलीय जंतु के लिए माहौल पैदा करना होगा। नदियों को साफ करना होगा, जल प्रदूधण पर निरंत्रण करना होगा और पानी में मीठी की मात्रा बढ़ाने के लिए नई आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>लेख विशेष : वसंत पंचमी या श्रीपंचमी _______</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Feb 2024 11:54:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[ऋषि पंचमी]]></category>
		<category><![CDATA[वसंत पंचमी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीपंचमी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दू त्योहार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY LOK REPORTER  वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्यौहार है। इस दिन विद्या...</p>
<p>The post <a href="https://www.lokdastak.com/archives/17224">लेख विशेष : वसंत पंचमी या श्रीपंचमी _______</a> appeared first on <a href="https://www.lokdastak.com">Lok Dastak</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY LOK REPORTER </strong></span></p>
<p>वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्यौहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करते हैं। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।</p>
<p>वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।</p>
<p>यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की &#8220;देवी मां सरस्वती&#8221; का जन्मदिवस माना जाता है।</p>
<p>जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं कलाकारों का तो कहना ही क्या!</p>
<p>जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।</p>
<p>इसके साथ ही, यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है।</p>
<p>रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दण्डकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे जूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया।</p>
<p>दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां &#8220;शबरी माता&#8221; का मंदिर भी है।</p>
<p>सिखों के लिए बसंत पंचमी के दिन का बहुत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन सिखों के दसवें गुरु, गुरु &#8220;श्री गोबिन्द सिंह&#8221; जी का विवाह हुआ था।</p>
<p>वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा सम्बन्ध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी।</p>
<p>मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।</p>
<p>कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो?</p>
<p>इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी।</p>
<p>पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसन्त पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अतः पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता</p>
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		<title>SPECIAL ARTICLE : दलित राजनीतिक चेतना की संवाहक मायावती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Jan 2024 16:49:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[कांशीराम]]></category>
		<category><![CDATA[चेतना]]></category>
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		<category><![CDATA[बसपा सुप्रीमो]]></category>
		<category><![CDATA[मायावती]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; &#160; PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK &#160; आज बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY </strong></span><span style="color: #ff0000"><strong>ARVIND JAYTILAK <img decoding="async" class="size-thumbnail wp-image-15271 alignleft" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-300x300.jpg 300w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-1024x1025.jpg 1024w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-768x769.jpg 768w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/11/IMG-20231107-WA0745.jpg 1279w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></strong></span></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="font-weight: 400">आज बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का जन्मदिन है। उन करोड़ों लोगों के लिए उत्साह का दिन है जो सामाजिक-राजनीतिक तौर पर मायावती को हाशिए के लोगों के जीवन में बदलाव का संवाहक मानते हैं। उन लोगों के लिए भी खुशी का दिन है जो समावेशी राजनीति के बरक्स जाति व धर्म के मोड़ पर ठहरी राजनीति को नई उर्जा देने का श्रेय सोशल इंजीनियरिंग  की जादूगरनी मायावती को देते हैं। जिस तरह भारतीय राजनीति में स्थापित मूल्य व धारणाएं चेतन मन में उतरते हुए अवचेतन के प्रवाह बिंदू तक यात्रा करती हैं। ठीक उसी तरह मायावती के सामाजिक-राजनीतिक विचार और उनकी स्वीकारोक्ति भी हाशिए के लोगों के चेतन-अवचेतन मन में समायी हुई है। किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के हृदय-स्थल में उतर जाना आसान नहीं होता। लेकिन मायावती ने यह कर दिखाया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> सैकड़ों साल बाद जब भी भारतीय समाज का स्वरुप</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">चरित्र एवं चिंतन की व्याख्या का दायरा और उसके मूल्यों और स्वीकृतियों को देखने-समझने</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">मापने-परखने का उच्च मापदण्ड तय किया जाएगा उस कसौटी पर मायावती का कद ऊंचा दिखेगा। जब भी असमानता और अन्याय पर आधारित समाज के खिलाफ तनकर खड़ा होने</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">अपनी आवाज को मुखर करने</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">हाशिए के लोगों को गोलबंद करने और समानतावादी विचारों को प्रस्फुटित करने वाले सियासतदानों का इतिहासपरक मूल्यांकन होगा उस कसौटी पर भी मायावती अग्रिम पंक्ति में दिखेंगीे। उनका अतीत और वर्तमान संघर्ष दोनों ही सदैव समतामूलक समाज के निर्माण</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">राष्ट्रीय एकता</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">अखण्डता और समानता की दिशा में काम करने और उससे प्रेरणा लेने के तौर पर एक मिसाल है। सच कहें तो मायावती का सामाजिक-राजनीतिक योगदान एवं सर्वजन की चेतना को मुखरित करने की क्षमता कमाल की है। यह खूबी देश के अन्य सियासतदानें