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	<title>india Archives - Lok Dastak</title>
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	<description>Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, Breaking News in Hindi.Lok Dastak</description>
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	<title>india Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>India-France Relations : नए क्षितिज पर भारत-फ्रांस संबंध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Feb 2025 17:33:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left"><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK </strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-11283 size-thumbnail" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/05/photo-Arvind-Jaiteelak-1-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते को मिठास से भर दिया है। दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश बढ़ाने के साथ-साथ डिफेंस, सिविल न्यूक्लियर एनर्जी और स्पेस सेक्टर में मिलकर काम करने पर सहमति जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूक्रेन, मध्य-पूर्व एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मौजूदा हालात पर चर्चा के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में त्वरित सुधार पर भी जोर दिया है। दोनों नेताओं ने सीमा पार आतंकवाद समेत सभी प्रकार के आतंकवाद से मिलकर निपटने की प्रतिबद्धता के साथ आतंकवाद के फंडिंग नेटवर्क को भी ध्वस्त करने की प्रतिबद्धता जताई है।</p>
<p>चूंकि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी और टेक्नालॉजी अब नया आयाम ले रही है, इस नाते दोनों देशों ने एआई (आटिफिशियल इंटेलिजेंस) पर अलग से बयान जारी करते हुए वर्ष 2026 को ‘इंडो-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन’ घोषित किया। दोनों देशों ने संकल्प व्यक्त किया है कि वे एक फ्रेमवर्क बनाएंगे जिससे कि ऐसा जनरेटिव एआई विकसित हो जो भेदभाव रहित समानता पर आधारित हो। दोनों देशों ने स्कॉर्पीन सबमरीन निर्माण, मिसाइल हेलिकॉप्टर, जेट इंजन, एडवांस मॉड्यूल रिएक्टर, परमाणु उर्जा एवं शिक्षा के क्षेत्र में मिलकर काम करने के अलावा एकदूसरे को सहयोग का भरोसा दिया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के शहर मासेय में भारत के नए वाणिज्य दूतावास का शुभारंभ किया जिसका कि एक अरसे से जरुरत महसूस की जा रही थी। निःसंदेह इस पहल से दोनों देशों के आर्थिक कारोबार को नई ऊंचाई मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन भारतीय सैनिकों की शहादत को भी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी। प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अब दोनों देश विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों के जरिए एकदूसरे का स्वर बनेंगे। गौर करें तो विगत कुछ वर्षों के दरम्यान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक समझौते हुए हैं जिससे दोनों देशों के सामरिक-आर्थिक क्षेत्र को ऐतिहासिक मजबूती मिली है। इस समय दोनों देश रणनीतिक साझेदारी की 25 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।</p>
<p>अभी गत वर्ष ही दोनों देशों के बीच डिफेंस स्पेस पार्टनरशिप, सैटेलाइट लांच के लिए नए स्पेस इंडियन लिमिटेड और एरियन स्पेस के बीच एमओयू हुए। टाटा और एयरबस स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर 125 हेलीकॉप्टर बनाने पर सहमति बनी। दोनों देश विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य सेवा सहयोग, कृषि समेत पब्लिक एडमिनिस्टेªशन एंड रिफार्म्स के मसले पर भी कंधा जोड़े हुए हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रांे ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भारत के इरादे का समर्थन कर चुके हैं। गौर करें तो रक्षा सहयोग दोनों देशों के संबंधों का आधार है। गत वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस को ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण साझाीदार बताते हुए सुनिश्चित किया कि दोनों देश पनडुब्बी हो या नौसैनिक विमान सभी क्षेत्र में कंधा जोड़ आगे बढ़ने को तैयार हैं। तब दोनों देश ‘भारत-फ्रांस हिंद-प्रशांत रोडमैप’ जारी करते हुए रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक संतुलित और स्थिर व्यवस्था बनाने पर सहमति जाहिर की थी।</p>
