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	<title>(QUICK NOTE ) Archives - Lok Dastak</title>
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	<description>Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, Breaking News in Hindi.Lok Dastak</description>
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	<title>(QUICK NOTE ) Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>QUICK NOTE : प्रियंका गांधी (PRIYANKA GANDHI) : 25 साल प्रचार, अब उम्मीदवार..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Oct 2024 17:09:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[(QUICK NOTE )]]></category>
		<category><![CDATA[25 years of campaigning]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY GAURAV AWASTHI राजनीति की &#8216;स्टार&#8217; प्रियंका गांधी कुछ ही वर्षों से कांग्रेस महासचिव...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY GAURAV AWASTHI</strong></span></p>
<p>राजनीति की &#8216;स्टार&#8217; प्रियंका गांधी कुछ ही वर्षों से कांग्रेस महासचिव है। पहले UP की प्रभारी भी रहीं। पार्टी में इस पद के पहले उनकी शुद्ध भूमिका प्रचारक की रही। पापा (पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी) के साथ अमेठी में राजनीति का ककहरा सीखा। मां सोनिया गांधी और पापा के बालसखा कैप्टन सतीश शर्मा के प्रचार की कमान संभाल कर व्यवहारिक पाठ पढ़ा। लगातार जीत का इतिहास गढ़ा। भाई राहुल गांधी के साथ विपक्ष में जीवन को कढ़ा।</p>
<p>ढाई दशक तक केवल और केवल परिवार और पार्टी के लिए पसीना बहाते हुए प्रियंका गांधी अब राजनीति के उस मुकाम पर पहुंच रही हैं जो हर राजनीतिक का सपना होता है। वह चाहती तो कभी का इस मुकाम पर पहुंच चुकी होतीं लेकिन परिवार की मर्यादा तोड़ी न छोड़ी। सिर्फ मां, भाई और विरासत में मिली पार्टी की सेवा ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य रहा।</p>
<p>हाँ! इन 25 वर्षों के प्रचार अभियान कभी मनमुताबिक मां और भाई को वोट न मिलने पर प्रियंका कार्यकर्ताओं नेताओं से नाराज भी हुई और अच्छा रिजल्ट आने पर सबकी तारीफ में भी कोई कमी नहीं की। यह उनका अपना स्टाइल है। पब्लिक से भावनात्मक और मुद्दे के रूप में &#8216;कनेक्ट&#8217; करना जितना वह जानती हैं, उतना शायद ही कोई और नेता जानता हो।</p>
<p>सोनिया गांधी के 20 वर्षों के कार्यकाल में हमने उनकी यह खूबी बहुत नजदीक से देखी है। एक अवसर तो ऐसा भी आया जब प्रियंका गांधी ने हम जैसे सामान्य पत्रकार को भी व्यक्तिगत रूप से जीत दिलाने में श्रेय देते हुए हाथ जोड़ दिए। ऐसा केवल हमारे साथ ही हो ऐसा भी नहीं। उन्होंने मां और भाई के चुनाव क्षेत्र में हर छोटे बड़े आम और खास सबका ख्याल रखा।</p>
<p>इस सबसे मौका मिला तो बेटे रेहान और बेटी मिराया को राजनीति का थ्योरिकल और प्रैक्टिकल की परंपरा भी निभाई। आज भले प्रियंका गांधी के दोनों बच्चे बड़े हो गए हो आज नॉमिनेशंस के वक्त रेहान उनके बगल में बैठे भी दिखाई पड़े। ऐसे मौके पर उस वक्त को भी याद करना जरूरी है जब रेहान और मिराया छोटे ही थे।</p>
<p>वह 2006 का उपचुनाव था। हम तब रायबरेली में &#8216;हिंदुस्तान&#8217; हिंदी को सेवाएं दे रहे थे। दोहरे लाभ के पद के इल्जाम से आहत सोनिया गांधी संसद से इस्तीफा देकर रायबरेली से उपचुनाव लड़ रही थीं। प्रियंका गांधी पहले की तरह ही प्रचार कमान संभाले हुए थी। प्रचार के अंतिम दिनों में पति रॉबर्ट वाड्रा, रेहान और मिराया शहर के ही एक प्रतिष्ठित परिवार के बंगलानुमा घर में रुकी थीं।</p>