में देखने को नहीं मिलती। मायावती को समझने-बुझने के लिए अतीत और वर्तमान दोनों ही समाज की बुनावट</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">उसकी स्वीकृतियां</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">विसंगतियां एवं धारणाओं को समझना आवश्यक है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">इसलिए और भी कि उन्होंने समय की मुख्य धारा के विरुद्ध खड़ा होने और उसे बदलने के एवज में अपमानित और उत्पीड़ित करने वाली हर प्रवृत्तियों के ताप को सहा है और जीया भी है। उनके पास एकमात्र सामाजिक-राजनीतिक विचारों का बल रहा जिसके बूते वह हाशिए पर खड़े लोगों को मुख्य धारा में लाने में कामयाब हुई। अब भी उनकी कोशिश बहुजन-सर्वजन की चेतना को मुखरित करना है। हर समाज की भेदभावपरक व्यवस्था ही व्यक्ति के राजनीतिक-सामाजिक विचारों को तार्किक आयाम और जोखिम उठाने की ताकत देता है। साथ ही भेदभाव और अनर्थकारी व्यवस्था के खिलाफ मुठभेड़ का माद्दा भी। कहते हैं न कि नुकसान की क्षमता विकसित किए बिना अन्याय के खिलाफ नहीं लडा जा सकता।़ मायावती ने इस कहावत को भलीभांति चरितार्थ किया है। अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए नुकसान की क्षमता विकसित की हैं और समय-समय पर उद्घाटित भी किया है। जिस जातिभेद और वर्णभेद से उत्पन हलाहल को डाॅक्टर अंबेडकर और कांशीराम ने पीया उसी पीड़ा को मायावती ने भी निकटता से महसूस किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> ऐसे भेदभावपरक व्यवस्था में समाज और राजनीति के गुणसूत्र को बदलने की भीष्म प्रतिज्ञा ली और उसका क्रियान्वयन के लिए जीवन को जोखिम में भी डाला। </span><span style="font-weight: 400">1977 </span><span style="font-weight: 400">में कांशीराम के संपर्क में आने के बाद उन्होंने एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ बनने का फैसला लिया। राजनीति में आने से पहले वह एक शिक्षिका थी। सरकारी नौकरी का त्यागकर राजनीति के अंधेरे गुफा में प्रवेश करना आसान नहीं होता। वह भी तब जब एक पिता अपनी बेटी को एक कलेक्टर के रुप में देखने का आकांक्षा पाल रखा हो। लेकिन नियति ने कुछ और तय कर रखा था। कहा जाता है कि शिक्षिका के रुप में काम करते हुए उनकी मुलाकात कांशीराम से हुई जिसके कारण उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर सामाजिक-राजनीतिक गैर-बराबरी को समाप्त करने लिए परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं को हथियार बनाने के बजाए उसे ही निशाने पर लिया। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">पुरातनपंथी धारणाओं पर तीव्रता से हमला बोला और व्यवस्था की सामंती ढांचे को उखाड़ फेकने के लिए राजनीति को हथियार बनाया। उन्होंने सर्जनात्मक जिद् का सहारा लेते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा अब तक समाज में जाति व्यवस्था</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">आर्थिक असमानता और वर्ग विभेद बना रहेगा तब तक अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति को न्याय और अधिकार मिलना कठिन है। सो उन्होंने खुद को राजनीति के झंझावात में झोंक दिया। चूंकि उनके मन में समतामूलक व एक व्यवस्थित राजनीतिक समाज के निर्माण और स्थापना का वैचारिक द्वंद उफान मार रहा था। उनका निष्कर्ष था कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति ही वह जरिया है जिसके जरिए वंचितों को न्याय दिलाया जा सकता है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर डा</span><span style="font-weight: 400">0 </span><span style="font-weight: 400">अंबेडकर के सामाजिक-राजनीतिक दर्शन को अपना हथियार बनाया और गांव</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">कस्बों और शहरों का खाक छानते हुए करोड़ों लोगों को अभियान से जोड़ा। वंचितों को एकजुट होने का संदेश दिया। लोगों के अपार जनसमर्थन से उत्साहित होकर उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर </span><span style="font-weight: 400">14 </span><span style="font-weight: 400">अप्रैल</span><span style="font-weight: 400">, 1984 </span><span style="font-weight: 400">को बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की स्थापना की। इस राजनीतिक विकल्प ने देश में जमे-जमाए राजनीतिक दलों को चुनौती परोस दी। राजनीति के पैमाने बदल दिए। राजनीति को नया रंग-रुप दिया। नतीजतन भारतीय राजनीतिक समाज में खदबदाहट बढ़ गयी। कांशीराम के राजनीतिक विचार और मायावती के तेवर ने हाशिए के लोगों को गोलबंद कर दिया। नतीजा </span><span style="font-weight: 400">1984 </span><span style="font-weight: 400">के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को </span><span style="font-weight: 400">10 </span><span style="font-weight: 400">लाख से अधिक मत प्राप्त हुए। इस नतीजे से मायावती को बहुजन समाज की ताकत का पता चल गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> अब उनका मकसद सिर्फ एक सांसद और विधायक बनना नहीं रहा बल्कि हाशिए के लोगों के जीवन में बदलाव लाना बन गया। उन्होंने हाशिए के लोगों को उनकी शक्ति का अहसास कराते हुए राजनीतिक सत्ता में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने का राह चूना। वंचितों को सत्ता तक पहुंचाने और उनके स्वाभिमान को समाज में स्वीकृति दिलाने के निमित्त कांशीराम के साथ मिलकर राजनीति की प्रयोगशाला में तरह-तरह के प्रयोग किए। कभी समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ कर सत्ता का संधान किया तो कभी धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी का सहयोग लेकर सत्ता-सिंहासन का वरण किया। उनके राजनीतिक सफर पर दृष्टिपात करें तो </span><span style="font-weight: 400">1989 </span><span style="font-weight: 400">में बिजनौर से लोकसभा सदस्य और </span><span style="font-weight: 400">1994 </span><span style="font-weight: 400">में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुई। कांशीराम की सलाह पर </span><span style="font-weight: 400">1993 </span><span style="font-weight: 400">में सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। तब बसपा के </span><span style="font-weight: 400">67 </span><span style="font-weight: 400">उम्म्मीदवार जीते और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। लेकिन यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चली। </span><span style="font-weight: 400">2 </span><span style="font-weight: 400">जून </span><span style="font-weight: 400">1995 </span><span style="font-weight: 400">को उत्तर प्रदेश की राजनीति में गेस्टहाउस कांड जिसमें मायावती की जान लेने की कोशिश हुई</span><span style="font-weight: 400">, </span><span style="font-weight: 400">ने राजनीति के मिजाज को बदल दिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> लेकिन कहते हैं न कि जाको राखे साईयां मार सके ना कोय। जिसको मिटाने की कोशिश हुई वहीं प्रदेश की मुख्यमंत्री बन गयी। मायावती ने </span><span style="font-weight: 400">3 </span><span style="font-weight: 400">जून से </span><span style="font-weight: 400">18 </span><span style="font-weight: 400">अक्टुबर </span><span style="font-weight: 400">1995 </span><span style="font-weight: 400">तक शासन किया। कानून का राज स्थापित कर बेहतर सत्ता संचालन का मिसाल गढ़ा। </span><span style="font-weight: 400">1996 </span><span style="font-weight: 400">के विधानसभा चुनाव में बसपा को </span><span style="font-weight: 400">67 </span><span style="font-weight: 400">सीटें हासिल हुई और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी। तब उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर छह-छह महीने की सरकार चलाने का निर्णय लिया। उन्होंने </span><span style="font-weight: 400">1997 </span><span style="font-weight: 400">में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रुप में अपना दूसरा कार्यकाल </span><span style="font-weight: 400">21 </span><span style="font-weight: 400">मार्च से </span><span style="font-weight: 400">20 </span><span style="font-weight: 400">सितंबर </span><span style="font-weight: 400">1997 </span><span style="font-weight: 400">तक पूरा किया। </span><span style="font-weight: 400">2007 </span><span style="font-weight: 400">में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और </span><span style="font-weight: 400">2012 </span><span style="font-weight: 400">तक विकास के नए-नए कीर्तिमान गढ़े। हालांकि भाजपा के साथ गठबंधन के प्रयोग की खूब आलोचना हुई। लेकिन वे इससे विचलित नहीं हुई। मायावती अच्छी तरह जानती हैं कि सत्ता के बगैर वंचितों और शोषितों को हक दिलाना संभव नहीं है। लिहाजा वह अपने राजनीतिक विचार को ठोस रुप देने के लिए किस्म-किस्म के समझौते को बार-बार आयाम देती रहती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> यह सच्चाई भी है कि जिसका राजनीतिक चिंतन व सामाजिक दर्शन स्पष्ट होता है उसका राजनीतिक नजरिया भी उतना ही स्पष्ट होता है। मायावती इसकी मिसाल हैं। वह जानती हैं कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक सत्ता अधिकार हासिल करने के लिए किसी भी दल की अनदेखी नहीं की जा सकती। ऐसा करना हाशिए के समाज के साथ छल और उन्हें शेष समाज से अलग-थलग करने जैसा होगा। इस सिद्धांत ने मायावती की सियासत को मजबूती दी है और वह आज भी भारतीय राजनीति की केंद्रबिंदू हंै।  </span></p>
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		<title>विषय आमंत्रित रचना &#8211; सच्चाई&#8230;&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Nov 2023 05:38:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[आध्यात्मिक]]></category>
		<category><![CDATA[विषय आमंत्रित रचना]]></category>
		<category><![CDATA[सच्चाई]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY ANJU SANKLECHA SURAT, GUJRAT I  जीवन की क्षण भंगुरता सच्चाई है &#124;...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ANJU SANKLECHA</strong></span></p>
<p><em><strong>SURAT, GUJRAT I </strong></em><br />
जीवन की क्षण भंगुरता सच्चाई है | नियति योग है तो वैसे ही सांसारिक लोगो की मोह ग्रस्तता भी सच्चाई है।न भगवान बुलाने से आते है । न ही मनाने से आते है । यदि मन में हो सच्चाई के भाव तो वे हमारे साथ घुलमिल जाते है । हमारे अंतस्थल से निकली यथार्थ आवाज ही उसका सही पास वर्ड है ।और अपने साथ उन्हें मिलाने का तथा उनके साथ मिलने का यही सही पास वर्ड है । रोशनी इतनी भी ज्यादा ना हो की हमारे आंखें चुंधिया जाये । मन को हम इतना मलीन भी ना बनायें की हमें सच्चाई भी नजर ही ना आये ।</p>
<p>जीवन में संतुलन के बिना अच्छे से अच्छे व्यंजन का भी स्वाद बिगड़ जाता है । इसलिए रिश्तों को हम सच्चाई से ऐसे सहेजें की उनकी मिठास खो ना पायें । जितना कम सामान रहेगा ।उतना सफर आसान रहेगा । गठरी जितनी भारी होगी । उतना तूं हैरान रहेगा ।दूसरी बात इस शेर में सामान का अर्थ राग द्वेष समझें तो इस शेर में बहुत बड़ी आध्यात्मिक सच्चाई भी छुपी है । राग द्वेष हमारे जितने कम होंगे जिंदगी उतनी आसान रहेगी । तीसरी बात विकसित देशों में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न कुछ व्यक्ति minimalist life style की तरफ आकर्षित हो रहे हैं ।</p>
<p>जापान तथा डेनमार्क में minimalist की संख्या बढ़ रही है । उन सब का मुख्य अनुभव यही पढ़ने में आया है कि minimalist life style में वस्तुओं की सार सम्भाल नहीं करनी पड़ती है इसलिए अब उन्हें जिंदगी अच्छी तरह जीने का समय मिलता है । श्रावक के 12 व्रतों में अपरिग्रह अणुव्रत, अनर्थ दण्ड, उपभोग परिभोग परिमाण ये सब सामान कम करने के प्रेरक एवं राग द्वेष कम करने के सहयोगी हैं । इसी सन्दर्भ में किसी ने कहा की रखता हूँ में बांध के, सच्चाई से अपना सब सामान, कब खाली करना पड़े, भाड़े का मकान । मौत से ज्यादा भयभीत है दुनियां, मौत की आहट से। वर्तमान की समस्या से अधिक चिंतित है आने वाले कल से।</p>
<p>कमोबेश हर प्राणी की यही कहानी है यही हकीकत है । हम सच्चाई को आत्मसात कर सकें इसकी बङी जरूरत है। जो समय का मूल्य नहीं जानते उनके सपने कभी भी अधूरे ही रह जाते है।फिर भी इस सच्चाई को हम समय रहते कहाँ समझ पाते हैं? टीवी हो या मोबाइल जकङे हुए हैं हम अत्याधिक इनके मकड़जाल मे इसीलिए नैसर्गिक-आनन्द पाने को हम तरसते ही रह जाते हैं। जीवन का प्रयोजन आज का तो ऐसा ही लग रहा है कि बचपन बित्यों बातां में , नींद से काढ़ी रातां में ,आदमी पहले धन कमाने के लिए स्वास्थ्य गँवाता है ।</p>
<p>आगे फिर स्वास्थ्य प्राप्ति के किए धन ख़र्च करता है।और अंततः दोनों गँवा लेता है। शांति और सेहत का कहीं दूर &#8211; दूर तक ठिकाना नही अरे जब तक शरीर में सामर्थ्य है । हमारी इंद्रियाँ परिपूर्ण हैं । मन ऊर्जा से भरा हैं तब तक चित्त से युवा धर्म को साधे यही जीवन की सम्पदा हैं । पर जाने क्यों यह हर पीढ़ी को सोचना है की पैसा ही सब कुछ पर एक सच्चाई यह भी हैं की शोहरतों का पैमाना सिर्फ पैसा नहीं होता है । जो सुख -शांति से जिए वो भी मशहूर होता है । इस व्यस्त जीवन की आपा धापी में जो तनाव ग्रस्त नही होकर अपने मन पर विवेक की लगाम हाथ में रखता है । वह हजारों माईल चलकर भी कभी नहीं थकता है ।</p>
