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	<title>HINDI DIWAS SPECIAL Archives - Lok Dastak</title>
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		<title>SPECIAL &#8211; HINDI DAY : वैश्विक क्षितिज पर हिन्दी का परचम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Sep 2024 03:07:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुति- अरविंद जय तिलक (वरिष्ठ स्तंभकार) I  किसी भी राष्ट्र की जीवंतता और पहचान उसकी भाषा...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>प्रस्तुति- अरविंद जय तिलक </strong></span><span style="color: #ff0000"><strong>(वरिष्ठ स्तंभकार) I </strong></span></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-thumbnail wp-image-10534" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-150x150.jpg 150w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-24x24.jpg 24w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-48x48.jpg 48w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-96x96.jpg 96w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/04/photo-Arvind-Jaiteelak-300x300.jpg 300w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>
<p><span style="font-weight: 400">किसी भी राष्ट्र की जीवंतता और पहचान उसकी भाषा और संस्कृति है। इसके बिना राष्ट्र रुपी शरीर का अस्तित्व, चिंतन और दर्शन सभी कुछ बेमानी है। राष्ट्र के नागरिक निज भाषा से संस्कारित होकर ही अपने मूल्यों, विचारों, आदर्शों और प्रतिमानों को जीते हैं। कहा भी जाता है कि राष्ट्र के विचारों को गढ़ने-बुनने, संजोने-संवारने और उसे प्राणवान बनाने में भाषा की अहम भूमिका होती है। हिन्दी भाषा उन्हीं भाषाओं में से एक है जो भारत की कालजयी सभ्यता-संस्कृति, आचार-विचार, विज्ञान-दर्शन और इतिहास को आलोकित-प्रकाशित करती है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जहां एक ओर भाषाएं दम तोड़ रही हैं वहीं हिन्दी भाषा अपनी स्वीकार्यता और प्रासंगिकता का लोहा मनवा रही है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">आज समूचे विश्व में हिन्दी भाषा की गूंज है। विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दी भाषा का सम्मान बढ़ रहा है। नतीजा, आज हिन्दी भाषा न सिर्फ भारत राष्ट्र की भाषा भर है बल्कि समूचे विश्व के लोगों के सांस्कृतिक जुड़ाव, विचारों के आदान-प्रदान और विकास का जरिया बन रही है। आंकडों के लिहाज से देखें तो दुनिया भर में तकरीबन 61.5 करोड़ लोग हिन्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। इथोनोलॉज के आंकड़ों के मुताबिक अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 113 करोड़ और चीनी भाषा मंडारिन की संख्या 112 करोड़ है। लेकिन जिस गति से हिन्दी भाषा की स्वीकार्यता व लोकप्रियता आसमान छू रही है उससे साफ है कि आने वाले दिनों में हिन्दी भाषा अंग्रेजी और मंडारिन भाषा को पछाड़कर शीर्ष स्थान पर विराजमान हो जाएगी। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">वैश्विक स्तर पर यूजर्स के लिहाज से 1952 में हिन्दी भाषा पांचवे पायदान पर थी जो 1980 के दशक में चीनी और अंग्रेजी भाषा के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच गयी। लेकिन विगत दशकों में विकासशील भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक आर्थिक-व्यापारिक आकर्षण ने सभी के लिए हिन्दी भाषा को बोलने-समझने की अनिवार्यता सुनिश्चित कर दी। गौर करें तो एक भाषा के तौर पर हिन्दी का जितना अधिक अंतर्राष्ट्रीय विकास हुआ है, विश्व में शायद ही किसी अन्य भाषा का उतना हुआ हो। वे सभी संस्थाएं, सरकारी मशीनरी और छोटे-बड़े समूह बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हिन्दी को इस ऊंचाई पर पहुंचाया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> 1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर बैठक में टोकियो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होजुमि तनाका द्वारा पेश नए भाषायी आंकड़ों के मुताबिक अब चीनी भाषा के बाद हिन्दी का स्थान है। यानि अंग्रेजी भाषा पीछे छूट गयी है। गौर करें तो आज दुनिया के तकरीबन 