<p>वोटिंग खत्म होने के समय देश और दुनिया का मीडिया रायबरेली के राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान में प्रियंका गांधी के लिए प्रतीक्षारत था लेकिन प्रियंका को दोनों बच्चों की जिम्मेदारी याद आई और बजाए मीडिया को बयान देने के वह रिक्शे पर दोनों को घुमाने निकल पड़ी। प्रियंका गांधी की वह एक्सक्लूसिव फोटो तब केवल &#8216;हिंदुस्तान&#8217; के पास ही थी।</p>
<p>उस फोटो के लिए बड़े-बड़े मीडिया हाउस के पत्रकार तब हमसे वैसे ही मिन्नते कर रहे थे, जैसे कोई भूखा भोजन के लिए करे। य़ह बोलती फोटो हिन्दुस्तान और HT दोनों में Page-1 पर छपी भी थी।</p>
<p>ढाई दशक तक परिवार के सदस्यों के लिए प्रचार के बाद आज 52 वर्ष की उम्र में उनके जीवन में उम्मीदवार बनने का पहला अवसर वाया वायनाड आया। वायनाड में भी उन्होंने अपने शब्दों का वही जादू चलाया जो रायबरेली अमेठी में अक्सर चलाती रही हैं।</p>
<p>यह पहली दफा होगा कि अब तक माँ, भाई और पापा के बाल सखा के लिए वोट मांगती रहीं प्रियंका गांधी अब अपने लिए वायनाड में वोट मांगती हुई नजर आएंगी..। वायनाड वालों का यह भाग्य है कि उनको प्रियंका गांधी जैसी जनप्रतिनिधि मिलने जा रहीं हैं, जो केवल क्षेत्र की नहीं पूरे देश और विश्व के मुद्दों पर अपनी राय और सुझाव सर्वोच्च सदन में अधिकार पूर्वक रख सकती हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>QUICK NOTE  स्मृति ईरानी : राहुल-राहुल रटते-रटते छूटी रे अमेठिया !</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jun 2024 12:14:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[(QUICK NOTE )]]></category>
		<category><![CDATA[अमेठी]]></category>
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		<category><![CDATA[चुनाव ' Lokasabha Election 2024]]></category>
		<category><![CDATA[टिप्पणी]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक]]></category>
		<category><![CDATA[राहुल गांधी]]></category>
		<category><![CDATA[स्मृति इरानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY GAURAV AWASTHI 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी में आखिर वही हुआ जो...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000">PRESENTED</span><span style="color: #ff0000"> BY GAURAV AWASTHI</span></strong></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-18502 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/04/IMG-20240425-WA0818-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी में आखिर वही हुआ जो होना था। भाजपा की दमदार उम्मीदवार केंद्रीय मंत्री और अमेठी की संसद स्मृति ईरानी को पराजय का स्वाद गांधी परिवार के उस करीबी किशोरी लाल शर्मा से चखना पड़ा, जिन्हें उम्मीदवार बनाए जाने के बाद उन्होंने गांधी परिवार का &#8216;चपरासी&#8217; कहा था। उनके इस बड़बोलेपन का जवाब जनता ने ईवीएम का बटन दबा कर दिया। उन्होंने राहुल गांधी को 2019 के चुनाव में जितने वोटो से हराया था उससे दोगुनी से ज्यादा वोटो से गांधी परिवार के करीबी किशोरी लाल शर्मा ने उन्हें परास्त कर दिया।</p>