<p>क्योंकि वह इस जीवन की हर चाल को बड़े गौर से निरख कर<br />
इस जीवन की हर सच्चाई को जागरुकता के साथ परखता है ।<br />
सितारे टूटते हैं पर उनके वियोग मे आसमान कब रोता है? आत्मा के सिवाय दूसरा कोई भी अपना सगा नहीं होता है? स्वार्थ की कमजोर दीवारों पर टिके हुए हैं सारे रिश्ते इस सच्चाई के साथ जीने वाला हताशा का भार नहीं ढोता है। अपने सुख-दुःख के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी है। आप्त पुरूषों ने हमें यह बात हमेशा ही समझायी है। हमारी ज्ञान चेतना आवृत है कर्मों के सघन आवरण से इसलिए हम देख नहीं पाते उसे जो यथार्थ है सच्चाई है। जो भीड़ मे भी स्वयं मे रहने की कला जानता है ।वही सच्चाई को गहराई के साथ पहचानता है ।</p>
<p>अंधेरा दस्तक नही देता है उसके घर आंगन मे जो खुद चिराग बन करके जलना जानता है । जो स्वयं के लिए जले वो दुनिया को भी रोशन कर गये । अनुभव की स्याही से इतिहास मे नूतन प्राण भर गये ।जो भीड़ मे केवल भीड़ का हिस्सा बन कर जीये वो तिनको की तरह अपना वजूद मिटा कर बिखर गये ।सच्चाई हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर है ।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>ARTICLE : जनजातीय गौरव को सहेजने की जरुरत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Nov 2023 03:14:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[जनजाति समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जनजातीय गौरव]]></category>
		<category><![CDATA[लोक परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[सहेजने की जरुरत]]></category>
		<category><![CDATA[सांस्कृतिक धरोहर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK  देश के पूर्वोत्तर राज्य असम, मणिपुर, मेघालय अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK </strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400">देश के पूर्वोत्तर राज्य असम, मणिपुर, मेघालय अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपरा व जीवंतता के लिए सुविख्यात हैं। इनकी लोकपरंपरा, लोकरंग और जीवन माधुर्य भारतीयता के माथे पर रत्नजड़ित मुकुट है। स्वर्णिम आभायुक्त ये सभी राज्य भारतीयता की सहज अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक बोध की विविधता की ऐतिहासिक धरोहरों को संजाऐ हुए हैं। ये राज्य इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि जनजाति प्रधान हैं और इनकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा भारत राष्ट्र की विविधता के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करता है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">इन राज्यों में खासी, गारो, सूमी, कुकी, देवरी, भूटिया, बोडो, अंगामी और अपतानी जजजातियां विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों का आज भी निर्वहन करते हैं। इन जनजातियों की भाषा, कला, परंपरा, और त्यौहार मानवीय मूल्यों समृद्ध, उदात्त और प्रकृति के सापेक्ष और एकरसता से परिपूर्ण हैं। इस समवेत क्षेत्र में 200 से अधिक भाषाएं एवं उपभाषाएं बोली जाती हैं और चार सैकड़ा से अधिक जनजातीय समुदाय इस पूर्वोत्तर के उपवन को गुलजार करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत के कुल क्षेत्रफल का तकरीबन 8 प्रतिशत वाला यह क्षेत्र इतना वैविध्यपूर्ण और छटाओं से भरपूर है कि अगर इसे भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">विविध किस्म की वनस्पति से आच्छादित यह क्षेत्र नैसर्गिक सुंदरता को धारण किए हुए जनजातीय समाज की सांस्कृतिक सुंदरता, सहजता और पवित्रता को प्रतिध्वनित करता है। यह भूमि जितना सहज व सुंदर हैं उतना ही धर्म व आध्यात्म से परिपूर्ण मानवतावादी भी। यहां के जनजातीय समुदाय के लोगों का मौलिक धर्म प्रकृतिपूजा है। प्रकृति का हर अवयव इनके लिए पूजनीय और आराध्य है। आधुनिकता की चरम पराकाष्ठा के बावजूद भी जनजातीय समाज आज भी नदी, सूर्य, चंद्रमा, पर्वत, पठार, पृथ्वी, झील और वन की उदारता व सहजता से पूजा करता है। इनका ईश्वर प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। जनजातीय समुदाय आज भी पारंपरिक विधि व निषेध का दृढ़ता व सहजता से पालन करते हैं। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">उसका मूल कारण अपनी सांस्कृतिक के प्रति अदम्य निष्ठा और विश्वास है। यहीं कारण है कि अन्य राज्यों की तरह आज भी पूर्वोत्तर में पर आधुनिकता का विकृत रुप अपना असर नहीं छोड़ पाया है। यहां अब भी लोक संगीत ही जीवन को रसों से सराबोर करती है। यहां के लोक उत्सवों में क्षेत्रीय संस्कृति की जीवंतता परंपरागत रुप से स्वीकार्य है। जनजातीय समाज की सामाजिक बुनावट में माता की आदरणपूर्ण स्वीकार्यता उनकी ममत्व के प्रति अगाध प्रेम व निष्ठा को तो रेखांकित करता ही है साथ ही समाज में स्त्रियों के प्रति मानवीय वैचारिक संवेदनाओं को एक नया आयाम भी देता है। सच कहें तो इस क्षेत्र में रहने वाला जनजातीय समुदाय कई मामलों में भारत की सोच को एक नया आयाम देता है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">अपनी सांस्कृतिक विरासत, सहज जीवन शैली, अपराजेय मूल्यों, परंपराओं और रस से भारत के चरित्र को गढ़ता है। देखें तो जनजातीय समाज की लोकसंस्कृति में परंपरा और स्थानीयता का मूलभाव रचा बसा है। इसमें लोकगीत, मिथक, उत्सव और त्यौहार उनकी अंतश्चेतना के लय, सूर व ताल को जोड़ता है। यह जुड़ाव न सिर्फ जनजातीय समुदाय की कलात्मक जीवन शैली की विविधता को निरुपित करता है बल्कि इससे भारत राष्ट्र की चारित्रिक विविधता को भी निरुपित करता है। भारत की जनजातीय कला व शिल्प अद्वितीय और अलौकिक प्रतिमानों से भरपूर है। कालीन बनाना, मुखौटे गढ़ना, पेंट किए गए लकड़ी के पात्र बनाना, बांस और बेंत की अद्भुत कलाकारी, मजबूत कांसे की कटोरियां, कानों की बालियां, हार, बाजूबंद, संगीत वाद्य और लकड़ी की नक्काशी का काम इनकी दिनचर्या का हिस्सा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">यह कार्य इनका आर्थिक उपार्जन के साथ-साथ पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। पर एक तथ्य यह भी कि आधुुनिकता के बढ़ते तेज प्रवाह से अब जनजातीय समुदाय भी अछूता नहीं रहा। इसका सकारात्मक और नकारात्मक असद दोनों दिख रहा