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई हो रही है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में हिन्दी की धूम मची है। यहां 30 से अधिक विश्वविद्यालयों में भाषायी पाठ्यक्रम में हिन्दी को महत्वपूर्ण दर्जा हासिल है। अमेरिका के अलावा यूरोपिय देशों में भी हिन्दी का तेजी से विकास हो रहा है। इंग्लैण्ड के लंदन, कैम्ब्रिज और यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी को चाहने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400"> जर्मनी के हीडलबर्ग, लोअर सेक्सोनी के लाइपजिंग, बर्लिन के हम्बोलडिट और बॉन विश्वविद्यालय में भी हिन्दी भाषा को पाठ्यक्रम के रुप में शामिल किया गया है। एक दशक से रुस के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य पर शोध हो रहे हैं। यहां हिंदी का बोलबाला बढ़ा है। हिन्दी का जलवा सिर्फ जर्मनी ही नहीं बल्कि रुस में भी कायम है। विगत दशकों में अनेक रुसी विद्वानों ने हिंदी साहित्य का अनुवाद किया है। इनमें से एक तुलसीकृत रामचरित मानस भी है जिसका अनुवाद प्रसिद्ध विद्वान वारान्निकोव द्वारा किया गया है। मॉस्को राजकीय विश्वविद्यालय और कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में एक अलग पूर्वी भाषाओं के विभाग को बनाया गया है जहां पर हिन्दी की शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">रुसी कवियों ने सबसे पहले जिस भारतीय कवि की रचनाओं का अनुवाद किया, वे कालिदास हैं। प्रसिद्ध रुसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन के पूर्ववर्ती कवि वसीली झुकोवस्की ने सबसे पहले कालिदास की रचना ‘नल और दमयंती’ का रुसी भाषा में अनुवाद किया। उनके बाद कालिदास की रचना ‘शकुंतला’ का अनुवाद कंस्तांतिन बालमंत ने किया। हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता का ही आलम है कि वेस्टइंडीज के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठ की स्थापना की गयी है। एशियाई देश जापान में हिन्दी भाषा का बहुत अधिक सम्मान है। प्रोफेसर दोई ने टोकियो विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना की है। रुस की तरह जापान में भी हिन्दी साहित्य का अनुवाद हुआ है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">प्रोफेसर तोबियोतनाका ने भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का जापानी भाषा में अनुवाद किया है। प्रोफेसर कोगा ने ‘जापानी-हिन्दी कोष’ की रचना की है। उन्होंने गांधी जी की आत्मकथा का भी जापानी में अनुवाद किया है। प्रोफेसर मोजोकामी हर वर्ष हिन्दी का एक नाटक तैयार करते हैं और उसका मंचन भारत में करते हैं। गुयाना और मॉरिशस में भी हिन्दी भाषा को लेकर जबरदस्त उत्साह है। दरअसल यहां भारतीय मूल के लोगों की संख्या सर्वाधिक है। यहां प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातक स्तर पर हिन्दी के पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">मॉरिशस में अंग्रेजी राजभाषा है। फ्रेंच बोलने वालों की तादाद भी बहुत अच्छी है। लेकिन हिन्दी की लोकप्रियता में तनिक भी कमी नहीं है। यहां बहुत पहले हिन्दी सचिवालय की स्थापना हो चुकी है। आज ढेरों हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। मॉरिशस में भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या कुल आबादी की आधे से अधिक है। लिहाजा यहां हिन्दी का एक सशक्त भाषा के रुप में स्थापित होना लाजिमी है। यहां हिन्दी भाषा में खूब पत्र-पत्रिकाओं तथा साहित्य का प्रकाशन हो रहा है। मॉरिशस की तरह फिजी, नेपाल, भूटान, मालदीव और श्रीलंका में भी हिन्दी का जलवा कायम है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">फिजी में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा हिन्दी है। इसे फिजियन हिन्दी या फिजियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। यह फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। नेपाल में भी हिन्दी बोलने व समझने वाले लोगों की तादाद अच्छी है। नेपाल में भारतीय टेलिविजन और सिनेमा अति लोकप्रिय है जिसके कारण हिन्दी बोलने-समझने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इसी तरह खाड़ी देशों में भी हिन्दी का तेजी से प्रचार-प्रसार हर रहा है। यहां के सोशल मीडिया में भी हिन्दी का दखल