<p>चुनाव परिणाम जानने के बाद लोगों की जिज्ञासा अब यह जानने में हो गई है कि अमेठी में आखिर ऐसा चमत्कार हुआ तो कैसे हुआ? इसके एक नहीं अनेक कारण माने और गिनाए जा सकते हैं। पहले तो यह कि स्मृति ईरानी को यह अंदाज नहीं था कि राहुल गांधी अमेठी छोड़ देंगे। इसीलिए वह अमेठी में अपने काम गिनाने के बजाय 5 साल तक गांधी परिवार और खास तौर से राहुल गांधी को कोसने में ही लगी रहीं। अमेठी के लोगों में इसीसे उनकी नकारात्मक छवि बनी और चुनाव आते-आते यह नकारात्मक छवि नाराजगी में तब्दील हो गई। वोटरों के इस नाराजगी को ईरानी और उनके प्रबंधक आखिर तक पहचान ही नहीं पाए।</p>
<p>मतदान के पहले और मतदान के बाद भी ईरानी के लोगों की मनमानी जारी रही। किशोरी लाल शर्मा समेत कई लोगों पर दबाव बनाकर एफआईआर दर्ज कराई गईं। इनमें दो तो यूट्यूबर थे। दरअसल गांधी परिवार को पढ़ने में उनसे यहीं चूक हो गई। चुनाव दर चुनाव दुर्दशा के बावजूद गांधी परिवार देश का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार आज भी माना ही जाता है। गांधी परिवार को हल्के में लेना स्मृति ईरानी की रणनीतिक भूल रही। गांधी परिवार ने 40 साल से रायबरेली-अमेठी के लोगों के अपने माध्यम से सेवा कर रहे किशोरी लाल शर्मा की छवि और काम को आगे करके स्मृति ईरानी को जवाब देने की रणनीति बनाई और प्रियंका गांधी ने उस रणनीति को अपने धुआंधार प्रचार से धार दी।</p>
<p>यह नोट करने वाली बात है कि प्रियंका गांधी ने जितना समय भाई के लिए रायबरेली में दिया उतना ही समय अपने परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी सीट अमेठी में पार्टी प्रत्याशी किशोरी लाल शर्मा के लिए भी दिया।<br />
किशोरी लाल शर्मा ने भी अपने प्रचार के दौरान गांधी परिवार से रिश्तों और विकास की कहानी ही बताई स्मृति ईरानी का एक बार नाम भी नहीं लिया। चुनाव में उनकी अपनी यह रणनीति कारगर रही। मतदाताओं ने उनके इस व्यवहार को पसंद भी किया। प्रियंका गांधी की एग्रेसिव कैंपेनिंग तो काम आई ही साथ ही स्मृति ईरानी की अपनी गलतियां भी उनको पराजय के द्वार तक ले जाने में मददगार बनीं। 2019 में राहुल गांधी को हराने वाली ईरानी मदमस्त हो गई।</p>
<p>संगठन को दरकिनार करके दूसरे दलों के एक वर्ग विशेष के नेताओं को तवज्जो देना भी उनके लिए चुनाव में घातक साबित हुआ। इन बड़े स्थानीय नेताओं से घिरे रहने की वजह से अमेठी के आम लोग उनसे दूर ही होते गए। अमेठी की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान हमने यह खुद महसूस किया कि आम लोग ईरानी से केवल इसलिए नाराज थे कि वह बड़े लोगों को ही पहचानती हैं। उन्हींके घर आती जाती हैं और आम लोगों से उनका कोई वास्ता नहीं। उनके इसी व्यवहार ने भाजपा के कट्टर समर्थकों तक को पार्टी से दूर कर दिया। ऐसा एक बड़ा वर्ग इस बार ईरानी को सबक सिखाने के लिए ही किशोरी लाल शर्मा या कांग्रेस के पक्ष में खुद-ब -खुद चला गया।</p>
<p>ईरानी की हार में उनके प्रतिनिधि विजय गुप्ता भी एक बड़ा कारण बने। विजय गुप्ता का अहंकार ईरानी से भी बड़ा था। अमेठी के लोग तो यह भी कहते हैं कि ईरानी उसी से बात करती थी जिसकी तरफ विजय गुप्ता इशारा करते थे। अमेठी में उनके पतन की एक अन्य वजह गैर सरकारी संगठन &#8216;उत्थान&#8217; भी रहा। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान लोगों और दबी जुबान भाजपा कार्यकर्ताओं ने इस संगठन के बारे में भी जो बातें बताईं, वह अविश्वसनीय लगी लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उन बातों पर गौर करना मजबूरी सा लग रहा है। अमेठी में यह चर्चा आम थी कि ईरानी के सरकारी और सांसद निधि के सारे काम उत्थान संस्था के मार्फत ही होते थे। अब इसमें कितनी सच्चाई है? यह पता करने वाली बात है।</p>