है। सकारात्मक असर यह है कि जनजातीय समाज मुख्य धारा के साथ जुड़ रहा है वहीं नकारात्मक असर यह कि वह अपनी संस्कृति के मूलतत्वों से दूर हो रहा है। नतीजा यह कि उनमें परसंस्कृति ग्रहण तेज हुआ है जिसके कारण वह दोराहे पर है। न तो वह अपनी संस्कृति बचा पा रहा है और न हीे आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में मजबूत सहभागिता की दिशा में पूरी शिद्दत से शामिल हो रहा है। इस बीच की स्थिति से उसकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैैै। विचार करें तो यह सब कुछ उनके जीवन में बाहरी हस्तक्षेप के कारण हो रहा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">यह तथ्य है कि भारत में ब्रिटिश शासन के समय सबसे पहले जनजातियों के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। ईसाई मिशनरियों ने जनजातयी समुदाय में पहले हिन्दू धर्म के प्रति तिरस्कार और घृणा की भावना पैदा की और फिर उसके बाद उन्हें ईसाई धर्म ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके लिए उन्होंने लालच को अपना हथियार बनाया। नतीजा बड़े पैमाने पर जनजातीय समुदाय का धर्म परिवर्तन शुरु हो गया। लेकिन बिडंबना कि धर्म परिवर्तन के बाद भी उनके जीवन में आमूलचुल परिवर्तन होता नहीं दिखा। ईसाईयत न तो उनकी गरीबी कम कर पायी और न ही उन्हें इतना सशक्त और शिक्षित बनाया कि वे स्वावलंबी होकर अपने समाज का भला कर सकें। हां, इतना जरुर हो गया कि अब उनके लिए अपनी संस्कृति के मूलतत्वों को सहेजना मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हो गया है। ईसाईयत ने जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट-विनष्ट कर दिया है। ईसाईयत के बढ़ते प्रभाव ने उनकी मौलिक संस्कृति, नैसर्गिक चेतना व चिंतन और आध्यात्मिक परंपरा को क्षति पहुंचा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> ईसाईयत और हिन्दू धर्म के प्रभाव के कारण जनजातियों में जाति व्यवस्था के तत्व विकसित हुए हैं। देखें तो आज उनमें भी जातिगत विभाजन के समान ऊंच-नीच का एक स्पष्ट संस्तरण विकसित हो चुका है, जो उनके बीच अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षो और तनावों को जन्म दे रहा है। इससे जनजातियों की परंपरागत सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और सामुदायिकता खतरे में पड़ती जा रही है। आज स्थिति यह है कि धर्म परिवर्तन के कारण बहुत से जनजातियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा हैं। हिन्दुओं में खान-पान ,विवाह और सामाजिक संपर्क इत्यादि के प्रतिबंधो के कारण वे उच्च हिन्दू जातियों से पूर्णतया पृथक हैं। जबकि ईसाईयों ने भी धर्म परिवर्तन करके हिन्दू बन जाने वाले जनजातियों को अपने समूह में अधिक धुलने मिलने नहीं दिया। विवाह और सामाजिक संपर्क के क्षेत्र में उन्हें अब भी एक पृथक समूह के रुप में देखा जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> अनेक जनजातियां संस्कृतिकरण के दुष्परिणाम को न समझते हुए उन्हीं समूहों की भाषा बोलने लगी हैं जिनकी संस्कृति को स्वीकार किया। जनजातियों में कितने ही व्यक्ति अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा के रुप में स्वीकार कर अपनी मूलभाषा और संस्कृति का परित्याग कर चुके हैं। यह तथ्य है कि प्रत्येक समूह की भाषा में उसके प्रतीकों को व्यक्त करने की क्षमता होती है और यदि भाषा में परिवर्तन हो जाय तो समूहों के मूल्यों और उपयोगी व्यवहारों में भी परिवर्तन होने लगता है। जनजातीय समुदाय के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जनजातीय समूहों में उनकी परंपरागत भाषा से संबधित सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्श नियमों का क्षरण होने से आज जनजातीय समुदाय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। भारत भाषायी विविधता से समृद्ध देश है लिहाजा जनजातीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं का विशेष संरक्षण जरुरी है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">जनजातियों की संस्कृति पर दूसरा हमला कारपोरेट जगत और सरकार की मिलीभगत के कारण हो रहा है। जंगल को अपनी मातृभूमि समझने वाले जनजातियों के इस आशियाने को उजाड़ने का जिम्मा खुद सरकारों ने उठा लिया है। जंगलो को काटकर और जलाकर उस भूमि को जिस प्रायाजित तरीके से उद्योग समूहों को सौंपा जा रहा है, उसका भी प्रभाव जनजातीय संस्कृति पर देखने को मिल रहा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘द स्टेट आफ द वल्र्डस इंडीजीनस पीपुल्स’ नामक रिपोर्ट में कहा गया कि मूलवंशी और आदिम जनजातियां भारत समेत संपूर्ण विश्व में अपनी संपदा, संसाधन और जमीन से वंचित व विस्थापित होकर विलुप्त होने के कगार पर है। विस्थापन के कारण उनमें गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी बढ़ रही है और साथ ही उनकी संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। </span></p>
<p style="text-align: center">
<p><span style="font-weight: 400">    </span><span style="font-weight: 400">    </span><span style="font-weight: 400">    </span><span style="font-weight: 400">    </span><span style="font-weight: 400">    </span><span style="font-weight: 400">    </span></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>बारुद के ढ़ेर पर पाकिस्तान&#8230;&#8230;.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Nov 2023 13:45:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[Terrier]]></category>
		<category><![CDATA[तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी)]]></category>
		<category><![CDATA[पाकिस्तान]]></category>
		<category><![CDATA[बारूद]]></category>
		<category><![CDATA[लश्कर-ए-झंगवी]]></category>