बढ़ा है। आज कई पत्र-पत्रिकाओं को ऑनलाइन पढ़ा जा रहा है। संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दी एफएम चैनल लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। नए-पुराने हिन्दी गीतों को चाव से सुना जा रहा है। हिन्दी फिल्मों ने भी यहां धूम मचा रखी है। पिछले कुछ वर्षों से दुबई में लगातार हिन्दी कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है जो अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">हिन्दी भाषा की यह असाधारण उपलब्धि कही जाएगी कि जिन देशों में भाषा को विचारों की पोषाक और राष्ट्र का जीवन समझा जाता है वहां भी हिन्दी तेजी से अपना पांव पसार रही है। हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया स्विटजरलैंड, स्वीडन, फ्रांस, नार्वे, जापान, इटली, मिस्र, कजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, कतर और अफगानिस्तान, रुस और जर्मनी अपनी भाषा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। वे इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इन दशों में हिन्दी को भरपूर स्नेह और सम्मान मिल रहा है। यह हिन्दी भाषा के लिए बड़ी उपलब्धि है। आज दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं जहां भारतीयों की उपस्थिति न हो और वहां हिन्दी का तेजी विस्तार न हो रहा हो। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400">एक आंकड़ें के मुताबिक दुनिया भर में ढ़ाई करोड़ से अधिक अप्रवासी भारतीय 160 से अधिक देशों में रहते हैं। यह सुखद है कि वह अपनी भाषा व संस्कृति से जुड़े हैं और हिन्दी के फैलाव में योगदान कर रहे हैं। गौर करें तो बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियां भी अपने-अपने देशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारों पर दबाव बना रही हैं। दरअसल उनका मकसद हिन्दी के जरिए एशियाई देशों में अपनी व्यपारिक गतिविधियों को बढ़ाना है। यह स्वीकारने में हिचक नहीं कि बाजार ने भी हिन्दी की स्वीकार्यता को नई उंचाई दी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की चमक प्रमाणित करती है कि संसार में उसकी प्रतिष्ठा और उपादेयता बढ़ी है। वह तेजी से वैश्विक भाषा बन रही है।  </span></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>हिन्दी दिवस विशेष (HINDI DIWAS SPECIAL)_______ भारत की राजभाषा हिन्दी : दिशा और दशा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[लोक दस्तक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2023 03:54:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; भाषा सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है, जीवंतता,स्वायतता और लचीलापन भाषा के प्रमुख लक्षण है।...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p>भाषा सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है, जीवंतता,स्वायतता और लचीलापन भाषा के प्रमुख लक्षण है। एक कहावत है “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी”</p>
<p>भाषा हिन्दी को भारत की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह भारतीय एकता और विविधता को साझा करने का माध्यम है और सार्वभौमिक भाषा मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह विज्ञान, साहित्य, कला और व्यापार मे भी उपयोग होती है। इसके साथ ही हिन्दी भाषा बुनियादी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भारत सरकार ने इसे शिक्षा के क्षेत्र मे प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएँ चलाई हैं।</p>
<p>हिन्दी दीर्घकाल से अखंड भारत मे जन-जन की पारस्परिक संपर्क की भाषा रही है। भक्तिकाल मे अनेक संत कवियों ने हिन्दी मे रचना की और लोगों का मार्गदर्शन किया। केवल उत्तरी भारत मे ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों जैसे बल्लभाचार्य,रामानुज,रामानन्द आदि ने भी हिन्दी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भूषण, छत्रपति शिवाजी के राज कवि थे।</p>
<p>सन 1816 मे विलियम केरी ने लिखा कि हिन्दी किसी एक प्रदेश कि भाषा नहीं, बल्कि देश मे सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है। यद्यपि भारत एक बहुभाषी देश है, किन्तु बहुत लंबे काल से हिन्दी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर संपर्क भाषा के रूप मे प्रयुक्त होता था। स्वतन्त्रता आंदोलन मे हिन्दी पत्रकारिता ने महान भूमिका अदा की।</p>