<p>पूरे 5 साल स्मृति ईरानी आम जनता से तो दूर रहीं ही साथ ही अमेठी की उस परंपरा को भी वह नजरअंदाज कर गईं जो गैर गांधी परिवार के उम्मीदवार के लिए घातक साबित होती रही है। यह परंपरा है गैर गांधी परिवार के उम्मीदवार को दोबारा मौका न देने की। आम जनता इस चुनाव में इस इतिहास को डंके की चोट पर इतिहास कह-सुन रही थी लेकिन स्मृति ईरानी और उनके इलेक्शन मैनेजर वह आवाज नहीं सुन पाए। अगर जनता की इस बात को ही ईरानी के मैनेजरों ने गंभीरता से लिया होता तो परिणाम आज ऐसा न होता।</p>
<p>अमेठी की जनता ने गैर गांधी परिवार के राजेंद्र प्रताप सिंह को 1977 कैप्टन सतीश शर्मा को 1996 संजय सिंह को 1998 और स्मृति ईरानी को 2019 में अवसर दिया। इतिहास है कि इन सभी को अमेठी की जनता ने दोबारा जीत का अवसर नहीं दिया। इनमें कैप्टन सतीश शर्मा तो कांग्रेस के ही टिकट पर जीते थे और गांधी परिवार के हनुमान का जाते थे लेकिन जनता ने उन्हें भी दोबारा आम चुनाव में अवसर नहीं दिया।</p>
<p><strong>(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं )</strong></p>
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		<title>त्वरित टिप्पणी (QUICK NOTE ) : सोनिया की भावुक अपील से उठेगी सहानुभूति की लहर !</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Feb 2024 16:02:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[(QUICK NOTE )]]></category>
		<category><![CDATA[कांग्रेस सांसद]]></category>
		<category><![CDATA[त्वरित टिप्पणी]]></category>
		<category><![CDATA[नेहरू-गांधी खानदान]]></category>
		<category><![CDATA[भावुक अपील]]></category>
		<category><![CDATA[सहानुभूति की लहर]]></category>
		<category><![CDATA[सोनिया गांधी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY GAURAV AWASTHI  कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष एवं सांसद सोनिया गांधी द्वारा राजस्थान...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000">PRESENTED BY GAURAV AWASTHI </span></strong></p>
<p>कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष एवं सांसद सोनिया गांधी द्वारा राजस्थान से राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल करने के बाद रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से नेहरू गांधी खानदान की एक और पीढ़ी की विदाई की इबारत लिख गई| पूरी तरह से विदाई के पहले सोनिया गांधी ने रायबरेली वालों के नाम एक भावुक अपील जारी की है|</p>
<p>इस अपील में परिवार के पीढ़ियों पुराने संबंधों की याद दिलाते हुए परिवार के नए सदस्यों का साथ देने का आग्रह भी शामिल है लेकिन सवाल यह है कि क्या इस भावुक अपील से सोनिया गांधी या गांधी परिवार के प्रति रायबरेली में सहानुभूति की लहर अगले चुनाव में उठेगी?</p>
<p>इस अपील में उन्होंने दो दशक के चुनावी सफर में दिए गए सहयोग के प्रति आभार जताते हुए कहा कि रायबरेली से परिवार का रिश्ता कायम रहेगा| पत्र का मजमून है-&#8216; स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र के चलते अगला लोकसभा चुनाव लड़ने में अक्षम हूं| अब रायबरेली की सीधी सेवा का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन मेरा मन रायबरेली में ही रहेगा|</p>
<p>रायबरेली के बिना मेरा परिवार अधूरा है| रायबरेली से पीढ़यों पुराना रिश्ता है| श्वसुर फिरोज गांधी और सास इंदिरा गांधी की तरह ही रायबरेली के लोग चट्टान की तरह मेरे साथ भी खड़े रहे| यह अहसान कभी भूल नहीं सकते| पिछले दो चुनाव में जिस तरह विपरीत परिस्थितियों में आपने हमारा साथ दिया है हमें विश्वास है कि इस तरह परिवार के अन्य सदस्यों को भी अपना प्यार दुलार देते रहेंगे|</p>