		<category><![CDATA[हक्कानी नेटवर्क]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK  आतंकवाद को प्रश्रय देने का नतीजा है कि पाकिस्तान को बार-बार...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK </strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400">आतंकवाद को प्रश्रय देने का नतीजा है कि पाकिस्तान को बार-बार खून के आंसू रोना पड़ रहा है। उसकी धरती बार-बार लहूलुहान हो रही है और आतंकियों के आगे उसकी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई घुटने के बल पर है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से संबंद्ध तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान के आतंकियों ने पंजाब प्रांत के मियांवाली के </span>ट्रेनिंग <span style="font-weight: 400">बेस पर हमला कर फिर साबित किया है कि बारुद के ढ़ेर पर बैठे पाकिस्तान को कभी भी तबाह कर सकते हैं। इस हमले में तीन विमान नष्ट हुए हैं और करोडों की संपत्ति का नुकसान हुआ है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> हालांकि हमले में शामिल सभी आतंकी मार गिराए गए हैं फिर भी पाकिस्तान खौफजदा है। इसलिए कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकी पहले भी पाकिस्तानी एयरबेस को निशाना बना चुके हैं। याद होगा 2015 में इन्हीं टीटीपी के आतंकियों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर के निकट एयरफोर्स बेस बादाबेर पर हमला कर वायुसेना के 23 कर्मियों समेत कुल 42 लोगों की जान ली थी। तब टीटीपी के आतंकियों ने पाकिस्तानी दावे से इतर 50 सुरक्षाकर्मियों को मार गिराने का दावा किया था। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">टीटीपी के आतंकियों ने यह हमला पाकिस्तानी सेना द्वारा वजीरिस्तान में आतंकियों के सफाए के लिए चलाए जा रहे जर्ब-ए-अज्ब अभियान से नाराज होकर किया था। उस दरम्यान पाकिस्तान की सेना ने वजीरिस्तान में 2000 से अधिक आतंकियों को मार गिराया था। बदले की कार्रवाई के तौर पर टीटीपी के आतंकियों ने अटारी-बाघा सीमा पर बीटिंग रिट्रीट समारोह के दौरान भीषण आत्मघाती हमलाकर 60 लोगों की जान ली। टीटीपी ने दो कहा था कि यह हमला नार्थ वजीरिस्तान और खैबर इलाकों में सैन्य कार्रवाई का बदला है। उल्लेखनीय है कि टीटीपी पहले ही एलान कर चुका है कि वह जेहाद में इस्लामिक स्टेट के साथ है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">मतलब साफ है कि टीटीपी और इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान को बर्बाद करने का बीड़ा उठा रखे हैं। मई, 2011 में भी आतंकियों ने कराची के एयरबेस से जुड़े नौ सैन्य अड्डा पीएनएस मेहरान पर हमला कर पाकिस्तान के दो युद्धक विमानों समेत चार इंजन वाला अमेरिकी विमान पी-3 सीएन आरियान को उड़ा दिया था। यह हमला उस समय हुआ था जब पाकिस्तान की धरती पर अमेरिका द्वारा ओसामा-बिन-लादेन को मार गिराए जाने के बाद हाई अलर्ट घोषित था। 2016 में टीटीपी से जुड़े समूह जमातुल अहरार के एक आत्मघाती हमलावर ने गुलशन-ए-इकबाल पार्क में ईस्टर मना रहे 70 से अधिक लोगों की जान ली। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">टीटीपी ने कहा कि यह हमला पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज कादरी को दी गयी फांसी का जवाब है। 16 दिसंबर, 2014 को भी टीटीपी के आतंकियों ने पेशावर के सैनिक स्कूल में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर 150 से अधिक निर्दोष छात्रों की जान ली। उस समय भी उन्होंने कहा कि यह हमला जिहादियों के परिवारों पर हमले का जवाब है। मतलब साफ है कि टीटीपी ने पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इन हमलों से साफ है कि पाकिस्तान में निर्वाचित सरकारों की नहीं बल्कि उन आतंकी संगठनों की चलती है जिनका मकसद पाकिस्तान में शरिया का राज कायम करना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> इन हमलों से पाकिस्तान को अहसास हो जाना चाहिए कि सांप को दूध पिलाना कितना महंगा और खतरनाक साबित होता है। यह हमला न सिर्फ पाकिस्तानी सरकार और सेना को चुनौती भर है बल्कि इस बात का भी संकेत है कि अगर पाकिस्तान ‘गुड और बैड टेररिज्म’ के खोल से बाहर नहीं निकला तो वह दिन दूर नहीं जब उसका वजूद समाप्त नजर आएगा। यह सच्चाई भी है कि आज पाकिस्तान के 65 फीसदी भू-भाग पर आतंकी समूहों का कब्जा है। कौन नहीं जानता है कि पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई जैश-ए-मुहम्मद और जमात-उद-दावा जैसे कई संगठनों को खुलकर प्रश्रय देती है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">भारत का मोस्ट वांटेड अपराधी दाऊद इब्राहिम करांची, इस्लामाबाद और पश्चिमोत्तर प्रांत को अपनी शरणस्थली बनाए हुए है। हाफिज सईद सरीखे आतंकी भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में पाकिस्तान के मुख्य कर्ता-धर्ता हंै। पाकिस्तान की सरकार और सेना के समर्थन-सहयोग से ही उसके संगठन ने 2001 में भारतीय संसद और 2008 में मुंबई हमले को अंजाम दिया था। इस हमले में 166 लोग मारे गए थे। भारत ने पाकिस्तान को हाफिज सईद की मुंबई हमले में संलिप्तता के ढ़ेरों सबूत उपलब्ध कराए थे। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">लेकिन पाकिस्तान मानने को तैयार ही नहीं कि इसमें हाफिज सईद की संलिप्तता रही है। जबकि पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली द्वारा अमेरिकी अदालत में स्वीकारा जा चुका है कि 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए हमले की साजिशकर्ताओं में आईएसआई, उसके संचालक मेजर इकबाल और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आतंकियों से गठजोड़ के कारण ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को टेररिस्तान कहा। लेकिन पाकिस्तान सुधरने को तैयार नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> फिलहाल दुनिया भी मान चुकी है कि पाकिस्तान एक टेररिस्तान देश है। याद होगा गत वर्ष पहले अमेरिकी गृहमंत्रालय की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान को उन देशों में शामिल किया गया, जहां आतंकियों को सुरक्षित पनाह दी जाती हैं। कंट्री रिपोर्ट आॅन टेररिज्म के नाम से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने लश्करे तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। ये सभी संगठन पाकिस्तान से संचालित होते हैं और यहीं पर उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों को फंडिंग करता है। गत वर्ष पहले अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक रिपोर्ट से भी उद्घाटित हुआ कि पाकिस्तान के संघ प्रशासित कबायली क्षेत्र (फाटा), पूर्वोत्तर खैबर पख्तुनवा और दक्षिण-पश्चिम ब्लूचिस्तान क्षेत्र में कई आतंकी संगठन पनाह लिए हुए हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> रिपोर्ट के मुताबिक हक्कानी नेटवर्क, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झंगवी और अफगान तालिबान जैसे अन्य आतंकी समूह पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र में अपनी गतिविधियों की योजना के लिए इन पनाहगाहों का फायदा उठाते हैं। गौर करें तो पाकिस्तान में आतंकियों की बढ़ती ताकत सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व बिरादरी के लिए खतरनाक है। इसलिए और कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है और उसके पास सैकड़ों परमाणु बम हैं। उसके