<p>गौरतलब है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रीयूनियन द्वीप, न्यूकैलेडोनिया और फ्रेंच पोलिनेशिया जैसे क्षेत्रों में व्यापक उपस्थिति है। इस पहल से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागिरी पर रोक लगेगी। दोनों देशों के बीच कितना मधुर संबंध है इसी से समझा जा सकता है कि फ्रांस ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने देश का सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित कर चुका है। उस समय उन्होंने कहा था कि विश्व इतिहास में एक दिग्गज, भविष्य में एक निर्णायक भूमिका निभाने वाला, रणनीतिक साझेदार एक मित्र का स्वागत करने पर उन्हें गर्व है। याद होगा जब 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था तब उससे नाराज होकर दुनिया के ताकतवर मुल्क भारत पर प्रतिबंध थोपा था। तब फ्रांस ने भारत के साथ कंधा जोड़ते हुए रणनीतिक समझौते को व्यापक आयाम दिया।</p>
<p>फ्रांस लगातार भारतीय सेना को लडाकू जेट व पनडुब्बियों समेत साजो-सामान की आपूर्ति कर रहा है। 2018 के बाद से फ्रांस भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता देश बन चुका है। मौजूदा समय में भारत अपनी कुल रक्षा आयात का तकरीबन 29 फीसदी फ्रांस से करता है। दोनों देशों के बीच बढ़ती निकटता ने कारोबारी, रणनीतिक और सामरिक कुटनीति को नए क्षितिज पर पहुंचा दिया है। दोनों देश एकदूसरे के सैनिक अड्डे का इस्तेमाल और वहां अपने युद्धपोत रखने के अलावा उर्जा, तस्करी, आव्रजन, शिक्षा, रेलवे, पर्यावरण, परमाणु, आतंकवाद और अंतरिक्ष मामलों में मिलकर काम कर रहे हैं। फ्रांस आत्मनिर्भर भारत मुहिम का साझीदार बनने के साथ-साथ 2025 तक बीस हजार भारतीय छात्रों को अपने यहां पढ़ाई का सुअवसर उपलब्ध कराने का एलान कर चुका है। दोनों देशों के बीच यूपीआई को लेकर भी सहमति बन चुकी है।</p>
<p>विगत 25 वर्षों के दरम्यान दोनों देशों के बीच साझेदारी और समझदारी का ही परिणाम है कि आज भारत में विदेशी निवेश के लिहाज से फ्रांस तीसरा सबसे बड़ा निवेशक देश बन चुका है। भारत में 1000 से अधिक फ्रांस की कंपनियां काम कर रही हैं और सभी कंपनियों का संयुक्त टर्नओवर तकरीबन 30 अरब डॉलर से अधिक है। विगत ढ़ाई दशकों में भारत-फ्रांस संबंध को एक नया आयाम मिला है और दोनों देश राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक संबंधों में बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास किए हैं। फ्रांस के नेतृत्व के दृष्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ कुछ द्विपक्षीय बाध्यताओं ने भी दोनों देशों को एकदूसरे के निकट लाया है। यह तथ्य है कि चीन युद्ध के बाद भारत न केवल महाशक्तियों अपितु अफ्रीका व एशियाई देशों से भी अलग-थलग पड़ गया था।</p>
<p>भारत को एक ऐसे देश के प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक था जिससे उसका काई क्षेत्रीय विवाद न रहा हो। इसके अलावा 1962 में भारत व फ्रांस के बीच क्षेत्रों के हस्तांतरण संबंधी संधि के अनुमोदन ने दोनों देशों के संबंधों में मिठास घोला। तथ्य यह भी कि फ्रांस सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारतीय प्रयास का समर्थन करने वाले प्रथम देशों में से एक था। वह आज भी अपने पुराने रुख पर कायम है। दरअसल दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व में कई द्विपक्षीय तथा अंतर्राष्ट्रीय विषयों के संबंध में समान सोच है। हालांकि विदेश नीति के विरोधी अभिमुखन के कारण दोनों देशों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दों पर कई बार विरोधी रुख भी अपनाए हैं। मसलन हिंद-चीन क्षेत्र की स्वतंत्रता मुद्दे पर जहां भारत ने दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र की आजादी की बात पर बल देता है, वहीं फ्रांस लगातार औपनिवेशिक स्थिति बनाए रखने का पक्षधर रहा है।</p>