<p>राजा राम मोहन राय, पंडित बलकृष्ण भट्ट, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी,सुभाष चन्द्र बोस, सुब्रमनियम भारती आदि अनेकानेक लोगों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का सपना देखा था। पंडित बालकृष्ण भट्ट जी एक सफल पत्रकार, निबंधकार,नाटककार, उपन्यासकार और व्यंगकार थे , हिन्दी गद्य साहित्य मे उनका विशेष योगदान रहा।</p>
<p>हिन्दी गद्य काव्य की रचना की शुरुआत भट्ट जी ने की थी। इनके द्वारा हिन्दी प्रदीप का सम्पादन भी किया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से सन 1877 मे प्रयागराज मे “हिन्दी वर्धीनी सभा” की स्थापना की गई, जिसके चलते उन्होने अनेक प्रकार की पुस्तकें लिखीं। पंडित मदन मोहन मालवीय और राजर्षि पुरषोत्तम दास टंडन जैसी विभूतियाँ भट्ट जी की शिष्य रहीं।</p>
<p>महात्मा गांधी ने सन 1917 के एक सम्मेलन मे कहा था कि भारतीय भाषाओं मे केवल हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप मे अपनाया जा सकता है क्यूंकी यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है; यह समस्त भारत मे आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक संपर्क माध्यम के रूप मे प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है।</p>
<p>18 अप्रैल 1900 नागरी प्रचारिणी सभा और पंडित मदन मालवीय जी के नेत्रत्व मे चले आंदोलन ने स्कूलों और कचहरियों मे हिन्दी भाषा के लिए द्वार खोल दिया। वर्ष 1905 मे बाल गंगाधर तिलक ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अधिवेशन मे देवनागरी को सभी भारतीय भाषाओं को संपर्क भाषा तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आह्वान किया। इससे देशभर मे समर्थन मिला और जगह जगह संस्थाएं बनने लगी,और हिन्दी भाषाई आयोजन होने लगे।</p>
<p>आप सभी को जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि वर्ष 1935 मे तामिलनाडु के मुख्यमंत्री स्वर्गीय सी राजगोपालाचारी ने अपने राज्य मे हिन्दी कि शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था, किन्तु आजकल के राजनेताओं कि गंदी राजनीति के कारण इस राज्य से हिन्दी बिलकुल खत्म सी हो गयी।</p>
<p>इन राजनेताओं ने हिन्दी को हटाने के नाम पर वोट मांगना शुरू कर दिया और राज्य मे हिन्दी को हाशिये पर लाने मे सफल रहे किन्तु पूर्व मे दक्षिण के कई आचार्यों और विद्वानो के द्वारा हिन्दी को बढ़ाने हेतु किए गए कार्य पर पानी फेरने मे कोई संकोच नहीं किया।</p>
<p>भारत के बाहर हिन्दी नेपाल,दक्षिण अफ्रीका, मौरिशस,यमन,अमेरिका,इंग्लैंड,युगांडा,जर्मनी,न्यूजीलैंड,कनाडा और खाड़ी के देशो मे प्रयोग की जाती है। दुनिया के 12 विश्वविद्यालयों मे इसके पठन पाठन की व्यवस्था है। विश्व हिन्दी सचिवालय मौरिशस मे स्थित है जो हिन्दी को बढ़ावा देने मे विशेष भूमिका निभा रहा है।</p>
<p>हिन्दी जानने वालों की संख्या मे निरंतर व्रद्धि हो रही है। ये लिंक भाषा है और लोगों के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करती है। सदियों से अपने अनोखेपन के कारण भारत दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। इसका ऐतिहासिक महत्व,व्यापारिक प्रसार,भौतिक संव्रद्धि, दार्शनिक सम्पदा ने विश्व को आकर्षित किया है।</p>
<p>मुगल आए और उसमे से कई लूट कर वापिस अपने स्थान को लौट गए, कई यंही बस गए। बचे हुए लोग यंहा की भाषा संस्कृति मे रच बस गए। कोलंबस असल मे सोने की चिड़िया भारत को खोजते हुए अमेरिका के तट पर जा लगा। हॉलैंड,डेन्मार्क,पुर्तगाल,फ्रांसऔर ब्रिटेन के लोग व्यापार करने यहाँ आए और अंततः इस देश पर राज करने लगे।</p>