पास भयंकर आयुधों का जखीरा भी है। पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठानों पर बार-बार हो रहे आतंकी हमले से सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं आतंकी जमात पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को हासिल करने की फिराक में तो नहीं है? इससे इंकार नहीं किया जा सकता। याद होगा गत वर्ष पहले उद्घाटित हुआ था कि अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में लेने के लिए किसी आपात योजना पर काम कर रहा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">मई 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति के पूर्व सलाहकार जैक करावेल्ली ने बीबीसी-5 को दिए एक साक्षात्कार में कहा भी था कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और सामग्री को कब्जे में लेने की गुप्त योजना मौजूद है। लेकिन इस योजना में कितनी सच्चाई है यह कह पाना अभी मुश्किल है। लेकिन एक बात आइने की तरह साफ हो चुकी है कि पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने और स्वयं प्रभावित होने वाले देशों की कतार में शीर्ष पर है। उसकी स्थिति इराक, सीरिया और लेबनान से भी बदतर होती जा रही है। अमेरिकी संगठन स्टार्ट की मानें तो पाकिस्तान में इराक से भी अधिक हमले हो चुके हैं। देखा जाए तो इस हालात के लिए स्वयं पाकिस्तान जिम्मेदार है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">इसलिए कि वह अपनी धरती को आतंकियों का सबसे सुरक्षित पनाहगाह बना चुका है। तथ्य यह भी कि विदेशी संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक मदद को वह अपने विकास कार्यों पर खर्च करने के बजाए भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों पर खर्च करता है। मजेदार तथ्य यह कि पिछले तीन दशक से उसके हुक्मरान दहशतगर्दी को नेस्तनाबूद करने का राग अलाप रहे हैं। लेकिन हालात सुधरने के बजाए बिगड़ते जा रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तानी हुक्मरानों की रीति-नीति दोगली और आंख में धूल झोंकने वाली है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">पाकिस्तान की यह दलील उचित नहीं कि वह भी आतंकवाद से पीड़ित है। अभी भी उसके पास वक्त है कि वह अपनी धरती पर आतंकवाद को न फलने-फूलने दे। अन्यथा उसे बार-बार खून के आंसू रोने के लिए तैयार रहना होगा।   </span></p>
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		<title>SPECIAL ARTICLE ___ राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के तीन दशक का योगदान उल्लेखनीय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Oct 2023 09:22:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[SPECIAL ARTICLE]]></category>
		<category><![CDATA[एनएचआरआईएस]]></category>
		<category><![CDATA[तीन दशक का योगदान]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग]]></category>
		<category><![CDATA[स्थापना दिवस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; PRESENTED BY  PRO. KANHAIYA TRIPATHI  राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना 1993 में हुई....</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY </strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRO. KANHAIYA TRIPATHI </strong></span></p>
<p>राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना 1993 में हुई. आयोग की स्थापना के बाद 30 वर्ष बीत गए हैं. 30 वर्षों का इतिहास बहुत ही स्वर्णिम और ऐतिहासिक रहा है. इसके पहले चेयरपर्सन न्यायमूर्ति  रंगनाथ मिश्र हुए और अब इसका नेतृत्व कर रहे हैं न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा. अपने इतने वर्षों के कार्य निष्पादन में आयोग की प्रतिष्ठा बढ़ी है. अब आयोग संयुक्त राष्ट्र मानव अधकारों के सार्वभौम घोषणापत्र के 75वें वर्ष में भारत में अनेक सुधर करके मानव अधिकारों को आमजन तक पहुंचा देना चाहता है. मानव अधिकारों के बारे में यद्यपि अभी भी भारत में पूरी आबादी के भीतर जागरूकता नहीं है जिससे भारत के सभी क्षेत्रों में मानव अधिकारों को अभी तक समझ नहीं पाए हैं, यह एक सचाई है. भारत में आयोग की मंशा यह है कि हम सभी तक पहुँच बनायेंगे और इसके लिए यह कोशिश उसकी है कि अपनी प्रतिबद्धता कभी भी प्रश्नांकित न हो.</p>
<p>भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता बहुत सी चुनौतियों के साथ संवाहित है. हमारे देश में गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य संबंधी खतरे और कोविड महामारी से भी सरकारें समय-समय पर निपटती रही हैं. इसलिए देश ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे और आम आदमी इसमें अपने मानव अधिकारों को समुचित पा न सका लेकिन इन सभी समस्याओं ने जब-जब जन्म लिया हमारे देश का राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अपने नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा के लिए आगे बढ़कर कार्य किया. भारतीय नागरिकों की दैनिक जीवनचर्या और जीवन आनंद को समन्वित करने का प्रयास किया ताकि सभी पूर्णतया भारतीय संविधान के मूल्यों के साथ जी सकें.</p>
<p>30 वर्षों का समय बहुत ज्यादा नहीं होता है लेकिन कठिनाई का एक क्षण भी बहुत भारी हो जाता है, कठिनाई के समय में आम नागरिक यह चाहता है कि उसकी कोई सुन ले. उसको कोई संरक्षण प्रदान कर दे. आम नागरिक बहुत बड़ी इच्छाएं नहीं रखता अपितु वह बस अपना जीवन बचाना चाहता है और यह चाहता है कि उसको सम्मान प्राप्त हो. भारत में कृषि और जलवायु के संकट के कारण खेत-खलिहान का किसान हो, नौकरी पेशे वाला हो, कामकाजी वर्ग हो या पर्याप्त आत्मनिर्भर लोग, सभी इसी सम्मान को चाहते हैं. इसलिए भारत का हर नागरिक एक-दो टाइम भूखे रह लेगा लेकिन उसकी प्रतिष्ठा उसको अधिक प्रिय है. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से उसकी यह अपेक्षा होती है कि वह उसकी इस प्रतिष्ठा को कभी भी कम न होने दे. भारत में गरिमा ही मानवाधिकार है. भारत में स्वतंत्रता ही मानवाधिकार है. भारत में आत्मनिर्भरता ही मानवाधिकार है. अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने समय-समय पर इसके लिए अपनी अनेक योजनाओं को बनाया और भारत के नागरिकों तक उन योजनाओं की पहुँच बनायीं.</p>