<p>इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोनिया गांधी ने अपने ससुर फिरोज गांधी और सास श्रीमती इंदिरा गांधी की तरह ही अपने दो दशक के प्रतिनिधित्व काल में रायबरेली के विकास की चिंता की| इस चिंता का एक आधार यह भी हो सकता है कि दोहरी आए के आप पर संसदीय से इस्तीफा देने के बाद वर्ष 2006 में उपचुनाव में उन्होंने कुल पड़े मतों का 80% वोट हासिल कर इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को भी पीछे छोड़ दिया था|</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-17269" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-709x1024.jpg" alt="" width="640" height="924" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-709x1024.jpg 709w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-208x300.jpg 208w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-768x1110.jpg 768w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-1063x1536.jpg 1063w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511-1024x1479.jpg 1024w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2024/02/20240215_212511.jpg 1068w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>जनता के इस प्यार को उन्होंने विकास के रूप में लौटने की कोशिश भी अपने दो दशक के कार्यकाल में पूरी शिद्दत से की| दो दशक में करीब 15000 करोड़ की परियोजनाएं रायबरेली के लिए मंजूर कराई| रेल कोच कारखाना, रेल पहिया कारखाना, आयुर्विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएफटी), 5-5 राजमार्गों की स्वीकृति, रायबरेली लखनऊ फोरलेन आदि विकास के कार्य सोनिया गांधी की ही देन हैं|</p>
<p>जानने वाले जानते हैं कि सोनिया गांधी रायबरेली में सांसद के रूप में काम गांधी नेहरू-गांधी परिवार की बहू के रूप में में ही ज्यादा आती जाती रहीं| जब तक उनका स्वास्थ्य साथ देता रहा वह अपने लोकसभा क्षेत्र में हर तीन महीने में एक बार भ्रमण के रिवाज को जारी रखे रहीं| बहुत कम मौके ऐसे आए होंगे जब सोनिया को सार्वजनिक सभा में सर पर पल्लू के बिना किसी ने देखा या सुना होगा| उनकी संजीदगी यहां के आम लोगों के दिलों पर राज करती है|</p>
<p>आप लोगों के दुख दुख दर्द को जिस तरह से उन्होंने समझा और उसके निराकरण की कोशिश की, उसका प्रभाव भी यहां देखने को मिलता है लेकिन पिछले चुनाव के बाद से क्षेत्र में न आना विरोधी भाजपा को चुनाव के लिए मुद्दा जरूर देता है| पर्चा दाखिले के बाद से ही स्थानीय भाजपा नेता हमलावर हैं| भाजपा नेता इस पराजय के डर से मैदान छोड़ना कहकर प्रचारित करना शुरू कर चुके हैं|</p>
<p>विरोध को देखते हुए ही इस बात के कयास ज्यादा हैं क्या सोनिया गांधी की भावुक अपील गांधी परिवार के नए उत्तराधिकारी के प्रति सहानुभूति की लहर उठा पाएगी? इसका जवाब कांग्रेस के मीडिया प्रभारी विनय द्विवेदी कहते हैं-&#8216; रायबरेली के लोगों की गांधी परिवार के साथ सहानुभूति पहले भी थी और परिवार की मुखिया सोनिया गांधी की भावुक अपील के बाद सहानुभूति की लहर उठेगी और जरूर उठेगी|</p>
<p>रायबरेली के लोग गांधी परिवार के उत्तराधिकारी को इस तरह हाथों-हाथ लेंगे जिस तरह उन्होंने सोनिया गांधी को दो दशक पहले लिया था|&#8217; अब यह आने वाला लोकसभा चुनाव परिणाम बताएगा कि इस भावुक अपील का असर हुआ या बीजेपी का प्रचार परवान चढ़ा|</p>
<p>&nbsp;</p>
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