<p>दोनों देशों ने मोरक्को, तुनीसिया और अल्जीरिया की उपनिवेशिक स्थिति पर विरोधात्मक विचार प्रकट किए। 1956 में मिस्र द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर भी भारत ने बहुत सशक्त रुप से फ्रांस व ब्रिटेन के संयुक्त प्रयास का विरोध किया। इस संयुक्त हस्तक्षेप के विरोध में भारत ने मिस्र का साथ दिया। 1958 में डी गॉल के फ्रांस के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आना शुरु हो गया। 1959 में दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग विकसित करने की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। आर्थिक संबंधों में सुधार के कारण दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की कोशिश की तथा व्यापार के उचित आदान-प्रदान हेतु एक संयुक्त आयोग की स्थापना की।</p>
<p>1973 में फ्रांस के तत्कालीन अर्थव्यवस्था एवं वित्तमंत्री वेलेरी जिसकार्ड जो बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति भी बने, की पहल पर ‘भारत-फ्रांस अध्ययन समूह’ की स्थापना हुई। इस समूह की पहली बैठक फरवरी 1974 में फ्रांस में हुई तथा दूसरी बैठक मार्च 1975 में नई दिल्ली में हुई। इस समूह की सलाह पर दोनों देशों के मध्य समुद्री तेल उत्खनन, शक्ति उत्पादन व वितरण, कोयला उत्खनन व प्रयोग तथा तीसरे देश में संयुक्त उद्यम स्थापित करने संबंधित कई अहम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सबसे महत्वपूर्ण बात जो दोनों देशों के व्यापार में अहम है वह यह कि 1994 के बाद व्यापार संतुलन हमेशा भारत के पक्ष में बना हुआ है।</p>
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		<title>INTERNATIONAL ISSUES : भारत से रिश्ते सुधारना चीन की मजबूरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Oct 2024 03:09:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वर्ड न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK  रुस में ब्रिक्स समिट से ठीक पहले भारत-चीन के बीच ईस्टर्न...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>PRESENTED BY ARVIND JAYTILAK </strong></span></p>
<p>रुस में ब्रिक्स समिट से ठीक पहले भारत-चीन के बीच ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर बनी सहमति दोनों देशों के लिए हितकारी है। दोनों देशों ने इस पर सहमति जताई है कि देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र में जहां गश्त ब्लॉक है वहां सैनिक पीछे हटेंगे और गश्त फिर से शुरु होगी। अर्थात् दोनों देशों की सेनाएं अब अपनी पुरानी पोजिशन पर लौट आएंगी, जैसा कि 2020 से पहले थी। याद होगा 2020 में गलवान में हुई झड़प के बाद से ही दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख और असहज हुए थे। तब गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय जवानों पर हमला दोनों देशों के रिश्ते को दुश्मनी और नफरत में बदल दिया था। इस हमले में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे वहीं चीन को भी अपने 43 जवानों की जिंदगी से हाथ धोना पड़ा था। इस हालात के लिए पूर्ण रुप से चीन ही जिम्मेदार था।</p>
<p>अगर वह 1996 और 2005 में हुए समझौते का पालन किया होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होती। गलवान की घटना के बाद से ही देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र में दोनों देशों ने एकदूसरे की पट्रोलिंग को बंद कर रखा था। अब सहमति के बाद गश्त की प्रक्रिया बहाल होने की राह खुल गई है। गौरतलब है कि गलवान की झड़प के बाद डेपसांग में जिन स्थानों पर भारतीय सैनिक पट्रोलिंग के लिए जाते थे उनमें से कई स्थानों पर चीनी सैनिकों ने रुकावटें पैदा कर दी थी। नतीजतन भारतीय सैनिकों को भी अपना कड़ा रुख अपनाना पड़ा। भारतीय सैनिकों ने उन स्थानों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली जहां चीनी सैनिक पट्रोलिंग के लिए जाते थे। लिहाजा चीनी सैनिकों की भी पट्रोलिंग थम गई।