<p>रैगिंग से जूझते बच्चे, गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष अवकाश के प्रश्न, थर्ड जेंडर से जुड़े मसले, जलवायु समस्याएं और कोविड जैसी महामारी पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने पर्याप्त कार्य किया है, परामर्श दिया है. हाल ही में संपन्न एशिया प्रशांत संम्मेलन दिल्ली में हुआ तो उसमें सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, व्यवसाय, स्वास्थ्य देखभाल, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं और सीमाओं के पार होने वाले अपराधों के विषय में आयोग की पर्याप्त चर्चा वैश्विक स्तर पर उसकी चिंताओं को दर्शाती है. चेयरपर्सन न्यायमूर्ति अरुण मिश्र और डॉ. ज्ञानेश्वर मुले व डॉ. राजीव जैन माननीय आयोग के सदस्य, एनएचआरआईएस के एशिया प्रशांत फोरम के अध्यक्ष डू-ह्वान सोंग और ग्लोबल एलायंस ऑफ ह्यूमन राइट्स इंट्यूशन्स की सचिव  अमीना बौयाच  की उपस्थिति में खुलकर मानवाधिकारवादियों ने अपनी बात रखी और जो दिल्ली घोषणा-पत्र जारी हुआ उससे मानवाधिकार आयोग कितना आमजन से जुड़ा है, कितने विषयों को लेकर चिंतित है, कितने मुद्दों को चुनौती के रूप में देख रहा है, यह सब स्पष्ट होता है. वस्तुतः दुनिया के अनेक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नॉन-परफार्मर भी घोषित किए गए हैं. भारत का राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग सतत अपनी प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर ग्रेड ए के साथ कार्य कर रहा है.</p>
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<p>अपनी 30 वर्षों की सतत यात्रा के दौरान राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 22 लाख से अधिक मामलों का निपटाया है. मानव अधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को 230 करोड़ रुपये से अधिक की राहत दिलाई है. विभिन्न घटना स्&#x200d;थलों की जांच, खुली जन सुनवाई और शिविर बैठकें आयोजित की हैं. असंख्य बिलों और कानूनों, सम्मेलनों और अनुसंधान परियोजनाओं को गति प्रदान की है. 28 एडवाइजरी, सैकड़ों प्रकाशन, हजारों मीडिया रिपोर्टें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भागीदारियाँ, मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण की दिशा में महनीय कार्य किया है.</p>
<p>आयोग द्वारा जारी 28 एडवाइजरी केवल जारी नहीं हुई हैं, अपितु सच्चे मायने में इसके परिणाम भी देश को देखने को मिलते हैं. इसमें भोजन का अधिकार, स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का अधिकार, अनौपचारिक श्रमिकों के अधिकार, मृतकों की गरिमा को कायम रखना, ट्रक ड्राइवरों के अधिकार, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए एडवाइजरी, कैदियों द्वारा जानबूझकर खुद को कष्ट पहुंचाने और आत्महत्या के प्रयासों को रोकन या कम करने के लिए एडवाइजरी और आँखों संबंधी आघात को रोकने और कम करने के लिए एडवाइजरी, आयोग की ओर से ऐसे प्रयास है जिससे मानव गरिमा को पर्याप्त सहयोग मिला है और मिलेगा. आयोग ने 89,000 से अधिक मामलों का निपटाया पिछले कुछेक साल के समय में और पिछले एक साल में आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 123 मामले को गंभीरता से उठाया यह उपलब्धियां और सहयोग की कहानिया हमें बताती हैं कि आयोग की अपनी प्रतिबद्धता नागरिकों के लिए कितनी अहम् हैं और वह कितनी संजीदगी के साथ काम देश में कर रहा है.</p>
<p>हाल के दिनों में मणिपुर की जातीय हिंसा के मामलों में जब देश में तमाम सवाल उठाये जा रहे थे आयोग ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए मुआवजे का भुगतान करने, मृतकों के परिजनों को क्षतिपूरक रोजगार देने, सद्भाव को बढ़ावा देने, समुदायों को हिंसा का सहारा लेने से रोकने और शांति बनाए रखने का निर्देश दिया. आयोग केवल यह नहीं चाहता कि पहल केवल सरकारी तंत्र से हो बल्कि नागरिक समाज को भी जोड़ने की उसने भरपूर कोशिश की. कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न संबंधी मामले हों, हजारों बेघर व्यक्तियों को सरकारी योजना के तहत मुफ्त आवास प्रदान करने की बात हो, सांप्रदायिक दंगों और आंतरिक संघर्षों के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने का मुद्दा हो, प्राकृतिक आपदाओं, भूमि अधिग्रहण और अन्य कारणों से विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास के मसले हों या कर्ज में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्या के मामले आयोग ने अपनी जिम्मेदारी समझी और यह कोशिश की पीड़ित या प्रभावित जन कैसे लाभान्वित होंगे अपनी गरिमा के साथ, इसको युद्ध स्तर पर लगकर सहयोग देने और संबल देने का काम किया. आयोग के सफलतापूर्वक हस्तक्षेप से अनेकों भारतीय हमारे देश में अपनी जिंदगी, अपनी जीवन आशा को पुनः प्राप्त किये हैं और उनके जीवन में रोशनी आई है.</p>
<p>भारत में अब तक के ऐतिहासिक सहयोग और सद्भावपूर्ण कार्ययोजनाओं से निःसंदेह राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का सम्मान आमजन के मन में बहुत ज्यादा बढ़ा है. अब जबकि हम 75वीं वर्षगाँठ अपने संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकारों के सार्वभौम घोषणा-पत्र की हम मना रहे हैं, आयोग अपने स्थापना वर्ष के 30 वर्ष की सेवा देकर आगे बढ़ रहा है तो हमारे सामने भारतीय आज़ादी के अमृत महोत्सव से आगे बढ़कर 2047 के लिए अधिक सोचने की बारी है. दुनिया में तो दरिद्रता, जलवायु समस्या, आतंकवाद और विघटनकारी और विचलित कर देने वाली घटनाएँ सिर उठा रही हैं, ऐसे में भारत को बहुत ही गरिमामय तरीके से अपने लक्ष्यों को तय करना है और सबसे आगे निकलने की कोशिश करना है.</p>
<p>आयोग अपनी प्रतिबद्धताओं में नवाचार करे. आयोग आदिवासी समाज और अंतिम जन तक अपनी पहुँच बनाए, यह आज योग की जिम्मेदारी बन गयी है. निःसंदेह भारत के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के चेयरपर्सन न्यायमूर्ति मिश्र और माननीय सदस्य व महासचिव व पूरा आयोग परिवार क्रमशः सक्रिय होकर अपने विभिन्न मंचों से उस लक्ष्य को हासिल करने कि कोशिश कर रहा है जो महात्मा गाँधी जी सपना था लेकिन इसमें और यदि सक्रियता और गतिशीलता आई तो हमारे भारत की प्रगति कि गति बढ़ जाएगी. भारत वैश्विक स्तर पर अपने कल्याणकारी राज्य होने का दावा सिर्फ नहीं करेगा बल्कि पूरी दुनिया इसकी प्रशंसा करेगी. इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि भारत में आयोग आने वाले समय में चेंजमेकर की भूमिका में आए और भारत की छवि को समृद्धि प्रदान करे.</p>
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<p><span style="color: #00ffff"><strong>लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं। आप केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में चेयर प्रोफेसर, अहिंसा आयोग व अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं।</strong></span></p>
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