<figure id="attachment_14445" aria-describedby="caption-attachment-14445" style="width: 219px" class="wp-caption alignnone"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="size-medium wp-image-14445" src="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/09/फोटो-12-2-219x300.jpg" alt="" width="219" height="300" srcset="https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/09/फोटो-12-2-219x300.jpg 219w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/09/फोटो-12-2-746x1024.jpg 746w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/09/फोटो-12-2-768x1054.jpg 768w, https://www.lokdastak.com/wp-content/uploads/2023/09/फोटो-12-2.jpg 922w" sizes="(max-width: 219px) 100vw, 219px" /><figcaption id="caption-attachment-14445" class="wp-caption-text"><span style="color: #ff0000">पंडित बालकृष्ण भट्ट जी भारतेंदु युग के महान लेखक, साहित्यकार, गद्य काव्य संग्रह, व्यंगकार और निबंधकार रहे।</span></figcaption></figure>
<p>भारतीय संविधान मे हिन्दी को कार्यालयी भाषा का दर्जा दिया गया है । भारत मे करोड़ों लोगों की मातृभाषा हिन्दी है, इससे कई गुना अधिक लोग इसे द्वितीय भाषा के रूप मे प्रयोग करते हैं। हिन्दी को राजभाषा नहीं अपितु राष्ट्रभाषा के रूप मे जानना चाहिए। भारत के बाहर जंहा भी भारतीय हैं उनमे से अधिकांश लोग हिन्दी मे बोलना पसंद करते हैं।</p>
<p>देश मे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और पर्यटन को बढ़ावा देने के कारण हिन्दी का प्रयोग राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा है। दुनिया की भाषाओं मे बोलने वालों की संख्या के आधार हिन्दी विश्व मे तीसरा स्थान रखती है। भारत मे हिन्दी को बोलचाल की भाषा बनाने मे बॉलीवुड और दूरदर्शन के कार्यक्रम का अहम योगदान है हिन्दी फिल्मों और टी वी सीरियल की हिन्दी को प्रचलित करने की भूमिका से कैसे इंकार किया जा सकता है।</p>
<p>जिसमे विशेष तौर पर रामानन्द सागर द्वारा प्रस्तुत “रामायण” और बी आर चोपड़ा द्वारा प्रस्तुत “महाभारत” का प्रमुख योगदान रहा। भारत के अहिंदी भाषियों तथा विदेश मे हिन्दी की लोकप्रियता का एक सशक्त माध्यम हिन्दी फिल्मे हैं। हिन्दी के कार्यक्रम रेडियो पर देश विदेश मे सुने जाते हैं, खासतौर पर हिन्दी फिल्मों की गीत माला। यू ट्यूब पर भी हिन्दी गीत- संगीत का खजाना है। इस्कॉन मंदिर पूरी दुनिया मे फैला हुआ है और उसके बड़ी संख्या मे विदेशी अनुयायी हैं जो कृष्ण भजन हिन्दी मे गाते हैं।</p>
<p>संविधान के अनुछेद 343 के खंड (1) के अनुसार देवनागिरी मे लिखित हिन्दी संघ की राष्ट्र भाषा है। 14 सितम्बर 1949, मे हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप मे स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान मे अनुछेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध मे व्यवस्था की गई । हिन्दी के विस्तार मे तकनीकि की महत्वपूर्ण भूमिका है। अब मोबाइल,कम्प्युटर पर हिन्दी लिखना पढ़ना सुलभ हो गया है। व्यापार भी शुरू से हिन्दी के प्रचार प्रसार का मुख्य माध्यम रहा है।</p>
<p>लेकिन इस बात को सुनकर दिल दुख से द्रवित हो उठता है जब आज के अभिवाहक बड़े गर्व से बताते हैं कि मेरे बच्चे की हिन्दी विषय छोड़कर सभी अन्य विषयों मे अच्छी पकड़ है, मै इसमे बच्चे की गलती नहीं मानता, केवल अभिवाहक ही पूर्ण रूप से इसके लिए जिम्मेदार हैं। हिन्दी भाषा को विश्व भाषा दिवस मनाने का एक उत्तम तरीका हो सकता है कि हम हिन्दी भाषी लोग अपने बच्चों से हिन्दी मे बात करें, उन्हे हिन्दी बोलने –पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। हम जब हिन्दी को सम्मान देंगे तभी सच्चे अर्थों मे उसे विश्व भाषा का दर्जा दिया जा सकेगा। तभी हिन्दी दिवस मनाना सार्थक होगा।</p>
<p>“हिन्दी हम आप से दुखी होकर कहती है वर्ष मे एक दिन विश्व हिन्दी दिवस मना कर मेरे लिए छाती कूटना बंद करो और बाकी के 365 दिन भी मेरा सही प्रयोग करो। मैं इतनी भी कठिन नहीं हूँ कि अन्य भाषा के सहारे से मुझे सरल बनाने कि अवश्यकता पड़े, और ना ही इतनी लाचार हूँ कि दूसरी भाषा कि बैसाखी ले कर चलूँ।“ इसीलिए आज हम सभी प्रतिज्ञा लें कि हम अपनी रोज कि दिनचर्या मे हिन्दी को अवश्य प्राथमिकता दें।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #00ffff"><strong>सर्व मित्र भट्ट </strong></span><br />
<span style="color: #00ffff"><strong>लेखक- वरिष्ठ प्रबन्धक (पंडित बालकृष्ण भट्ट के बिद्धित प्रपोत्र ) तुलन अनुभाग, अंचल कार्यालय,</strong></span><br />
<span style="color: #00ffff"><strong>लखनऊ, यूपी में कार्यरत ।</strong></span></p>
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