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि ईस्टर्न लद्दाख के पैगोग क्षेत्र, गलवान के पीपी-14, गोगरा और हॉटस्प्रिंग क्षेत्र में अभी भी तनाव बरकरार है। नतीजतन यह क्षेत्र अभी भी बफर जोन बना हुआ है। फिलहाल यहां दोनों देशों के सैनिक पट्रोलिंग नहीं कर रहे हैं। चीन सामरिक रुप से अहम पैंगोंग त्सो झील के निकट एक और नए पुल का निर्माण करने जा रहा है। उसकी मंशा इस पुल के जरिए अपने सामरिक हथियारों को आसानी से भारतीय सीमा तक पहुंचाना है। इसका खुलासा सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से हो चुकी है। चीन की यह साजिश भारत के लिए चिंता का शबब इसलिए है कि यह नया पुल वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से महज 20 किलोमीटर दूर है।</p>
<p>उम्मीद किया जाना चाहिए कि भारत अपनी चिंता चीन से जरुर जताया होगा। चूंकि अब जब दोनों देशों के बीच रिश्तों में जमा बर्फ फिघल रहा है तो उम्मीद किया जाना चाहिए कि बहुत जल्द ही इस क्षेत्र में भी शांति बहाल होगी और दोनों देशों के सैनिक पट्रोलिंग कर सकेंगे। अभी पिछले अगस्त में ही दोनों देशों के वार्ताकारों ने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल अर्थात एलएसी के मसले पर चर्चा की थी। गौर करें तो सीमा विवाद से दोनों देशों के बीच न सिर्फ तनाव की स्थिति उपजती है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचता है। गलवान की घटना के बाद तो चीन को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। याद होगा वर्ष 2021 में देश के करोड़ों खुदरा और थोक व्यापारियों ने चीन से आयातित माल का बहिष्कार करने का एलान कर दिया था।</p>
<p>इस अभियान के तहत व्यापारियों की योजना वर्ष 2021 के अंत तक चीन से आयात बिल एक लाख करोड़ रुपए से घटाना था जिसमें काफी सफलता भी मिली। तब देश के व्यापारियों ने करीब 3000 ऐसी वस्तुओं की सूची बनायी थी जिनका बड़ा हिस्सा चीन से आयात किया जाता था। तब भारत सरकार ने भी चीन से आयातित वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाना शुरु कर दिया था। तब भारत द्वारा नए एफडीआई नियमों में परिवर्तन से चीन बौखला गया था। आज की तारीख में भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने से सर्वाधिक नुकसान चीन को ही उठाना पड़ता है। वैसे भी उसका घटिया प्रोडक्ट की पोल खुलती जा रही है। यह सच्चाई भी है कि चीन मैन्युफैक्चरिंग में घटिया कच्चे माल का इस्तेमाल कर उसे भारत में उतार रहा है। इस कारण उसके उत्पादों की मांग अब तेजी से घटनी शुरु हो गयी है। ऊपर से सीमा पर उसका आक्रामक रवैया कोढ़ में खाज का काम सिद्ध कर रहा है।</p>
<p>चीन को अच्छी तरह पता है कि भारत से रिश्ते बिगड़ने पर सबसे अधिक उसके हितों को ही नुकसान पहुंच रहा है। उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि गुणवत्ता और भरोसे की कसौटी पर उसके उत्पाद खरा नहीं उतर रहे हैं। दुनिया भर में उसके उत्पादों की विश्वसनीयता अब शक के दायरे में है। दुनिया समझने लगी है कि चीन संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण मैन्युफैक्चरिंग में घटिया कच्चे माल का इस्तेमाल कर रहा है और न्यूनतम मजदूरी के बूते अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अपना घटिया व सस्ता माल उतार रहा है। उसके इस खेल से उसके उत्पादों की मांग तेजी से घटने लगी है। जबकि दूसरी ओर भारतीय उत्पाद अपनी उच्च गुणवत्ता के कारण दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहे हैं।</p>
<p>भारतीय उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसे लेकर चीन भारत से जलभुन रहा है। याद होगा गत वर्ष पहले यूरोपीय संघ और दुनिया के 49 बड़े देशों को लेकर जारी ‘मेड इन कंट्री इंडेक्स’ (एमआइसीआइ-2017) में उत्पादों की गुणवत्ता के मामले में चीन भारत से सात पायदान नीचे रहा। चीन भले ही अपनी इंजीनियरिंग कारीगरी से अपने उत्पादों को दुनिया के बाजारों में पाटकर फूले न समा रहा हो पर वह दिन दूर नहीं जब उसकी हालत 19 वीं सदी के समापन के दौर की उस जर्मनी जैसी होगी जो अपने गुणवत्ताहीन उत्पादों के लिए दुनिया भर में बदनाम हुआ। तब जर्मनी भारी मात्रा में अपने घटिया और बड़े ब्रांडों की नकल करके बनाए गए उत्पादों को ब्रिटेन निर्यात करता था।</p>
<p>इससे ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी और अंततः ब्रिटेन को गुणवत्ताविहिन उत्पादों से बचने के लिए ‘मेड इन’ लेवल की शुरुआत करनी पड़ी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में दुनिया के तमाम देश चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाएंगे। अभी गत वर्ष पहले भारत ने चीन से दूध, दूध उत्पादों और कुछ मोबाइल फोन समेत कुछ उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाया था। ये उत्पाद निम्नस्तरीय और सुरक्षा मानकों की कसौटी पर खरा नहीं पाए गए थे। चीन को सफाई देनी पड़़ी थी। भारत ने 23 जनवरी, 2016 को चीनी खिलौने के आयात पर प्रतिबंध लगाया था। फिर चीन को विश्व व्यापार संगठन में अपने आंकड़ों के साथ हाजिर होना पड़ा था। दुनिया के अन्य देशों में भी चीन के घटिया उत्पादों पर प्रतिबंध लगना शुरु हो गया है।</p>
<p>अंतर्राष्ट्रीय बाजार विशेष रुप से अमेरिका, यूरोप में चीन के घटिया उत्पादों की बिक्री में तेजी से कमी आई है। स्वयं चीन के कारोबारियों का भी कहना है कि प्रतिस्पर्द्धा की वजह से पिछले पांच साल में उत्पादों की कीमत में करीब 90 प्रतिशत तक कटौती कर चुके हैं। उनकी मानें तो पिछले तीन सालों में मजदूरी दोगूना बढ़ने और गुणवत्ता पर ध्यान देने से चीन में बने सामान भी सस्ते नहीं रह जाएंगे। अगर चीन उत्पादों की गुणवत्ता पर ध्यान देता है तो स्वाभाविक रुप से उत्पादों की कीमत में वृद्धि होगी और कीमत बढ़ने से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी मांग प्रभावित होगी। फिलहाल आंकड़ों पर गौर करें तो विगत दो दशकों में चीन का भारत में व्यापार कई गुना बढ़ा है।</p>
<p>वर्ष 1984 में दोनों देशों द्वारा ‘सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र’ यानी एमएफएन पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारत की अपेक्षा चीन कई गुना ज्यादा फायदे में रहा है। वर्ष 2000 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2.9 अरब डॉलर था जो आज 2023-24 में बढ़कर 119 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। इसमें चीन से आने वाला माल यानी आयात भारत के निर्यात से ज्यादा है। इस आंकड़ें को देखें तो चीन फायदे में हैं। अगर आज चीन भारत से रिश्ते सुधारने के लिए आगे बढ़ा है तो उसमें भी उसी का फायदा है।</p>
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		<title>पीएम करेंगे राज्यों के गृह मंत्रियों के चिंतन शिविर को संबोधित</title>
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		<pubDate>Wed, 26 Oct 2022 07:02:52 +0000</pubDate>
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<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 28 अक्टूबर को सुबह करीब साढ़े दस बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से राज्यों के गृह मंत्रियों के चिंतन शिविर को संबोधित करेंगे। यह चिंतन शिविर 27 और 28 अक्टूबर को हरियाणा के सूरजकुंड में आयोजित किया जा रहा है। इस चिंतन शिविर में विभिन्न राज्यों के गृह सचिव एवं पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) व केन्द्रीय पुलिस संगठनों (सीपीओ) के महानिदेशक भी शामिल होंगे। गृह मंत्रियों का यह चिंतन शिविर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण में घोषित पंच प्रण के अनुरूप आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मामलों पर नीति निर्माण को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करने का एक प्रयास है। सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप यह शिविर,  केन्द्र और राज्य स्तर पर विभिन्न हितधारकों के बीच योजना एवं समन्वय के मामले में अधिक तालमेल सुनिश्चित करेगा। इस शिविर में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण, साइबर अपराध प्रबंधन, आपराधिक न्याय प्रणाली में आईटी के बढ़ते उपयोग, भूमि सीमा प्रबंधन, तटीय सुरक्षा, महिला सुरक्षा, मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।</p>
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